05फ़रवरी2026 (भारत बानी ब्यूरो) : एक गेम, एक टास्क और सेकंड में पूरा परिवार तबाह। आज का दौर मोबाइल फ़ोन का दौर है, लेकिन हंसते-खेलते बच्चे स्क्रीन में इस कदर डूब रहे हैं कि मां-बाप को पता भी नहीं चलता और जिंदगी हाथ से फिसल जाती है। जी हां गाजियाबाद के दर्दनाक हादसे ने पूरे देश को हिला दिया है। 3 फरवरी 2026 की रात तीन सगी बहनों ने 9वीं मंजिल से कूदकर जान दे दी। बच्चियों की उम्र 16 साल, 14 साल और सिर्फ 12 साल की थी। जो मोबाइल गेम ‘कोरियन लवर’ की आदी थीं। गेम के आखिरी टास्क के नाम पर बच्चियों ने आत्महत्या कर ली। घर में माता-पिता थे, लेकिन बच्चों की दुनिया बस मोबाइल बन चुका था।
पुलिस को मिला सुसाइड नोट दिल दहला देने वाला था। मोबाइल बच्चों की जिंदगी बन गया था। बच्चियां तीन साल से गेम की गिरफ्त में थी मां-बाप को खबर ही नहीं लगी और परिवार बर्बाद हो गया। ये अकेली घटना नहीं है। कर्नाटक में एक 13 साल का बच्चा छत से कूद गया, जबकि मां घर के अंदर थी। बच्चा मोबाइल गेम के चैलेंज के चक्कर में था। मतलब मोबाइल गेम्स अब सिर्फ मनोरंजन नहीं जानलेवा बन चुके हैं। अब दिमाग में सवाल आता है कि ये मोबाइल गेम्स आखिर बच्चों के दिमाग के साथ कैसे खेलतें हैं?
बच्चों के लिए जानलेवा गेम
असल में भारत में इस वक्त करीब ’59 करोड़ गेमर्स’ हैं। करीब 74% Gen Z हर हफ्ते 6 घंटे से ज्यादा गेम खेलते हैं। डॉक्टर्स के पास हर हफ्ते ‘4 से 5 केस सिर्फ गेमिंग एडिक्शन’ के आ रहे हैं। कर्नाटक में तो कुछ महीनों के अंदर सुसाइड के 32 केस आए, जो सीधे-सीधे ऑनलाइन गेमिंग से जुड़े थे।
गेम से बच्चों के दिमाग पर असर
हेल्थ एक्सपर्ट्स के मुताबिक गेम जीतने पर दिमाग में डोपामिन रिलीज होता है और यही खुशी धीरे-धीरे एडिक्शन बन जाती है। हार हुई तो गुस्सा, चिड़चिड़ापन, नींद खराब, पढ़ाई खत्म, रिश्ते टूटने लगते हैं। 2026 की एक स्टडी के मुताबिक हाल ये है कि भारत में 60% मानसिक बीमारियां 35 साल से कम उम्र में शुरू हो रही हैं और इसकी बड़ी वजह मोबाइल, स्क्रीन और ऑनलाइन गेमिंग का नशा है। दरअसल, आज जरूरत सिर्फ रोक-टोक की नहीं है। बात समझने की है और बात करने की है। पेरेंट्स को बच्चों के दिल और दिमाग को पढ़ना होगा। वरना गेम के एक छोटे से टास्क के नाम पर बच्चों की जिंदगी यूं ही खत्म होती रहेंगी।
सोशल मीडिया के नुकसान
- घबराहट
- अकेलापन
- अनिद्रा
- डिप्रेशन
- हकीकत से दूरी
- डिजिटल एडिक्शन
TEXT NECK सिंड्रोम का असर
- सिरदर्द, गर्दन में अकड़न, झुनझुनी और पीठ दर्द
- बीमारी की गिरफ्त में 14 से 24 साल के युवा
- पिछले एक साल में 15 से 20% मामले बढ़े
- युवा 24 घंटे में से 5-6 घंटे सेलफोन पर रहते हैं
- MNC’s वाले 8 घंटे लैपटॉप,5-6 घंटे मोबाइल पर
- 20% पढ़ाई करने वाले मोबाइल पर रहते हैं
सारांश:
बच्चों में ऑनलाइन गेम्स और सोशल मीडिया रील्स की लत तेजी से बढ़ रही है। यह उनकी मेंटल हेल्थ पर नकारात्मक असर डाल रही है और चिंता, तनाव और अन्य मानसिक समस्याओं को जन्म दे रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, समय पर रोक और सही मार्गदर्शन जरूरी है।
