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Smoking and society smoker death and smoke health danger concept as a cigarette burning with people falling as victims in hot burning ash as a metaphor causing lung cancer risks with 3D illustration elements.

19 अक्टूबर 2026 (भारत बानी ब्यूरो) : भारत में तंबाकू से होने वाले कैंसर का खतरा केवल सिगरेट और बीड़ी पीने तक सीमित नहीं है। चबाने वाले तंबाकू, गुटखा और अन्य धुआंरहित उत्पादों का इस्तेमाल भी सिर और गर्दन के कैंसर के मामलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इंडियन जर्नल ऑफ मेडिकल रिसर्च में प्रकाशित एक नए अध्ययन के अनुसार, तंबाकू से जुड़े कैंसर का संभावित बोझ देश के अलग-अलग राज्यों, महिलाओं और पुरुषों तथा कैंसर के प्रकार के अनुसार काफी अलग है। अध्ययन में पाया गया कि पुरुषों में मुंह के कैंसर के अनुमानित 57.3 प्रतिशत मामले धुआंरहित तंबाकू से जुड़े हो सकते हैं, जबकि महिलाओं में मुंह के कैंसर के 73.4 प्रतिशत मामले किसी न किसी रूप में तंबाकू के इस्तेमाल से जुड़े होने का अनुमान है।

धुआंरहित तंबाकू से मुंह के कैंसर का खतरा

अध्ययन का शीर्षक Head and Neck Cancer Burden Attributable to Tobacco Use in India: National and Region-wise Estimates है। शोधकर्ताओं ने 2019 से 2024 के बीच केरल के तिरुवनंतपुरम स्थित रीजनल कैंसर सेंटर में इलाज के लिए आए 11,285 सिर और गर्दन के कैंसर मरीजों तथा 7,154 गैर-कैंसर रोगियों के आंकड़ों का विश्लेषण किया।

शोधकर्ताओं ने तंबाकू के इस्तेमाल और विभिन्न प्रकार के कैंसर के बीच संबंध का आकलन किया। इसके बाद राज्यवार तंबाकू इस्तेमाल के आंकड़ों के आधार पर यह अनुमान लगाया गया कि तंबाकू का सेवन समाप्त होने पर कैंसर के कितने मामलों को संभावित रूप से रोका जा सकता है।

अध्ययन के अनुसार, पुरुषों में धुआंरहित तंबाकू से जुड़े संभावित मामलों का अनुमान होंठ के कैंसर के लिए 61.8 प्रतिशत, जीभ के कैंसर के लिए 30.7 प्रतिशत और मुंह के कैंसर के लिए 57.3 प्रतिशत रहा। धूम्रपान का संबंध भी कई प्रकार के कैंसर से पाया गया। पुरुषों में धूम्रपान से जुड़े संभावित मामलों का अनुमान हाइपोफैरिंक्स के कैंसर के लिए 45.7 प्रतिशत और स्वरयंत्र के कैंसर के लिए 38.4 प्रतिशत था।

महिलाओं में धुआंरहित तंबाकू से जुड़े संभावित मामलों का अनुमान होंठ के कैंसर के लिए 68.8 प्रतिशत और मुंह के कैंसर के लिए 68 प्रतिशत था। शोधकर्ताओं के अनुसार, महिलाओं में तंबाकू के किसी भी रूप से जुड़े मुंह के कैंसर का अनुमानित हिस्सा 73.4 प्रतिशत था।

अलग-अलग राज्यों में अलग तस्वीर

अध्ययन से पता चला कि तंबाकू से जुड़े कैंसर का संभावित बोझ पूरे देश में एक जैसा नहीं है। पुरुषों में धुआंरहित तंबाकू से जुड़े मुंह के कैंसर का अनुमानित हिस्सा झारखंड में 71 प्रतिशत और ओडिशा में 70.3 प्रतिशत था। असम, मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश में भी यह अनुमान लगभग 70 प्रतिशत के आसपास रहा।

महिलाओं में छत्तीसगढ़, ओडिशा और पूर्वोत्तर के कई राज्यों में धुआंरहित तंबाकू से जुड़े मुंह के कैंसर का अनुमानित हिस्सा 80 प्रतिशत से अधिक पाया गया। त्रिपुरा में महिलाओं के मुंह के कैंसर के लिए यह अनुमान 90.4 प्रतिशत और जीभ के कैंसर के लिए 55.2 प्रतिशत था।

