4 सितंबर , 2026 (भारत बानी ब्यूरो ) : अस्पताल से मरीज की छुट्टी होना अक्सर इलाज के अंत के रूप में देखा जाता है, लेकिन कई मरीजों के लिए यह असल में recovery के एक नए चरण की शुरुआत होती है। स्ट्रोक, गंभीर चोट, सर्जरी, फ्रैक्चर, न्यूरोलॉजिकल बीमारी या लंबे समय तक ICU में रहने के बाद मरीज को घर लौटने के बावजूद चलने, बोलने, निगलने, दैनिक काम करने या सामान्य जीवन में वापस आने में कठिनाई हो सकती है। ऐसे मामलों में रिहैबिलिटेशन यानी पुनर्वास उपचार recovery का महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, रिहैबिलिटेशन केवल दिव्यांग लोगों के लिए नहीं है। चोट, बीमारी, सर्जरी या उम्र बढ़ने के कारण किसी व्यक्ति की functioning प्रभावित होने पर इसकी जरूरत पड़ सकती है। WHO का अनुमान है कि दुनिया भर में करीब 2.4 अरब लोग ऐसी स्वास्थ्य स्थितियों के साथ रह रहे हैं जिनसे उन्हें rehabilitation से लाभ मिल सकता है।
अस्पताल से छुट्टी के बाद शुरू होती है दूसरी चुनौती
अस्पताल में इलाज का मुख्य उद्देश्य बीमारी या चोट को नियंत्रित करना और मरीज की मेडिकल स्थिति को स्थिर करना होता है। लेकिन मरीज के स्थिर होने के बाद भी उसकी ताकत, mobility और रोजमर्रा की कार्यक्षमता पूरी तरह वापस नहीं आई होती।
उदाहरण के लिए स्ट्रोक के बाद किसी मरीज को हाथ-पैर चलाने, संतुलन बनाने, बोलने या निगलने में परेशानी हो सकती है। इसी तरह हड्डी की सर्जरी के बाद मरीज को मांसपेशियों की ताकत और चलने की क्षमता वापस पाने के लिए physiotherapy की जरूरत हो सकती है।
ऐसे मरीजों के लिए discharge के समय केवल दवाइयों की सूची और अगली डॉक्टर की appointment पर्याप्त नहीं हो सकती। एक स्पष्ट rehabilitation plan, follow-up और caregiver education भी recovery का हिस्सा होना चाहिए।
हाल की विशेषज्ञ सलाह में भी स्ट्रोक rehabilitation को अस्पताल से छुट्टी के बाद तक टालने के बजाय hospital stay के दौरान ही शुरू करने पर जोर दिया गया है। मरीज की mobility, speech, swallowing और daily activities का आकलन कर personalized recovery plan तैयार किया जा सकता है।
रिहैबिलिटेशन आखिर क्यों जरूरी है?
रिहैबिलिटेशन का लक्ष्य केवल मरीज को व्यायाम कराना नहीं है। इसका उद्देश्य व्यक्ति को अधिक से अधिक स्वतंत्र बनाना और उसे परिवार, काम, शिक्षा तथा सामाजिक जीवन में दोबारा भाग लेने में सक्षम बनाना है।
इसके लिए अलग-अलग विशेषज्ञों की जरूरत पड़ सकती है। इनमें physiotherapists, occupational therapists, speech and language therapists, psychologists, rehabilitation doctors और rehabilitation nurses शामिल हो सकते हैं। जरूरत के अनुसार assistive devices और घर के वातावरण में बदलाव भी rehabilitation का हिस्सा हो सकते हैं।
उदाहरण के तौर पर, किसी बुजुर्ग मरीज के घर में गिरने का जोखिम कम करने के लिए बदलाव किए जा सकते हैं। स्ट्रोक मरीज को चलने और संतुलन की ट्रेनिंग दी जा सकती है। बोलने में समस्या वाले व्यक्ति को speech therapy मिल सकती है, जबकि गंभीर चोट के बाद psychological support भी recovery में महत्वपूर्ण हो सकता है।
भारत में accessibility बड़ी चुनौती
भारत में rehabilitation की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है—सेवाओं की उपलब्धता और मरीज की पहुंच के बीच अंतर। बड़े शहरों में अस्पताल, physiotherapy centres और specialized rehabilitation facilities उपलब्ध हो सकती हैं, लेकिन छोटे शहरों, ग्रामीण क्षेत्रों और दूरदराज के इलाकों में विकल्प सीमित हो सकते हैं।
WHO भी बताता है कि कई देशों में rehabilitation सेवाएं मुख्य रूप से secondary और tertiary healthcare facilities में केंद्रित रहती हैं। इससे ग्रामीण और underserved आबादी के लिए दूरी, यात्रा खर्च और waiting time जैसी समस्याएं पैदा होती हैं। WHO rehabilitation को primary healthcare और community settings तक ले जाने पर जोर देता है।
भारत जैसे विशाल देश में यह बदलाव विशेष महत्व रखता है। यदि मरीज को हर therapy session के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़े, तो परिवार के लिए आर्थिक और समय संबंधी बोझ बढ़ जाता है। कई मामलों में यही कारण होता है कि मरीज prescribed rehabilitation पूरा नहीं कर पाता।
