अप्रैल 2026 (भारत बानी ब्यूरो ) : बच्चों के जीवन में डिजिटल उपकरणों की बढ़ती मौजूदगी को लेकर विशेषज्ञों ने गंभीर चिंता जताई है। हालिया चेतावनियों के अनुसार, बहुत कम उम्र में स्क्रीन का अधिक उपयोग बच्चों के सामाजिक और संवेदी विकास को प्रभावित कर सकता है। यह मुद्दा खासतौर पर ऐसे समय में महत्वपूर्ण हो गया है, जब मोबाइल फोन, टैबलेट और टीवी बच्चों के रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा बनते जा रहे हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि शुरुआती वर्षों में बच्चे अपने आसपास के माहौल से सीखते हैं। वे चेहरे के भाव, आवाज़ के उतार-चढ़ाव, स्पर्श और प्रत्यक्ष संवाद के माध्यम से सामाजिक कौशल विकसित करते हैं। लेकिन जब इन अनुभवों की जगह स्क्रीन ले लेती है, तो यह सीखने की प्रक्रिया बाधित हो सकती है।

डॉक्टरों के अनुसार, अत्यधिक स्क्रीन टाइम बच्चों में ध्यान की कमी, भाषा विकास में देरी और सामाजिक संपर्क में झिझक जैसी समस्याएं पैदा कर सकता है। कुछ मामलों में यह बच्चों के व्यवहार और भावनात्मक संतुलन को भी प्रभावित करता है। विशेषज्ञ इस स्थिति को डिजिटल ओवरएक्सपोजर से जोड़कर देखते हैं, जहां बच्चे वास्तविक दुनिया के अनुभवों से दूर होते जाते हैं।

संवेदी विकास भी इस प्रक्रिया से प्रभावित होता है। छोटे बच्चों को स्पर्श, गंध, ध्वनि और दृश्य संकेतों के संतुलित अनुभव की जरूरत होती है। लेकिन स्क्रीन पर सीमित और कृत्रिम उत्तेजनाएं मिलने के कारण यह संतुलन बिगड़ सकता है। इससे बच्चे के मस्तिष्क के विकास पर भी असर पड़ सकता है।

विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि स्क्रीन पर बिताया गया समय अक्सर शारीरिक गतिविधि को कम कर देता है। इससे बच्चों में मोटापा, नींद की समस्या और आंखों से जुड़ी दिक्कतें भी बढ़ सकती हैं। इसके अलावा, देर रात तक स्क्रीन देखने की आदत उनके स्लीप साइकल को भी प्रभावित करती है, जिससे उनके समग्र स्वास्थ्य पर असर पड़ता है।

हालांकि, तकनीक को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता। डिजिटल उपकरण शिक्षा और मनोरंजन के लिए उपयोगी हो सकते हैं, लेकिन उनका उपयोग संतुलित और नियंत्रित होना चाहिए। विशेषज्ञ माता-पिता को सलाह देते हैं कि वे बच्चों के स्क्रीन टाइम को सीमित करें और उनकी गतिविधियों पर नजर रखें।

परिवार के साथ समय बिताना, किताबें पढ़ना, बाहर खेलना और रचनात्मक गतिविधियों में भाग लेना बच्चों के विकास के लिए अधिक फायदेमंद माना जाता है। माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों के साथ संवाद बढ़ाएं और उन्हें वास्तविक दुनिया के अनुभवों से जोड़ें।

विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि बच्चों के सामने माता-पिता का व्यवहार भी महत्वपूर्ण होता है। यदि माता-पिता खुद अधिक समय स्क्रीन पर बिताते हैं, तो बच्चे भी उसी आदत को अपनाते हैं। इसलिए परिवार में डिजिटल अनुशासन बनाए रखना जरूरी है।

स्कूलों और शिक्षण संस्थानों की भी इसमें अहम भूमिका है। वे बच्चों को संतुलित जीवनशैली के बारे में जागरूक कर सकते हैं और स्क्रीन के सही उपयोग के बारे में शिक्षित कर सकते हैं।

कुल मिलाकर, शुरुआती उम्र में स्क्रीन का अत्यधिक उपयोग बच्चों के सामाजिक और संवेदी विकास के लिए नुकसानदायक हो सकता है। विशेषज्ञों की यह चेतावनी माता-पिता और समाज दोनों के लिए एक संकेत है कि वे बच्चों के डिजिटल उपयोग को लेकर सतर्क रहें और उन्हें स्वस्थ व संतुलित वातावरण प्रदान करें।

Summary

विशेषज्ञों के अनुसार, कम उम्र में ज्यादा स्क्रीन टाइम बच्चों के सामाजिक, संवेदी और मानसिक विकास को प्रभावित करता है, इसलिए संतुलित उपयोग और अभिभावकों की निगरानी जरूरी है।

Bharat Baani Bureau

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