दक्षिण भारत में भी राज्यों के बीच अंतर देखने को मिला। पुरुषों में धुआंरहित तंबाकू से जुड़े मुंह के कैंसर का अनुमानित हिस्सा कर्नाटक में 50.2 प्रतिशत, तमिलनाडु में 35.1 प्रतिशत, तेलंगाना में 33.9 प्रतिशत, आंध्र प्रदेश में 25.6 प्रतिशत और केरल में 25.1 प्रतिशत था। महिलाओं में ये अनुमान कर्नाटक में 63.1 प्रतिशत, तमिलनाडु में 60.7 प्रतिशत, तेलंगाना में 59.9 प्रतिशत, आंध्र प्रदेश में 52.3 प्रतिशत और केरल में 37.5 प्रतिशत रहे।

महिलाओं से जुड़े आंकड़ों की सावधानीपूर्वक व्याख्या जरूरी

शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया कि कुछ अनुमानों में अनिश्चितता अधिक है, विशेष रूप से महिलाओं के आंकड़ों में। अध्ययन में कैंसर से पीड़ित पुरुषों की संख्या 8,709 और महिलाओं की संख्या 2,576 थी। कुछ मामलों में सांख्यिकीय विश्वास-सीमाएं काफी व्यापक थीं। इसलिए इन अनुमानों को सटीक राष्ट्रीय दर के बजाय उपलब्ध आंकड़ों पर आधारित संभावित आकलन के रूप में समझना चाहिए।

अध्ययन की एक अन्य सीमा यह है कि कैंसर के जोखिम का आकलन केरल के एक अस्पताल के आंकड़ों से किया गया और राज्यवार तंबाकू इस्तेमाल की व्यापकता के आधार पर इसे पूरे देश पर लागू किया गया। शोधकर्ताओं ने माना कि राज्यों के बीच कैंसर जोखिम के अलग-अलग अनुमान उपलब्ध नहीं होने के कारण राष्ट्रीय स्तर पर एक समान जोखिम मान लिया गया। इसलिए राज्यवार अंतर मुख्य रूप से तंबाकू इस्तेमाल की व्यापकता और संबंधित अनुमानों को दर्शाते हैं, न कि हर राज्य में तंबाकू इस्तेमाल करने वाले व्यक्ति के कैंसर जोखिम का सीधा माप।

रोकथाम और जागरूकता पर जोर

विशेषज्ञों के लिए इन निष्कर्षों का महत्वपूर्ण संदेश यह है कि तंबाकू नियंत्रण की रणनीति केवल धूम्रपान रोकने तक सीमित नहीं रह सकती। गुटखा, खैनी और अन्य धुआंरहित तंबाकू उत्पादों के इस्तेमाल को कम करने, लोगों को इनके जोखिम के बारे में जागरूक करने और तंबाकू छोड़ने में मदद देने वाली सेवाओं को मजबूत करने की जरूरत है।

शोधकर्ताओं ने स्वास्थ्य सेवाओं में तंबाकू इस्तेमाल की नियमित जांच, प्रभावी तंबाकू-मुक्ति सहायता और राष्ट्रीय तंबाकू नियंत्रण कार्यक्रम को सख्ती से लागू करने की सिफारिश की है। साथ ही, बेहतर कैंसर रजिस्ट्री और राज्य-विशिष्ट शोध से भविष्य में अधिक सटीक अनुमान तैयार किए जा सकते हैं।

अध्ययन का निष्कर्ष यह नहीं है कि किसी व्यक्ति के कैंसर का कारण केवल तंबाकू ही है। बल्कि यह बताता है कि आबादी के स्तर पर तंबाकू का इस्तेमाल समाप्त होने पर कैंसर के एक बड़े हिस्से को संभावित रूप से रोका जा सकता है। भारत में प्रभावी रोकथाम के लिए धूम्रपान और धुआंरहित तंबाकू—दोनों पर समान गंभीरता से ध्यान देना आवश्यक है।

Bharat Baani Bureau

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