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15 अक्टूबर 2026 (भारत बानी ब्यूरो): कैंसर को लंबे समय तक मुख्य रूप से अधिक उम्र के लोगों से जुड़ी बीमारी माना जाता रहा है, लेकिन हाल के वर्षों में कई देशों में कम उम्र के वयस्कों में कुछ प्रकार के कैंसर के मामले बढ़ने की चिंता सामने आई है। कोलोरेक्टल यानी आंतों का कैंसर, स्तन कैंसर, अग्नाशय का कैंसर और कुछ अन्य कैंसर कम उम्र के लोगों में भी देखे जा रहे हैं। वैज्ञानिक इस बदलाव के पीछे संभावित कारणों का अध्ययन कर रहे हैं, लेकिन अभी तक कोई एक ऐसा कारण सामने नहीं आया है जो सभी प्रकार के कैंसर में इस वृद्धि को पूरी तरह समझा सके।

इस विषय को लेकर सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हर प्रकार के कैंसर में एक जैसा रुझान नहीं है। कुछ कैंसर कम उम्र के लोगों में बढ़ रहे हैं, जबकि कई अन्य में ऐसा स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता। इसलिए इस बदलाव को समझने के लिए कैंसर के प्रकार, उम्र, देश, जीवनशैली और स्वास्थ्य संबंधी आंकड़ों को अलग-अलग देखना जरूरी है।

कम उम्र में कैंसर के मामलों पर क्यों बढ़ा ध्यान?

चिकित्सा अनुसंधान में ‘अर्ली-ऑनसेट कैंसर’ शब्द का इस्तेमाल अक्सर 50 वर्ष से कम उम्र में सामने आने वाले कैंसर के लिए किया जाता है। इस श्रेणी में आने वाले मरीजों की संख्या और दरों पर कई शोध समूह नजर रख रहे हैं।

विशेष रूप से कोलोरेक्टल कैंसर को लेकर चिंता बढ़ी है। कुछ देशों में 50 वर्ष से कम आयु के लोगों में इस बीमारी की दर में वृद्धि दर्ज की गई है। इसके कारण कई स्वास्थ्य संस्थानों ने कम उम्र के लोगों में दिखाई देने वाले लक्षणों को नजरअंदाज न करने और जोखिम के आधार पर जांच कराने की जरूरत पर जोर दिया है।

हालांकि, कैंसर के मामलों की संख्या बढ़ने और वास्तविक जोखिम बढ़ने में अंतर होता है। जनसंख्या में वृद्धि, जांच की उपलब्धता और बीमारी का पहले पता चलने जैसे कारक भी दर्ज मामलों को प्रभावित कर सकते हैं। वैज्ञानिक इसलिए केवल कुल मरीजों की संख्या नहीं, बल्कि उम्र के अनुसार बीमारी की दरों का भी अध्ययन करते हैं।

क्या बदलती जीवनशैली इसकी वजह है?

शोधकर्ताओं के अनुसार, कई संभावित कारणों की जांच की जा रही है। इनमें मोटापा, शारीरिक गतिविधि में कमी, खानपान में बदलाव, शराब का सेवन और कुछ प्रकार के प्रसंस्कृत मांस का अधिक सेवन शामिल हैं। इन कारकों का संबंध कुछ कैंसर के जोखिम से पहले भी स्थापित किया जा चुका है।

मोटापा शरीर में हार्मोन, चयापचय और सूजन से जुड़ी प्रक्रियाओं को प्रभावित कर सकता है। वहीं, नियमित शारीरिक गतिविधि की कमी और लंबे समय तक बैठे रहने वाली जीवनशैली भी कई स्वास्थ्य समस्याओं से जुड़ी है। भोजन में फाइबर की कम मात्रा, अधिक कैलोरी वाला आहार और कुछ प्रकार के प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों की अधिक खपत भी अनुसंधान के विषय हैं।

लेकिन इन संभावनाओं को सभी युवा मरीजों पर लागू करना सही नहीं होगा। कैंसर उन लोगों में भी हो सकता है जो स्वस्थ जीवनशैली अपनाते हैं। इसके अलावा, किसी व्यक्ति में कैंसर विकसित होने के पीछे आनुवंशिक बदलाव, पारिवारिक इतिहास और कई अन्य जैविक कारण भी हो सकते हैं।

बचपन और शुरुआती जीवन के कारकों की जांच

वैज्ञानिक यह भी अध्ययन कर रहे हैं कि क्या जीवन के शुरुआती वर्षों में होने वाले कुछ बदलाव बाद में कैंसर के जोखिम को प्रभावित कर सकते हैं। इनमें बचपन का आहार, एंटीबायोटिक दवाओं का उपयोग, आंतों के सूक्ष्मजीवों यानी माइक्रोबायोम में बदलाव और पर्यावरणीय संपर्क शामिल हैं।

