2 सितंबर , 2026 (भारत बानी ब्यूरो ) : पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल ने बुधवार को भारतीय शेयर बाजार पर भारी दबाव डाला। मजबूत आर्थिक वृद्धि के आंकड़ों के बावजूद निवेशकों की धारणा कमजोर रही और सेंसेक्स तथा निफ्टी में करीब 1 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई। वैश्विक बाजारों में जारी बिकवाली और तेल की कीमतों में तेजी ने घरेलू बाजार की चिंताओं को और बढ़ा दिया।
बाजार में शुरुआती कारोबार के दौरान ही भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिला। बाद में प्रमुख सूचकांकों ने कुछ नुकसान की भरपाई की, लेकिन निवेशकों के बीच जोखिम से बचने की प्रवृत्ति बनी रही। बुधवार को सेंसेक्स 370 अंक से अधिक नीचे आया, जबकि निफ्टी भी महत्वपूर्ण स्तरों के नीचे फिसला। दिन के अंत में सेंसेक्स 76,570.35 पर और निफ्टी 23,914.45 पर बंद हुआ।
पश्चिम एशिया संघर्ष बना सबसे बड़ा दबाव
अमेरिका और ईरान के बीच जारी सैन्य संघर्ष ने वैश्विक वित्तीय बाजारों में अनिश्चितता बढ़ा दी है। अमेरिकी सेना द्वारा ईरान के खिलाफ ताजा हमले और उसके बाद संभावित जवाबी कार्रवाई की आशंका ने निवेशकों को सतर्क कर दिया है।
विशेष चिंता स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर है, जो दुनिया के प्रमुख तेल परिवहन मार्गों में शामिल है। इस क्षेत्र में सैन्य तनाव बढ़ने से वैश्विक तेल आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका ने कच्चे तेल की कीमतों को ऊपर धकेला है।
भारत दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल आयातकों में से एक है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत बढ़ने का सीधा असर देश के आयात बिल, चालू खाते और महंगाई पर पड़ सकता है। इससे कंपनियों की उत्पादन और परिवहन लागत भी बढ़ने की आशंका रहती है।
Brent Crude करीब 95 डॉलर के स्तर पर
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच Brent crude की कीमत करीब 95 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई। Reuters के अनुसार, बुधवार को Brent crude लगभग 94.87 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचा, जो कई सप्ताह का उच्च स्तर है।
तेल की कीमतों में यह तेजी भारतीय बाजार के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। यदि कच्चा तेल लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर रहता है, तो इससे महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है और आर्थिक विकास की रफ्तार पर भी असर पड़ सकता है।
मजबूत GDP आंकड़े भी नहीं संभाल पाए बाजार
बाजार में गिरावट ऐसे समय आई है जब भारतीय अर्थव्यवस्था से मजबूत वृद्धि के संकेत मिले हैं। मजबूत GDP वृद्धि को घरेलू अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक माना जा रहा है, लेकिन फिलहाल वैश्विक जोखिमों ने इस सकारात्मक खबर को पीछे छोड़ दिया है।
निवेशकों की चिंता इस बात को लेकर है कि यदि तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं, तो इससे भारत की आर्थिक वृद्धि पर दबाव पड़ सकता है। ऊंची ऊर्जा लागत से परिवहन, विनिर्माण और अन्य क्षेत्रों की लागत बढ़ सकती है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी बुधवार को वैश्विक परिस्थितियों और बढ़ती आयात लागत के बीच घरेलू अर्थव्यवस्था को मजबूत करने पर जोर दिया और अनावश्यक आयात तथा विदेशी खर्च को कम करने की अपील की।
11 में से 16 सेक्टरों में गिरावट
बुधवार के कारोबार में बाजार की कमजोरी व्यापक रही। Reuters के अनुसार, निफ्टी के 16 प्रमुख सेक्टोरल इंडेक्स में से 11 में गिरावट दर्ज की गई। मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों पर भी दबाव देखा गया।
ऑटोमोबाइल, रियल एस्टेट और FMCG जैसे कई सेक्टरों में बिकवाली देखने को मिली। बढ़ते ईंधन और इनपुट खर्च की आशंका के कारण निवेशक उन कंपनियों को लेकर सतर्क रहे जिनकी लागत सीधे ऊर्जा कीमतों से प्रभावित होती है।
हालांकि, कुछ ऊर्जा से जुड़ी कंपनियों के शेयरों को ऊंचे तेल और कमोडिटी मूल्यों से लाभ मिलने की उम्मीद के कारण अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन करते देखा गया। Coal India में करीब 4.1 प्रतिशत की तेजी दर्ज हुई।
बॉन्ड यील्ड बढ़ने से भी दबाव
शेयर बाजार पर केवल तेल की तेजी का ही असर नहीं पड़ा। वैश्विक बॉन्ड बाजार में भी भारी बिकवाली देखी गई। अमेरिकी 10-वर्षीय ट्रेजरी यील्ड लगभग 4.81 प्रतिशत तक पहुंच गई, जो करीब तीन वर्षों का उच्च स्तर है।
बॉन्ड यील्ड बढ़ने से निवेशकों के लिए सुरक्षित और ब्याज देने वाली परिसंपत्तियां अधिक आकर्षक हो जाती हैं। इससे उभरते बाजारों से विदेशी पूंजी निकलने का जोखिम बढ़ सकता है और शेयर बाजार पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
रुपये और महंगाई पर भी नजर
तेल की कीमतों में तेजी का असर भारतीय रुपये पर भी पड़ सकता है क्योंकि महंगा कच्चा तेल डॉलर की मांग बढ़ाता है। हालांकि बुधवार को भारतीय रिजर्व बैंक के हस्तक्षेप के कारण रुपया अपेक्षाकृत स्थिर रहा और लगभग 94.97 रुपये प्रति डॉलर पर बंद हुआ।
बाजार विशेषज्ञों की नजर अब इस बात पर है कि पश्चिम एशिया में संघर्ष कितने समय तक जारी रहता है और क्या तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर की ओर बढ़ती हैं। यदि ऐसा होता है, तो भारतीय बाजार में अस्थिरता और बढ़ सकती है।
आगे बाजार की दिशा पर क्या होगा असर?
आने वाले दिनों में निवेशकों के लिए पश्चिम एशिया की स्थिति, कच्चे तेल की कीमतें, विदेशी संस्थागत निवेशकों की गतिविधियां, रुपये की चाल और वैश्विक बॉन्ड यील्ड महत्वपूर्ण संकेतक होंगे।
मजबूत घरेलू आर्थिक आंकड़े भारतीय बाजार के लिए सकारात्मक आधार प्रदान कर रहे हैं, लेकिन वैश्विक भू-राजनीतिक जोखिम फिलहाल बाजार की दिशा पर हावी हैं। यदि पश्चिम एशिया में तनाव कम होता है और तेल की कीमतें स्थिर होती हैं, तो घरेलू आर्थिक मजबूती के आधार पर बाजार में सुधार देखने को मिल सकता है।
इसके विपरीत, संघर्ष बढ़ने और तेल की कीमतों में और तेजी आने पर महंगाई तथा ब्याज दरों को लेकर चिंताएं बढ़ सकती हैं। ऐसे परिदृश्य में भारतीय शेयर बाजार में आने वाले दिनों में उतार-चढ़ाव जारी रहने की संभावना है।
