5 नवंबर 2026 (भारत बानी ब्यूरो): आंध्र प्रदेश के एक स्कूल में चेनसॉ से हुए हमले के बाद फिल्मों में दिखाई जाने वाली हिंसा और उसके युवाओं पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर बहस तेज हो गई है। इस विवाद में अब मशहूर गायक और संगीतकार अमाल मलिक भी शामिल हो गए हैं। उन्होंने कहा है कि फिल्मों और संगीत का युवाओं पर प्रभाव पड़ सकता है, लेकिन किसी अपराध के लिए केवल सिनेमा को जिम्मेदार ठहराना सही नहीं है। अपनी बात रखते हुए उन्होंने कहा, “अगर आप किसी फिल्म से इतने प्रभावित हो रहे हैं तो आप ही मूर्ख हैं।”
अमाल मलिक ने 4 नवंबर को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक विस्तृत पोस्ट साझा की। इसमें उन्होंने आंध्र प्रदेश की घटना की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि स्कूल, कॉलेज या किसी अन्य स्थान पर चेनसॉ लेकर किसी पर हमला करना भयावह और पूरी तरह गलत है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस घटना को गंभीरता से लिया जाना चाहिए, लेकिन यह मान लेना उचित नहीं होगा कि इसके पीछे कोई एक फिल्म, गाना या फिल्म निर्माता जिम्मेदार है।
फिल्मों के साथ गानों की भी हो जांच
अमाल ने अपनी पोस्ट में फिल्म इंडस्ट्री के दोहरे मापदंडों पर सवाल उठाए। उनका कहना है कि जब फिल्मों में हिंसा या आपत्तिजनक दृश्यों को लेकर आलोचना होती है, तो गानों के बोल और उनमें दिखाई जाने वाली सामग्री पर भी समान रूप से चर्चा होनी चाहिए।
उन्होंने अपने ही दो गानों ‘कर गई चुल्ल’ और ‘रोम रोम रोमांटिक’ का नाम लेते हुए कहा कि यदि ऐसे गानों की सामग्री पर सवाल उठाए जाते हैं, तो उन्हें भी आलोचना के दायरे में रखा जाना चाहिए। इसके अलावा उन्होंने ‘बीड़ी जलइले’, ‘पिंक लिप्स’, ‘चिकनी चमेली’ और ‘मुन्नी बदनाम’ जैसे गानों का भी उल्लेख किया। उन्होंने सवाल किया कि जब इन गानों को रियलिटी शो में प्रस्तुत किया जाता है और उनका जश्न मनाया जाता है, तो उन पर उसी तरह की आपत्ति क्यों नहीं उठाई जाती जैसी फिल्मों पर उठाई जाती है।
‘एनिमल’, ‘कबीर सिंह’ और ‘KGF’ का भी किया जिक्र
अमाल मलिक ने अपनी पोस्ट में ‘एनिमल’, ‘कबीर सिंह’, ‘धुरंधर’ और ‘KGF’ जैसी फिल्मों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि उन्होंने इन फिल्मों का आनंद लिया है, हालांकि कुछ दृश्यों को लेकर उन्हें आपत्ति भी रही है।
उनके अनुसार, फिल्म एक काल्पनिक कहानी होती है और दर्शकों को यह समझना चाहिए कि पर्दे पर दिखाई जाने वाली हर चीज की नकल वास्तविक जीवन में नहीं की जानी चाहिए। किसी फिल्म को देखने और उसके हिंसक व्यवहार को अपनाने के बीच अंतर समझना जरूरी है।
उन्होंने यह भी कहा कि किसी फिल्म के निर्माण में कई लोग शामिल होते हैं और किसी एक घटना के लिए पूरी फिल्म या उसके निर्माता को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं है। उनके मुताबिक, व्यक्ति के व्यवहार को परिवार के संस्कार, परवरिश, सामाजिक और राजनीतिक माहौल, निजी अनुभव तथा मानसिक आघात जैसे कई कारक प्रभावित कर सकते हैं। हालांकि, इनमें से कोई भी कारण हिंसा को जायज नहीं ठहरा सकता।
