27 मार्च 2026 (भारत बानी ब्यूरो ) : खून से जुड़ी दो गंभीर आनुवंशिक बीमारियां—Sickle Cell Disease और Thalassemia—आज भी दुनिया भर में लाखों लोगों के लिए एक बड़ी स्वास्थ्य चुनौती बनी हुई हैं। ये दोनों बीमारियां जन्म से ही व्यक्ति के शरीर में मौजूद रहती हैं और माता-पिता से बच्चों में जीन के माध्यम से स्थानांतरित होती हैं। इनका प्रभाव लंबे समय तक रहता है और कई मामलों में जीवनभर इलाज और देखभाल की आवश्यकता होती है।
Sickle Cell Disease एक ऐसी स्थिति है जिसमें शरीर की लाल रक्त कोशिकाएं सामान्य गोल आकार की बजाय हंसिया या अर्धचंद्राकार हो जाती हैं। इस असामान्य आकार के कारण ये कोशिकाएं रक्त वाहिकाओं में आसानी से प्रवाहित नहीं हो पातीं और कई बार उनमें रुकावट पैदा कर देती हैं। इससे शरीर के विभिन्न अंगों तक ऑक्सीजन की आपूर्ति प्रभावित होती है, जिसके कारण मरीज को तेज दर्द, कमजोरी और कई अन्य जटिल समस्याओं का सामना करना पड़ता है। यह बीमारी एक विशेष जीन म्यूटेशन के कारण होती है और तब विकसित होती है जब व्यक्ति को दोनों माता-पिता से यह दोषपूर्ण जीन प्राप्त होता है।
इस बीमारी के लक्षण आमतौर पर बचपन में ही दिखाई देने लगते हैं, खासकर पांच से छह महीने की उम्र के बाद। मरीजों को बार-बार दर्द के दौरे पड़ सकते हैं, जिसे ‘पेन क्राइसिस’ कहा जाता है। इसके अलावा थकान, सांस लेने में कठिनाई, बार-बार संक्रमण और हाथ-पैरों में सूजन जैसे लक्षण भी देखे जाते हैं। समय के साथ यह बीमारी शरीर के विभिन्न अंगों को प्रभावित कर सकती है, जिससे जीवन की गुणवत्ता पर गंभीर असर पड़ता है।
दूसरी ओर, Thalassemia एक ऐसी आनुवंशिक बीमारी है जिसमें शरीर पर्याप्त मात्रा में हीमोग्लोबिन नहीं बना पाता। हीमोग्लोबिन वह प्रोटीन है जो रक्त में ऑक्सीजन को शरीर के विभिन्न हिस्सों तक पहुंचाता है। जब इसकी मात्रा कम होती है, तो व्यक्ति को एनीमिया यानी खून की कमी हो जाती है। यह बीमारी भी माता-पिता से बच्चों में जीन के माध्यम से पहुंचती है और इसके विभिन्न प्रकार होते हैं, जिनमें कुछ हल्के और कुछ अत्यंत गंभीर होते हैं।
गंभीर मामलों में, जिन्हें थैलेसीमिया मेजर कहा जाता है, मरीजों को नियमित रूप से खून चढ़ाने की आवश्यकता होती है। इसके लक्षणों में अत्यधिक कमजोरी, पीली त्वचा, धीमी शारीरिक वृद्धि, हड्डियों में विकृति और थकान शामिल हैं। कई बार यह बीमारी बचपन में ही स्पष्ट हो जाती है और समय पर इलाज न मिलने पर स्थिति गंभीर हो सकती है।
हालांकि Sickle Cell Disease और Thalassemia अलग-अलग बीमारियां हैं, लेकिन इनमें कई समानताएं भी हैं। दोनों ही आनुवंशिक हैं, दोनों का संबंध खून और हीमोग्लोबिन से है और दोनों में लंबे समय तक चिकित्सा देखभाल की आवश्यकता होती है। इन बीमारियों का प्रभाव न केवल शारीरिक स्वास्थ्य पर पड़ता है, बल्कि मानसिक और सामाजिक जीवन को भी प्रभावित करता है।
इन बीमारियों के प्रबंधन में चिकित्सा विज्ञान ने काफी प्रगति की है, लेकिन अभी भी इनका पूर्ण इलाज हर मामले में संभव नहीं है। कुछ मरीजों के लिए बोन मैरो ट्रांसप्लांट एक विकल्प हो सकता है, लेकिन यह सभी के लिए उपलब्ध या उपयुक्त नहीं होता। इसलिए समय पर पहचान, नियमित इलाज और सावधानी बेहद जरूरी है।
भारत जैसे देश में, जहां बड़ी आबादी है और कई क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाएं सीमित हैं, इन बीमारियों की चुनौती और भी बढ़ जाती है। जागरूकता की कमी और समय पर जांच न होने के कारण कई मामलों का पता देर से चलता है। यही कारण है कि विशेषज्ञ विवाह से पहले और गर्भावस्था के दौरान जेनेटिक टेस्टिंग की सलाह देते हैं, ताकि इन बीमारियों के प्रसार को रोका जा सके।
सरकार और विभिन्न स्वास्थ्य संगठन इन बीमारियों को लेकर जागरूकता फैलाने और मुफ्त जांच सुविधाएं उपलब्ध कराने पर जोर दे रहे हैं। इसके बावजूद, अभी भी समाज के कई हिस्सों में इन बीमारियों को लेकर जानकारी की कमी है, जिसे दूर करना जरूरी है।
अंत में कहा जा सकता है कि Sickle Cell Disease और Thalassemia दोनों ही गंभीर लेकिन प्रबंधनीय बीमारियां हैं। सही जानकारी, समय पर जांच और उचित इलाज के जरिए मरीज एक बेहतर और सामान्य जीवन जी सकते हैं।
सारांश:
सिकल सेल और थैलेसीमिया आनुवंशिक रक्त विकार हैं जो हीमोग्लोबिन और रक्त कोशिकाओं को प्रभावित करते हैं। समय पर जांच और इलाज से इनका प्रभाव नियंत्रित किया जा सकता है।
