2 सितंबर , 2026 (भारत बानी ब्यूरो ) : हिमाचल प्रदेश में इस साल सेब उत्पादन में भारी गिरावट के बीच अदाणी एग्री फ्रेश और अन्य निजी नियंत्रित वातावरण (CA) स्टोर संचालकों द्वारा घोषित शुरुआती खरीद दरों ने बागवानों को निराश किया है। बागवानों का कहना है कि जब राज्य में सेब की फसल पिछले साल की तुलना में काफी कम है, तब बाजार में मांग और आपूर्ति के आधार पर उन्हें बेहतर कीमत मिलनी चाहिए थी।
अदाणी एग्री फ्रेश, जो हिमाचल प्रदेश में सेब खरीदने वाली सबसे बड़ी निजी कंपनियों में से एक है, ने इस सीजन में बड़े, मध्यम और छोटे आकार के सेब के लिए 108 रुपये प्रति किलोग्राम की शुरुआती दर घोषित की है। सबसे निचली श्रेणी यानी ‘पिट्टू’ के लिए कंपनी ने 60 रुपये प्रति किलोग्राम का रेट तय किया है। अन्य निजी CA स्टोर संचालकों की शुरुआती दरें भी लगभग इसी स्तर के आसपास बताई गई हैं।
उत्पादन में भारी गिरावट
इस साल हिमाचल प्रदेश में सेब उत्पादन में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की जा रही है। पिछले साल राज्य में करीब 3.49 करोड़ सेब पेटियों का उत्पादन हुआ था। इस वर्ष बागवानी विभाग का अनुमान लगभग 2 करोड़ पेटियों का है। हालांकि, कई बागवानों का मानना है कि वास्तविक उत्पादन इससे भी कम रह सकता है और यह करीब 1.5 करोड़ पेटियों तक सीमित हो सकता है।
बागवानों का कहना है कि उत्पादन में इतनी बड़ी गिरावट के बावजूद निजी कंपनियों द्वारा घोषित खरीद दर उनकी उम्मीदों के अनुरूप नहीं है। उनका तर्क है कि कम उत्पादन का अर्थ बाजार में उपलब्धता कम होना है और सामान्य मांग-आपूर्ति के नियम के तहत इससे कीमतों में बढ़ोतरी होनी चाहिए।
पिट्टू के लिए 60 रुपये का रेट
बागवानों की सबसे बड़ी चिंता ‘पिट्टू’ और उससे थोड़ी बेहतर गुणवत्ता वाले सेबों को लेकर है। रोहड़ू के बागवान लोकिंदर बिष्ट के अनुसार, इस बार बड़ी मात्रा में उत्पादन पिट्टू या उससे थोड़ी बेहतर ग्रेड का हो सकता है। ऐसे में 60 रुपये प्रति किलोग्राम की खरीद दर बागवानों के लिए संतोषजनक नहीं है। उनका कहना है कि खुले बाजार में इस समय पिट्टू सेब इससे बेहतर कीमत पर बिक रहा है।
बागवानों के सामने यह सवाल भी है कि यदि खुले बाजार में किसी ग्रेड के सेब के लिए बेहतर कीमत मिल रही है, तो CA स्टोर संचालकों द्वारा घोषित शुरुआती दरों को क्यों स्वीकार किया जाए। हालांकि, सेब कारोबार से जुड़े लोगों का कहना है कि निजी कंपनियों की घोषित दरें पूरे बाजार की दिशा को प्रभावित करती हैं।
निजी कंपनियों की दरों का मंडियों पर असर
संयुक्त किसान मंच के संयोजक हरीश चौहान के अनुसार, निजी कंपनियों द्वारा घोषित शुरुआती खरीद दरों का असर खुले बाजार और मंडियों की कीमतों पर भी पड़ता है। उनका कहना है कि यदि बड़ी कंपनियां कम कीमत से खरीद शुरू करती हैं, तो इससे बाजार में अन्य खरीदार भी अपनी खरीद दर कम करने की कोशिश कर सकते हैं।