खर्च भी बड़ी बाधा
अस्पताल में इलाज का खर्च वहन करने के बाद परिवारों के सामने लंबे rehabilitation programme का खर्च एक अतिरिक्त चुनौती बन सकता है। Physiotherapy, occupational therapy, speech therapy, assistive devices और repeated consultations की जरूरत कई सप्ताह या महीनों तक रह सकती है।
WHO के अनुसार, rehabilitation की unmet need के प्रमुख कारणों में inadequate financing, high out-of-pocket costs, trained professionals की कमी और कमजोर referral systems शामिल हैं।
इसलिए healthcare coverage को केवल अस्पताल में admission और treatment तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं होगा। Rehabilitation को भी healthcare continuum का हिस्सा बनाना जरूरी है।
घर और समुदाय तक पहुंचे सेवाएं
विशेषज्ञों के अनुसार, rehabilitation को अस्पतालों से बाहर community और home-based care तक पहुंचाना accessibility सुधारने का प्रभावी तरीका हो सकता है।
WHO के अनुसार rehabilitation outpatient clinics, homes, schools और workplaces सहित विभिन्न settings में प्रदान की जा सकती है। Primary healthcare के स्तर पर basic rehabilitation services उपलब्ध होने से मरीजों को specialist centres पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।
टेली-रिहैबिलिटेशन और digital consultations भी दूरदराज के क्षेत्रों में उपयोगी हो सकते हैं। 2025 की WHO policy brief ने remote और underserved क्षेत्रों में digital platforms के जरिए rehabilitation consultations की उपयोगिता पर भी जोर दिया है।
परिवार और caregivers की भूमिका
अस्पताल से घर लौटने के बाद मरीज की recovery में परिवार की भूमिका काफी बढ़ जाती है। लेकिन caregivers को भी सही जानकारी और प्रशिक्षण की जरूरत होती है।
उन्हें यह समझना जरूरी है कि मरीज को कौन से exercises करने हैं, कितनी गतिविधि सुरक्षित है, गिरने से कैसे बचाना है और किन लक्षणों पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। बिना उचित guidance के परिवार कभी-कभी मरीज को जरूरत से ज्यादा आराम कराता है या इसके विपरीत अत्यधिक activity करा देता है।
इसलिए discharge planning में caregiver education को शामिल करना महत्वपूर्ण है।
स्वास्थ्य व्यवस्था में rehabilitation को मिले प्राथमिकता
भारत में universal health coverage की दिशा में healthcare services का विस्तार हुआ है। WHO India के अनुसार universal health coverage में promotion, prevention और treatment के साथ rehabilitation और palliative care भी शामिल हैं।
अब चुनौती यह है कि rehabilitation को healthcare system में केवल एक supplementary service के रूप में नहीं, बल्कि उपचार की निरंतर प्रक्रिया के रूप में देखा जाए।
इसके लिए primary healthcare centres में basic rehabilitation services, district-level multidisciplinary teams, trained workforce, affordable financing और बेहतर referral networks विकसित करने की जरूरत है।
discharge को recovery का अंत नहीं मानना होगा
अस्पताल से छुट्टी मरीज के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है, लेकिन कई लोगों के लिए यह recovery की शुरुआत होती है। यदि मरीज को अस्पताल से घर भेजने के बाद आवश्यक rehabilitation नहीं मिलती, तो वह अपनी पूरी functional क्षमता हासिल नहीं कर पाता और परिवार पर लंबे समय तक देखभाल का बोझ बढ़ सकता है।
WHO के अनुसार समय पर rehabilitation hospitalization और readmissions को कम करने, independence बढ़ाने और लोगों को काम तथा दैनिक जीवन में वापस लौटने में मदद कर सकती है।
भारत के लिए इसलिए अगला महत्वपूर्ण कदम ऐसा healthcare model बनाना है जिसमें “discharge” को treatment का अंत नहीं, बल्कि coordinated recovery journey की शुरुआत माना जाए। अस्पताल, डॉक्टर, rehabilitation professionals, primary healthcare centres और परिवार—इन सभी के बीच बेहतर तालमेल ही यह सुनिश्चित कर सकता है कि मरीज सिर्फ अस्पताल से बाहर न आए, बल्कि बेहतर स्वास्थ्य और अधिक स्वतंत्र जीवन की ओर वास्तव में आगे बढ़ सके।
