2 अप्रैल 2026 (भारत बानी ब्यूरो ) : भारत में बुजुर्गों के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर एक नई चिंता सामने आई है। हालिया अध्ययन में पाया गया है कि जिन परिवारों में बच्चे बेरोजगार हैं, वहां बुजुर्गों में Depression का खतरा लगभग 12 प्रतिशत तक बढ़ जाता है। यह निष्कर्ष Longitudinal Ageing Study in India (LASI) के डेटा के विश्लेषण से सामने आया है।
इस अध्ययन में देशभर के हजारों बुजुर्गों के स्वास्थ्य, सामाजिक स्थिति और पारिवारिक परिस्थितियों का विश्लेषण किया गया। शोधकर्ताओं ने पाया कि परिवार में आर्थिक अस्थिरता और बच्चों की बेरोजगारी का सीधा असर बुजुर्गों की मानसिक स्थिति पर पड़ता है। खासकर ऐसे परिवारों में जहां बुजुर्ग अपने बच्चों पर आर्थिक या भावनात्मक रूप से निर्भर होते हैं, वहां यह प्रभाव और ज्यादा देखा गया।
विशेषज्ञों के अनुसार, भारत में पारिवारिक संरचना अभी भी काफी हद तक संयुक्त या परस्पर निर्भर है। ऐसे में यदि परिवार का युवा सदस्य बेरोजगार रहता है, तो इसका बोझ केवल उसी व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे परिवार को प्रभावित करता है। बुजुर्ग अक्सर अपने बच्चों के भविष्य को लेकर चिंता में रहते हैं, जिससे तनाव और अवसाद जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं।
Depression के लक्षणों में लगातार उदासी, थकान, नींद की समस्या, रुचि में कमी और सामाजिक गतिविधियों से दूरी शामिल हैं। अध्ययन में यह भी पाया गया कि जिन बुजुर्गों के बच्चों को लंबे समय तक रोजगार नहीं मिला, उनमें ये लक्षण ज्यादा स्पष्ट रूप से दिखाई दिए।
LASI के आंकड़े यह भी दर्शाते हैं कि आर्थिक सुरक्षा की कमी और सामाजिक समर्थन का अभाव इस समस्या को और गंभीर बना देता है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह प्रभाव और ज्यादा देखा गया, जहां रोजगार के अवसर सीमित होते हैं और सामाजिक सुरक्षा तंत्र भी कमजोर होता है।
महिलाओं में यह समस्या पुरुषों की तुलना में अधिक पाई गई। विशेषज्ञों का मानना है कि पारंपरिक सामाजिक भूमिकाओं के कारण महिलाएं परिवार की समस्याओं को अधिक गहराई से महसूस करती हैं, जिससे उनके मानसिक स्वास्थ्य पर ज्यादा असर पड़ता है।
शोधकर्ताओं ने यह भी सुझाव दिया है कि इस समस्या से निपटने के लिए केवल रोजगार के अवसर बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि बुजुर्गों के लिए मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को भी मजबूत करना जरूरी है। सामुदायिक स्तर पर काउंसलिंग, सपोर्ट ग्रुप और जागरूकता कार्यक्रम इस दिशा में मददगार हो सकते हैं।
इसके अलावा, परिवार के भीतर संवाद और समर्थन की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण है। यदि परिवार के सदस्य एक-दूसरे की समस्याओं को समझें और मिलकर समाधान खोजें, तो मानसिक दबाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
सरकार और नीति-निर्माताओं के लिए भी यह अध्ययन एक महत्वपूर्ण संकेत है। बढ़ती उम्रदराज आबादी के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य की चुनौतियां भी बढ़ रही हैं। ऐसे में रोजगार नीतियों और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं को इस दृष्टिकोण से भी देखा जाना चाहिए कि उनका प्रभाव बुजुर्गों के मानसिक स्वास्थ्य पर क्या पड़ रहा है।
कुल मिलाकर, Longitudinal Ageing Study in India के इस विश्लेषण ने यह स्पष्ट किया है कि बेरोजगारी का प्रभाव केवल आर्थिक नहीं, बल्कि मानसिक और सामाजिक स्तर पर भी गहरा होता है। खासकर बुजुर्गों के लिए यह एक गंभीर चिंता का विषय है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
Summary
LASI अध्ययन के अनुसार, बच्चों की बेरोजगारी से भारत में बुजुर्गों में डिप्रेशन का जोखिम 12% बढ़ता है, जो पारिवारिक तनाव और आर्थिक असुरक्षा से जुड़ा है।
