23 जनवरी 2026 (भारत बानी ब्यूरो ) : भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के वीर नेता नेताजी सुभाष चंद्र बोस का नाम सुनते ही आज भी हर भारतीय के मन में उत्साह और जोश भर जाता है। आज नेताजी की 129वीं जयंती मनाई जा रही है। माना जाता है कि ताइपे में हुई विमान दुर्घटना में नेताजी का निधन हो गया था। उनकी देशभक्ति को लेकर कई तरह की साहसिक कहानियां हैं। आज हम आपको नेताजी का वो किस्सा बता रहे हैं, जब उन्हें अपनी पहचान बदलनी पड़ी।
जब बने औरलेंडो मेजेरेटा और कमांडर मक्सूदा रखा
वैसे तो नेताजी सुभाष चंद्र बोस को उनके इसी नाम से जानते हैं। लेकिन कई ऐसे मौकों पर परिस्थिति के अनुसार वह अपना नाम बदल लेते थे। 1941 में उन्हें जब कोलकाता में घर में नजरबंद कर दिया गया था, तो वह बैठे नहीं रहे, बल्कि अंग्रेजी साम्राज्य की आंखों में धूल झोंक कर नेताजी रात के अंधेरे में चुपचाप अंग्रेजों के पहरे से उसी तरह से निकल गए, जिस तरह से छत्रपति शिवाजी महाराज औरंगजेब के पहरे से निकले थे। उस समय उन्होंने अपना नाम मौलवी जियाउद्दीन रख लिया। तब उन्होंने मौलवी जियाउद्दीन का रूप धारण कर लिया।
लेकिन नाम बदलने का उनका यही एक किस्सा नहीं है। जब वे जर्मनी में पहुंचे तो उन्होंने अपना नाम औरलेंडो मेजेरेटा रखा। जब वह सबमरीन में बैठकर जापान गए तो कल्पना करिए- लड़ाई के दिनों में सबमरीन पानी की भीतर चलती है, पल-पल खतरा है, लेकिन नेताजी को सुरक्षित जाना था। नेताजी पनडुब्बी में गए और वहां पर अपना नाम कमांडर मक्सूदा रखा।
मौलवी जियाउद्दीन बनकर कोलकाता से पेशावर तक की यात्रा
दरअसल, सुभाष उर्फ जियाउद्दीन को कालका मेल से दिल्ली पहुंचकर ट्रेन बदलनी थी। वहां से फ्रंटियर मेल मिलती जो उन्हें पेशावर ले जाती। जब तक वे दिल्ली स्टेशन पर फ्रंटियर मेल में सवार नहीं हो जाते, तब तक उन्हें दिल्ली स्टेशन पर अतिरिक्त सावधानी बरतनी थी। द्वितीय विश्वयुद्ध चल रहा था। दिल्ली राजधानी होने के कारण खुफिया जासूसों से भरा पड़ा था। ज़ियाउद्दीन साहब को इन्हीं सब समस्याओं से खुद को बचाते हुए दिल्ली से पेशावर की यात्रा करनी थी। दिल्ली में उन्होंने ट्रेन बदली और सुरक्षित रूप से पेशावर के लिए निकल गए।
19 जनवरी, 1941 की देर शाम दिल्ली से आने वाली फ्रंटियर मेल पेशावर छावनी स्टेशन पर पहुंची। एक धर्मपरायण मुस्लिम और पठानी वेशभूषा में मुहम्मद ज़ियाउद्दीन स्टेशन पर उतरे। पेशावर छावनी रेलवे स्टेशन पर सुभाष चंद्र बोस के राजनीतिक दल ‘फॉरवर्ड ब्लॉक के फ्रंटियर’ के नेता अकबर शाह उनके पहुंचने का इंतजार कर रहे थे। पठानी वेशभूषा में मुस्लिम सज्जन को स्टेशन से बाहर आते देख अकबर शाह समझ गए कि यह सुभाष बाबू ही हैं, क्योंकि अकबर शाह ने नेताजी के लिए जो पठानी सलवार कलकत्ता से खरीदा था, सुभाष उर्फ ज़ियाउद्दीन ने वही धारण किया था।
इसके बाद अकबर शाह, ज़ियाउद्दीन के पास आए और दोनों ने एक दूसरे को पहचाना। फिर अकबर शाह, सुभाष के हाथ से उनकी अटैची लेकर पास ही खड़े एक तांगे की ओर इशारा किया जो अकबर ने पहले से ही स्टेशन पर खड़ा करवा लिया था। इसके बाद नेताजी को ताजमहल होटल में छिपाया गया, जहां उन्होंने एक रात ठहरकर स्थानीय परिवेश में आत्मसात कर लिया। नेताजी को आबाद खान के घर ले जाया गया। यहां उन्हें स्थानीय रीति-रिवाज, पश्तो भाषा और कबीलाई जीवन शैली से परिचित कराया गया, ताकि कोई शक न कर सके। उनका रूप गूंगा-बहरा पठान बना दिया गया और उनका नाम उसी अनुरूप रखा गया।
सारांश:
आजादी के संघर्ष के दौरान नेताजी सुभाष चंद्र बोस को अपनी सुरक्षा और आंदोलन की गुप्त योजना के लिए कई बार अपनी पहचान बदलनी पड़ी। इनमें से एक अहम किस्सा तब का है जब उन्होंने खुद को मौलवी जियाउद्दीन के रूप में पेश किया। यह छुपी पहचान उन्हें अंग्रेजों की नजरों से बचाने और क्रांतिकारी गतिविधियों को आगे बढ़ाने में मददगार साबित हुई। इस दौरान नेताजी की सूझबूझ और साहस ने उनके नेतृत्व कौशल को और उभार दिया।
