9 अक्टूबर 2026 (भारत बाणी ब्यूरो): परिणीति चोपड़ा की नई इन्वेस्टिगेटिव थ्रिलर फिल्म ‘Reporting Live’ पत्रकारिता, अवैध रेत खनन और ताकतवर लोगों के गठजोड़ की कहानी लेकर आई है। फिल्म का विषय गंभीर है और इसमें खोजी पत्रकारों के सामने आने वाली चुनौतियों को दिखाने की कोशिश की गई है। लेकिन कमजोर पटकथा, अनुमान के मुताबिक आगे बढ़ती कहानी और सीमित रोमांच के कारण फिल्म अपने विषय की पूरी क्षमता का इस्तेमाल नहीं कर पाती। फिल्म में परिणीति के साथ देवेन भोजानी, अमोल पालेकर, आदिल हुसैन और शेखर सुमन भी अहम भूमिकाओं में हैं। यह फिल्म 9 अक्टूबर को Netflix पर रिलीज हुई। <Cite refs={[“turn693398search0″,”turn693398search5″,”turn693398search10”]}/>
कहानी: हादसे के पीछे छिपे रेत माफिया का राज
फिल्म की कहानी काल्पनिक कस्बे विसर्गांव में एक पुल ढहने की घटना से शुरू होती है। इस हादसे में कई बच्चों और एक गर्भवती महिला की मौत हो जाती है। शुरुआत में यह एक दुर्घटना नजर आती है, लेकिन धीरे-धीरे इसके पीछे अवैध रेत खनन और प्रभावशाली लोगों के नेटवर्क की भूमिका सामने आने लगती है।
यहीं से कहानी की कमान महत्वाकांक्षी पत्रकार संध्या यादव (परिणीति चोपड़ा) और उनके अनुभवी कैमरामैन विनोद शर्मा (देवेन भोजानी) के हाथों में आती है। दोनों इस मामले की तह तक पहुंचने की कोशिश करते हैं। उनकी जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, उन्हें एहसास होता है कि वे केवल एक दुर्घटना की रिपोर्टिंग नहीं कर रहे, बल्कि एक ऐसे संगठित नेटवर्क को चुनौती दे रहे हैं जिसके पास पैसा, राजनीतिक प्रभाव और अपने हितों की रक्षा करने के कई तरीके हैं।
जांच के दौरान पत्रकारों को धमकियों, निजी सुरक्षा से जुड़े खतरों और अपने ही न्यूज़रूम के भीतर पैदा होने वाली बाधाओं का सामना करना पड़ता है। फिल्म यह दिखाने की कोशिश करती है कि सच सामने लाने की कीमत केवल रिपोर्टर को ही नहीं, बल्कि उसके परिवार और सहकर्मियों को भी चुकानी पड़ सकती है। <Cite refs={[“turn693398search0″,”turn693398search2”]}/>
मजबूत विषय, लेकिन पटकथा में कमी
‘Reporting Live’ का सबसे बड़ा सकारात्मक पक्ष इसका विषय है। अवैध खनन, पर्यावरण को नुकसान, सत्ता और अपराध के बीच संबंध तथा मीडिया संस्थानों पर पड़ने वाले दबाव जैसे मुद्दे आज भी प्रासंगिक हैं।
फिल्म का आधार एक प्रभावशाली खोजी थ्रिलर के लिए पर्याप्त संभावनाएं रखता है। लेकिन कहानी में कई मोड़ ऐसे हैं जिनका अंदाजा दर्शक पहले ही लगा सकते हैं। जांच के दौरान मिलने वाले सुराग अपेक्षित दिशा में आगे बढ़ते हैं और रहस्य धीरे-धीरे खुलने के बजाय कई जगह पहले से अनुमानित लगने लगता है।
एक अच्छी इन्वेस्टिगेटिव थ्रिलर में हर नई जानकारी के साथ खतरा बढ़ना चाहिए और दर्शकों को लगातार यह सवाल परेशान करना चाहिए कि आगे क्या होगा। यहां कुछ दृश्यों में तनाव पैदा होता है, लेकिन वह लंबे समय तक कायम नहीं रह पाता।
फिल्म का दूसरा कमजोर पक्ष यह है कि अवैध खनन की जांच, न्यूज़रूम की राजनीति और पत्रकारों के निजी जीवन पर मंडराते खतरे एक साथ सामने आते हैं। इन सभी पहलुओं को पर्याप्त गहराई देने के बजाय पटकथा कई बार एक कहानी से दूसरी कहानी की ओर बढ़ती दिखाई देती है। नतीजतन, फिल्म का केंद्रीय संघर्ष उतना प्रभावशाली नहीं बन पाता जितना उसके विषय से उम्मीद की जाती है। <Cite refs={[“turn693398search1″,”turn693398search2”]}/>
परिणीति चोपड़ा ने निभाई महत्वाकांक्षी पत्रकार की भूमिका
