25 सितंबर 2026 (भारत बाणी ब्यूरो): सिद्धार्थ मल्होत्रा और तमन्ना भाटिया की फिल्म ‘द व्वान: फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट’ एक ऐसी कहानी लेकर आती है, जिसमें लोककथा, रहस्य, जंगल और प्रेम को एक साथ पिरोने की कोशिश की गई है। फिल्म का विचार कागज पर दिलचस्प लगता है, लेकिन पर्दे पर यह कहानी उतनी प्रभावी नहीं बन पाती। कमजोर पटकथा, धीमी रफ्तार और कई जगह अनावश्यक रूप से खिंचता हुआ नैरेटिव फिल्म को मनोरंजक अनुभव बनने से रोकता है।
फिल्म का सबसे बड़ा मुद्दा यह है कि वह दर्शकों को अपनी दुनिया में पूरी तरह शामिल करने में संघर्ष करती है। कहानी में रहस्य और फैंटेसी के तत्व मौजूद हैं, लेकिन उनका इस्तेमाल इस तरह नहीं हो पाता कि रोमांच लगातार बना रहे। नतीजा यह है कि कई दृश्यों में दर्शक कहानी से जुड़ने के बजाय यह सोचने लगते हैं कि फिल्म कब आगे बढ़ेगी।
लोककथा और फैंटेसी का मेल
‘द व्वान’ की कहानी भारतीय लोककथाओं और जंगल से जुड़ी रहस्यमय मान्यताओं की पृष्ठभूमि में तैयार की गई है। फिल्म एक ऐसे संसार को सामने लाने की कोशिश करती है, जहां इंसानी दुनिया और अलौकिक शक्तियों के बीच संघर्ष दिखाई देता है।
यह विचार फिल्म को एक अलग पहचान दे सकता था। भारतीय सिनेमा में लोककथाओं और क्षेत्रीय मिथकों को आधुनिक फैंटेसी के साथ जोड़ने की काफी संभावनाएं हैं। लेकिन ‘द व्वान’ में इन तत्वों को पर्याप्त गहराई नहीं मिलती। कहानी कई बार अपनी ही दुनिया के नियमों को स्पष्ट करने के बजाय घटनाओं को आगे बढ़ाने के लिए सुविधाजनक मोड़ लेती नजर आती है।
सिद्धार्थ मल्होत्रा के प्रदर्शन में सीमाएं
सिद्धार्थ मल्होत्रा फिल्म के केंद्रीय किरदार में हैं और कहानी का बड़ा हिस्सा उनके किरदार के इर्द-गिर्द घूमता है। अभिनेता ने एक्शन और भावनात्मक दृश्यों को संभालने की कोशिश की है, लेकिन कमजोर संवाद और असंगत पटकथा उनके प्रदर्शन की प्रभावशीलता सीमित कर देती है।
सिद्धार्थ के किरदार में जिस तरह की भावनात्मक यात्रा दिखाई जानी चाहिए थी, वह पूरी तरह विकसित नहीं हो पाती। कई महत्वपूर्ण क्षणों में किरदार की प्रतिक्रिया और कहानी की परिस्थितियों के बीच पर्याप्त भावनात्मक जुड़ाव महसूस नहीं होता।
उनका स्क्रीन प्रेजेंस जरूर फिल्म को संभालने की कोशिश करता है, लेकिन केवल स्टार पावर कमजोर कहानी की भरपाई नहीं कर पाती।
तमन्ना भाटिया के किरदार को भी नहीं मिला पर्याप्त स्पेस
तमन्ना भाटिया फिल्म में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, लेकिन उनके किरदार को जिस गहराई की जरूरत थी, वह पटकथा में नजर नहीं आती। उनका किरदार कहानी में एक महत्वपूर्ण भावनात्मक और रहस्यमय तत्व जोड़ सकता था, लेकिन लेखन उसे पूरी तरह विकसित नहीं करता।
तमन्ना अपने हिस्से के दृश्यों में प्रभाव छोड़ने की कोशिश करती हैं, मगर कई बार ऐसा लगता है कि किरदार को कहानी की जरूरत के हिसाब से इस्तेमाल किया गया है, न कि एक पूर्ण चरित्र के रूप में विकसित किया गया है।
सबसे बड़ी समस्या: पटकथा
फिल्म की सबसे कमजोर कड़ी इसकी पटकथा है। कहानी में कई ऐसे मोड़ हैं जिनका उद्देश्य दर्शकों में उत्सुकता पैदा करना है, लेकिन वे स्वाभाविक रूप से विकसित नहीं होते।