सोशल मीडिया पर उपलब्ध कंटेंट पर भी जताई चिंता
अमाल ने फिल्मों के अलावा यूट्यूब और इंस्टाग्राम पर उपलब्ध कुछ रैप गानों और अन्य डिजिटल कंटेंट पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि कई गानों में हत्या, ताकत और आक्रामकता का महिमामंडन किया जाता है। कुछ गानों में महिलाओं के लिए आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल भी होता है।
उन्होंने अभिभावकों की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि कई बार माता-पिता बच्चों के सामने ऐसे गाने चलाते हैं और उन्हें उन पर नृत्य करने के लिए प्रोत्साहित भी करते हैं, जबकि गानों के बोल और संदेश पर ध्यान नहीं दिया जाता। उनका तर्क है कि यदि बच्चों और युवाओं पर मीडिया के प्रभाव को लेकर गंभीर चर्चा करनी है, तो फिल्मों के साथ संगीत और सोशल मीडिया कंटेंट को भी शामिल करना होगा।
एडल्ट फिल्मों की रेटिंग का पालन करने की अपील
गायक ने फिल्मों की उम्र संबंधी प्रमाणन व्यवस्था का पालन करने पर भी जोर दिया। उन्होंने अभिभावकों से अपील की कि वे छोटे बच्चों और शिशुओं को ‘ए’ प्रमाणित फिल्मों में लेकर न जाएं। उनके अनुसार, बच्चों को क्या देखना और सुनना चाहिए, इसकी जिम्मेदारी केवल फिल्म निर्माताओं की नहीं, बल्कि माता-पिता की भी है।
अमाल ने कहा कि फिल्मों के प्रभाव को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, लेकिन दर्शकों से भी अपेक्षा की जानी चाहिए कि वे काल्पनिक कहानी और वास्तविक जीवन के बीच अंतर समझें। हर हिंसक फिल्म, गाने या शो को किसी अपराध का सीधा कारण मानना सही दृष्टिकोण नहीं है।
आंध्र प्रदेश की घटना से शुरू हुई बहस
आंध्र प्रदेश के एक स्कूल में 21 वर्षीय युवक द्वारा चेनसॉ से दो छात्राओं पर हमला किए जाने की घटना के बाद सोशल मीडिया पर हिंसक फिल्मों की भूमिका को लेकर बहस शुरू हुई। रिपोर्टों के अनुसार, इस हमले में कक्षा 10 की एक छात्रा सहित दो छात्राएं घायल हुईं। घटना के बाद कुछ सोशल मीडिया यूजर्स ने ‘एनिमल’ और ‘धुरंधर’ जैसी हिंसक दृश्यों वाली फिल्मों का उल्लेख करते हुए सवाल उठाया कि क्या ऐसी सामग्री युवाओं के व्यवहार को प्रभावित कर सकती है।
फिल्म निर्माता संदीप रेड्डी वांगा ने भी फिल्मों को अपराध के लिए जिम्मेदार ठहराने पर आपत्ति जताई थी। उन्होंने कहा कि किसी गंभीर अपराध के बाद सिनेमा को सुविधाजनक निशाना बनाने के बजाय घटना के पीछे मौजूद व्यापक कारणों को समझने की जरूरत है। अमाल मलिक ने भी इसी बहस में अपनी राय रखते हुए कहा कि सिनेमा का प्रभाव हो सकता है, लेकिन अपराध के लिए केवल फिल्म या कलाकार को दोषी ठहराना समस्या का पूरा समाधान नहीं है।
इस पूरे विवाद ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि मनोरंजन सामग्री की जिम्मेदारी कहां तक होनी चाहिए और बच्चों को हिंसक या आपत्तिजनक कंटेंट से बचाने में परिवार, समाज तथा डिजिटल प्लेटफॉर्म की क्या भूमिका होनी चाहिए।