आंतों में मौजूद सूक्ष्मजीव पाचन, प्रतिरक्षा प्रणाली और शरीर की कई जैविक प्रक्रियाओं में भूमिका निभाते हैं। कुछ अध्ययनों में माइक्रोबायोम और कोलोरेक्टल कैंसर के बीच संभावित संबंधों की जांच की गई है। फिर भी, किसी विशेष माइक्रोब या बचपन के किसी एक कारक को कम उम्र में बढ़ते कैंसर का निश्चित कारण बताने के लिए पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।

एक और महत्वपूर्ण सवाल यह है कि कैंसर बनने की प्रक्रिया शुरू होने से लेकर बीमारी का पता चलने तक कितना समय बीतता है। कुछ कैंसर कई वर्षों में विकसित होते हैं। इसलिए आज दिखाई देने वाले मामलों के पीछे अतीत में मौजूद जोखिम कारकों की भूमिका भी हो सकती है।

क्या पर्यावरणीय प्रदूषण भी जिम्मेदार हो सकता है?

वायु प्रदूषण, कुछ रसायनों और अन्य पर्यावरणीय कारकों का कैंसर से संबंध कई शोधों में सामने आया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की कैंसर संबंधी जानकारी के अनुसार, तंबाकू, शराब, मोटापा, कुछ संक्रमण और पर्यावरणीय जोखिम कैंसर के महत्वपूर्ण कारकों में शामिल हैं।

हालांकि, कम उम्र के वयस्कों में कुछ कैंसर की बढ़ती दरों को किसी एक प्रदूषक या रसायन से सीधे जोड़ने के लिए अभी और शोध की जरूरत है। वैज्ञानिकों को यह समझना होगा कि अलग-अलग जोखिम एक-दूसरे के साथ कैसे काम करते हैं और किन आबादी में उनका प्रभाव अधिक हो सकता है।

क्या युवाओं को कैंसर की जांच करानी चाहिए?

विशेषज्ञों की सामान्य सलाह है कि लगातार बने रहने वाले या असामान्य लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। बिना स्पष्ट कारण वजन कम होना, मल में खून आना, लंबे समय तक पेट की समस्या, शरीर में नई गांठ या असामान्य रक्तस्राव होने पर चिकित्सकीय सलाह लेना उचित है। इन लक्षणों का मतलब यह नहीं है कि व्यक्ति को कैंसर ही है, क्योंकि इनके कई अन्य कारण भी हो सकते हैं।

कैंसर की जांच हर व्यक्ति के लिए एक जैसी नहीं होती। स्क्रीनिंग की उम्र और तरीका कैंसर के प्रकार, पारिवारिक इतिहास और व्यक्तिगत जोखिम पर निर्भर करते हैं। उदाहरण के लिए, कम उम्र में कोलोरेक्टल कैंसर का पारिवारिक इतिहास रखने वाले व्यक्ति को सामान्य आबादी की तुलना में पहले जांच की जरूरत हो सकती है। इसलिए स्क्रीनिंग के बारे में डॉक्टर से व्यक्तिगत सलाह लेना महत्वपूर्ण है।

तंबाकू से दूरी, शराब का सेवन न करना या सीमित रखना, नियमित शारीरिक गतिविधि, संतुलित आहार और स्वस्थ वजन बनाए रखना कई प्रकार के कैंसर के जोखिम को कम करने में मदद कर सकता है। लेकिन कोई भी जीवनशैली पूरी तरह कैंसर से सुरक्षा की गारंटी नहीं देती।

वैज्ञानिकों के सामने आगे की चुनौती

कम उम्र के लोगों में कैंसर के बदलते रुझानों को समझने के लिए लंबे समय तक चलने वाले अध्ययन, बेहतर कैंसर रजिस्ट्रियां और विभिन्न देशों के आंकड़ों की तुलना जरूरी है। शोधकर्ताओं को यह भी पता लगाना होगा कि कौन-से कारक सीधे बीमारी का कारण बनते हैं और कौन-से केवल उसके साथ जुड़े दिखाई देते हैं।

फिलहाल वैज्ञानिकों के पास संभावित कारणों की सूची है, लेकिन सभी सवालों के निश्चित उत्तर नहीं हैं। यही वजह है कि कम उम्र में कैंसर के बढ़ते मामलों को गंभीरता से लेते हुए भी किसी एक कारण को जिम्मेदार ठहराने से बचना जरूरी है। बेहतर अनुसंधान, समय पर चिकित्सकीय जांच और जोखिम कम करने वाली आदतें इस चुनौती से निपटने में अहम भूमिका निभा सकती हैं।

Bharat Baani Bureau

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