फिल्म एक रहस्य स्थापित करती है और फिर उसके जवाब तक पहुंचने में काफी समय लेती है। इस दौरान कई दृश्य कहानी को आगे बढ़ाने के बजाय उसकी गति धीमी करते हैं। अगर संपादन ज्यादा चुस्त होता और गैरजरूरी हिस्सों को हटाया जाता, तो फिल्म का प्रभाव बेहतर हो सकता था।
फिल्म के संवाद भी कई जगह कहानी की गंभीरता और फैंटेसी वाले माहौल से मेल नहीं खाते। कुछ संवाद सीधे तौर पर जानकारी देने का काम करते हैं, जबकि उन्हें कहानी के भीतर स्वाभाविक तरीके से प्रस्तुत किया जा सकता था।
हॉरर और रोमांच का संतुलन कमजोर
‘द व्वान’ में रहस्य और डर पैदा करने की कोशिश लगातार दिखाई देती है। जंगल, अंधेरा और अलौकिक शक्तियों का इस्तेमाल वातावरण बनाने के लिए किया गया है। हालांकि, डर का प्रभाव लगातार कायम नहीं रह पाता।
जहां कुछ दृश्य माहौल बनाने में सफल होते हैं, वहीं कई दूसरे दृश्य अपेक्षित तनाव पैदा नहीं कर पाते। फिल्म को जिस तरह के रोमांच और बेचैनी का अनुभव दर्शकों को देना चाहिए, वह बार-बार टूटता है।
फैंटेसी और हॉरर के बीच संतुलन बनाने के बजाय फिल्म कई बार दोनों शैलियों के बीच उलझती हुई नजर आती है।
तकनीकी पक्ष में भी नहीं बचती फिल्म
फिल्म की सिनेमैटोग्राफी में जंगल और प्राकृतिक लोकेशन का इस्तेमाल आकर्षक है। कुछ दृश्यों में वातावरण कहानी के रहस्य को बढ़ाता है। बैकग्राउंड स्कोर भी तनाव पैदा करने की कोशिश करता है।
लेकिन तकनीकी खूबियां अकेले कमजोर पटकथा को नहीं बचा पातीं। दृश्य प्रभावों और फैंटेसी तत्वों का असर भी हर जगह समान नहीं है। कुछ सीक्वेंस बड़े पर्दे पर प्रभाव डाल सकते हैं, लेकिन उनके बीच की कहानी कमजोर पड़ जाती है।
फिल्म क्यों थका देती है?
‘द व्वान’ की सबसे बड़ी समस्या यह नहीं है कि इसकी कहानी महत्वाकांक्षी है, बल्कि यह है कि फिल्म अपनी महत्वाकांक्षा को प्रभावी पटकथा में बदल नहीं पाती। दर्शकों को लगातार नए सवाल दिए जाते हैं, लेकिन उनके जवाब तक पहुंचने का रास्ता इतना धीमा और असमान है कि उत्सुकता धीरे-धीरे कम होने लगती है।
फिल्म के कई हिस्सों में ऐसा महसूस होता है कि कहानी को छोटा और ज्यादा केंद्रित रखा जा सकता था। अनावश्यक विस्तार और धीमी गति फिल्म के अनुभव को और मुश्किल बना देते हैं।
अंतिम फैसला
‘द व्वान: फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट’ में एक दिलचस्प विचार जरूर है—भारतीय लोककथा, जंगल और फैंटेसी को मुख्यधारा की कहानी के साथ जोड़ना। लेकिन इस विचार को प्रभावशाली फिल्म में बदलने के लिए जिस मजबूत पटकथा, गति और चरित्र-निर्माण की जरूरत थी, वह यहां पर्याप्त नहीं दिखाई देती।
सिद्धार्थ मल्होत्रा और तमन्ना भाटिया अपने स्तर पर फिल्म को संभालने की कोशिश करते हैं, लेकिन कमजोर लेखन उनके प्रयासों को सीमित कर देता है। कुछ खूबसूरत लोकेशन और फैंटेसी के दृश्य ध्यान खींचते हैं, लेकिन वे लंबे समय तक दर्शकों की रुचि बनाए रखने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।
अगर आप तेज रफ्तार, लगातार रोमांच और मजबूत कहानी वाली फैंटेसी फिल्म की उम्मीद लेकर जा रहे हैं, तो ‘द व्वान’ आपके धैर्य की परीक्षा ले सकती है।
