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10 अगस्त, 2026 (भारत बानी ब्यूरो ) :  दिल चाहता है’ को हिंदी सिनेमा की उन फिल्मों में गिना जाता है, जिन्होंने दोस्ती, रिश्तों और युवाओं की जिंदगी को नए अंदाज में पेश किया। फिल्म ने एक पूरी पीढ़ी के सोचने और जीने के तरीके को प्रभावित किया, लेकिन आज के नजरिए से देखने पर इसकी कहानी में महिला किरदारों की पेशेवर पहचान की कमी साफ नजर आती है।

फिल्म में आमिर खान, अक्षय खन्ना और सैफ अली खान के किरदारों की दोस्ती, करियर और निजी जिंदगी को विस्तार से दिखाया गया है। तीनों पुरुष किरदारों के सपने, काम और व्यक्तिगत फैसले कहानी का अहम हिस्सा हैं।

इसके विपरीत, फिल्म की महिला किरदारों को मुख्य रूप से पुरुष किरदारों के रिश्तों और भावनात्मक यात्राओं के संदर्भ में देखा जाता है। उनके अपने करियर, महत्वाकांक्षाओं और पेशेवर जीवन को कहानी में ज्यादा जगह नहीं मिलती।

फिल्म की यही कमी आज के दौर में ज्यादा स्पष्ट दिखाई देती है, जब दर्शक महिला किरदारों को केवल प्रेम कहानी का हिस्सा नहीं, बल्कि अपनी स्वतंत्र पहचान, करियर और आकांक्षाओं के साथ देखना चाहते हैं।

फिर भी, ‘दिल चाहता है’ का प्रभाव कम नहीं होता। फिल्म ने शहरी युवाओं की दोस्ती, रिश्तों और भावनात्मक बदलावों को जिस सहजता से दिखाया, उसने हिंदी सिनेमा में एक नई शैली को जन्म दिया।

आज फिल्म को दोबारा देखने पर यह एक दिलचस्प विरोधाभास सामने आता है—‘दिल चाहता है’ ने एक पीढ़ी को बदल दिया, लेकिन अपनी महिला किरदारों को उतनी स्वतंत्रता नहीं दी, जितनी उसके पुरुष किरदारों को मिली।

Bharat Baani Bureau

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