बागवानों की चिंता इसलिए भी बढ़ी हुई है क्योंकि CA स्टोर संचालकों के अलावा कई आढ़ती और लोडर भी अगस्त के बाद तैयार होने वाले सेब को खरीदकर भंडारण करते हैं। कारोबारियों को बाद में बेहतर कीमत मिलने की उम्मीद रहती है, इसलिए कम खरीद मूल्य पर सेब खरीदना उनके लिए अधिक लाभदायक हो सकता है।
लागत बढ़ने से बागवानों पर दबाव
हिमाचल की सेब अर्थव्यवस्था में बागवानों की आय का बड़ा हिस्सा सेब की फसल पर निर्भर करता है। उत्पादन लागत में मजदूरी, खाद, कीटनाशक, पैकेजिंग, परिवहन और बागों के रखरखाव का खर्च शामिल है।
बागवानों का कहना है कि इन लागतों में लगातार वृद्धि हुई है। ऐसे में यदि फसल कम होने के बावजूद खरीद दर अपेक्षाकृत कम रहती है, तो उनकी आय पर सीधा असर पड़ेगा।
इस साल उत्पादन में गिरावट ने स्थिति को और जटिल बना दिया है। कम फसल का मतलब यह भी है कि कई बागवानों को पूरे सीजन में बेचने के लिए पहले की तुलना में काफी कम मात्रा में सेब उपलब्ध होगा।
सरकारी स्तर पर नियमन की मांग
निजी CA स्टोर संचालकों द्वारा खरीद दर तय करने को लेकर हिमाचल में पहले भी विवाद सामने आते रहे हैं। बागवान संगठनों का कहना है कि सरकार को निजी कंपनियों की खरीद दरों और बाजार कीमतों के बीच बेहतर पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए व्यवस्था विकसित करनी चाहिए।
पिछली भाजपा सरकार के दौरान निजी CA ऑपरेटरों की कीमत तय करने की प्रक्रिया में सरकार और बागवानों के प्रतिनिधियों को शामिल करने के लिए एक समिति बनाने का प्रयास किया गया था, लेकिन यह व्यवस्था प्रभावी रूप से लागू नहीं हो सकी।
आगे कीमतों पर नजर
अब बागवानों और सेब कारोबारियों की नजर आने वाले दिनों में मंडी भाव और निजी CA स्टोर की खरीद दरों पर रहेगी। यदि खुले बाजार में कीमतें लगातार ऊंची रहती हैं, तो बागवान निजी कंपनियों की शुरुआती दरों के बजाय मंडियों में अपनी फसल बेचने को प्राथमिकता दे सकते हैं।
दूसरी ओर, यदि निजी कंपनियों की खरीद बढ़ती है और बाजार में आवक कम रहती है, तो कीमतों में आगे बदलाव की संभावना भी बनी हुई है।
हिमाचल के सेब बागवानों के लिए इस सीजन की सबसे बड़ी चुनौती केवल उत्पादन में गिरावट नहीं, बल्कि कम फसल के बावजूद अपनी उपज के लिए उचित मूल्य प्राप्त करना है। बागवानों का कहना है कि जब फसल लगभग आधी रह गई है, तब बाजार में उनकी उपज का मूल्य उसी अनुपात में बढ़ना चाहिए।
फिलहाल अदाणी एग्री फ्रेश की शुरुआती दरों ने हिमाचल के सेब उत्पादकों के बीच असंतोष पैदा किया है। आने वाले सप्ताहों में मंडियों में वास्तविक कीमतें और निजी CA स्टोरों की खरीद रणनीति यह तय करेगी कि इस साल कम उत्पादन का लाभ आखिरकार बागवानों को मिलता है या बाजार के अन्य हिस्सों को।