परिणीति चोपड़ा संध्या यादव के किरदार में एक ऐसी पत्रकार के रूप में दिखाई देती हैं जो अपने करियर में आगे बढ़ना चाहती है और बड़ी खबर के जरिए अपनी पहचान बनाना चाहती है। वह जोखिम उठाने के लिए तैयार है और मामले की तह तक पहुंचने का संकल्प रखती है।
परिणीति ने किरदार को गंभीरता से निभाया है। उनके अभिनय में दृढ़ता दिखाई देती है, खासकर उन दृश्यों में जहां संध्या अपने फैसले पर कायम रहती है। हालांकि, पटकथा उनके किरदार को ज्यादा भावनात्मक परतें नहीं देती। दर्शक उसकी महत्वाकांक्षा को समझते हैं, लेकिन उसके भीतर चलने वाले संघर्ष को महसूस करने के लिए पर्याप्त अवसर नहीं मिलते।
इस वजह से संध्या एक यादगार और जटिल किरदार बनने के बजाय खोजी पत्रकारिता से जुड़ी एक परिचित फिल्मी छवि तक सीमित रह जाती है।
देवेन भोजानी और अमोल पालेकर का प्रभाव
देवेन भोजानी ने कैमरामैन विनोद शर्मा की भूमिका में संयमित अभिनय किया है। उनका किरदार संध्या की तुलना में ज्यादा व्यावहारिक नजर आता है। वह जोखिमों को समझता है और जांच के दौरान सामने आने वाले खतरों को लेकर सतर्क रहता है। देवेन का सहज अभिनय फिल्म को वास्तविकता के करीब लाने में मदद करता है।
अमोल पालेकर भी अपनी भूमिका में प्रभाव छोड़ते हैं। उनका किरदार जांच को एक महत्वपूर्ण दिशा देता है और अवैध खनन के पीछे छिपे व्यापक नेटवर्क को समझने में मदद करता है।
आदिल हुसैन और शेखर सुमन जैसे कलाकार भी फिल्म को मजबूती देने की कोशिश करते हैं। आदिल हुसैन न्यूज़रूम की जिम्मेदारियों और दबावों के बीच फंसे संपादक के रूप में नजर आते हैं, जबकि शेखर सुमन का किरदार मीडिया मालिकों के हितों और पत्रकारिता की स्वतंत्रता के बीच टकराव को सामने लाता है। हालांकि, सहायक किरदारों को भी ज्यादा विस्तार नहीं मिल पाता। <Cite refs={[“turn693398search0″,”turn693398search2”]}/>
निर्देशन और तकनीकी पक्ष
निर्देशक ध्रुव त्रिपाठी ने गंभीर विषय को एक कॉम्पैक्ट इन्वेस्टिगेटिव थ्रिलर के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की है। फिल्म का गहरा दृश्य वातावरण अपराध, भ्रष्टाचार और अवैध खनन की दुनिया के अनुकूल है।
लेकिन निर्देशन और संपादन में वह गति नहीं बन पाती जो इस तरह की कहानी के लिए जरूरी होती है। कई दृश्यों में तनाव की संभावना मौजूद है, लेकिन उसे प्रभावशाली ढंग से विकसित नहीं किया जाता। कुछ घटनाएं भी सुविधाजनक तरीके से आगे बढ़ती हैं, जिससे कहानी की विश्वसनीयता प्रभावित होती है।
फिल्म का विषय पत्रकारिता की जिम्मेदारी और सच सामने लाने के जोखिम पर गंभीर सवाल उठाता है, लेकिन इन सवालों को दर्शकों तक प्रभावी ढंग से पहुंचाने के लिए पटकथा को ज्यादा कसावट, अप्रत्याशित मोड़ और मजबूत चरित्र-चित्रण की जरूरत थी।
क्या ‘Reporting Live’ देखनी चाहिए?
यदि आपको पत्रकारिता, भ्रष्टाचार और अपराध की जांच पर आधारित फिल्में पसंद हैं, तो ‘Reporting Live’ का विषय आपको आकर्षित कर सकता है। फिल्म यह याद दिलाती है कि प्रभावशाली लोगों के खिलाफ सच सामने लाना कई बार बेहद जोखिम भरा हो सकता है।
हालांकि, जो दर्शक तेज रफ्तार, चौंकाने वाले खुलासों और लगातार बढ़ते रोमांच की उम्मीद करते हैं, उन्हें फिल्म निराश कर सकती है। इसकी कहानी में गंभीरता है, कलाकारों का प्रदर्शन कई जगह अच्छा है, लेकिन कमजोर लेखन और अनुमानित घटनाक्रम इसे प्रभावशाली थ्रिलर बनने से रोकते हैं।
अंतिम फैसला: ‘Reporting Live’ एक जरूरी मुद्दे को उठाती है, लेकिन उसे यादगार सिनेमा में बदलने में सफल नहीं होती। परिणीति चोपड़ा और देवेन भोजानी का काम फिल्म को संभालता है, मगर कमजोर पटकथा के कारण इसका असर सीमित रह जाता है।
