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15 सितंबर 2026 (भारत बानी ब्यूरो)। मांसपेशियां काम करते समय ऊर्जा कहां से प्राप्त करती हैं और उस ऊर्जा का शरीर में किस तरह इस्तेमाल होता है—यह सवाल एक सदी से भी अधिक समय पहले वैज्ञानिकों के लिए बड़ी पहेली था। इसी पहेली को समझने में ब्रिटिश फिजियोलॉजिस्ट आर्चिबाल्ड वी. हिल और जर्मन वैज्ञानिक ओटो मेयरहोफ के शोध ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। दोनों वैज्ञानिकों को 1922 का नोबेल पुरस्कार फिजियोलॉजी या मेडिसिन संयुक्त रूप से दिया गया था।

हिल को मांसपेशियों में ऊष्मा के उत्पादन से संबंधित खोज के लिए, जबकि मेयरहोफ को ऑक्सीजन की खपत और मांसपेशियों में लैक्टिक एसिड के मेटाबॉलिज्म के बीच संबंध की खोज के लिए सम्मानित किया गया। दिलचस्प बात यह है कि दोनों ने 1922 का पुरस्कार वास्तव में 1923 में प्राप्त किया, क्योंकि 1922 में पुरस्कार के लिए चयन प्रक्रिया पूरी होने के बाद निर्णय को एक वर्ष के लिए स्थगित किया गया था।

मांसपेशियों की ऊर्जा का रहस्य

मांसपेशियों के संकुचन को लंबे समय तक मुख्य रूप से एक यांत्रिक प्रक्रिया के रूप में देखा जाता था। हिल ने इसे थर्मोडायनामिक्स के नजरिए से समझने की कोशिश की। उन्होंने मांसपेशी के काम करने के दौरान पैदा होने वाली गर्मी को मापा और यह समझने का प्रयास किया कि रासायनिक ऊर्जा किस तरह यांत्रिक कार्य और ऊष्मा में बदलती है।

उनके प्रयोगों ने दिखाया कि मांसपेशियों में ऊर्जा उत्पादन केवल संकुचन के तत्काल क्षण तक सीमित नहीं रहता। आराम या रिकवरी के दौरान भी एक महत्वपूर्ण मात्रा में गर्मी पैदा होती है। हिल ने इसे “recovery heat” के रूप में अध्ययन किया और पाया कि यह प्रक्रिया ऑक्सीजन की मौजूदगी से जुड़ी हुई है।

उनके शोध ने इस विचार को मजबूत किया कि मांसपेशी में ऊर्जा उत्पादन को समझने के लिए केवल उसके यांत्रिक काम को देखना पर्याप्त नहीं है। उसके पीछे चलने वाली रासायनिक और ऊष्मागतिक प्रक्रियाओं को भी समझना जरूरी है।

मेयरहोफ ने रासायनिक प्रक्रिया को समझाया

जहां हिल ने मुख्य रूप से मांसपेशियों में गर्मी और ऊर्जा के भौतिक पहलू का अध्ययन किया, वहीं ओटो मेयरहोफ ने इस प्रक्रिया के जैव-रासायनिक पक्ष पर काम किया।

मेयरहोफ ने मेंढक की मांसपेशियों पर किए प्रयोगों में ऑक्सीजन की खपत, लैक्टिक एसिड और कार्बोहाइड्रेट के बीच संबंधों का अध्ययन किया। उन्होंने दिखाया कि मांसपेशी के काम करने के दौरान कार्बोहाइड्रेट से लैक्टिक एसिड बनता है और रिकवरी के दौरान लैक्टिक एसिड का एक हिस्सा ऑक्सीकरण होता है, जबकि बाकी हिस्सा दोबारा कार्बोहाइड्रेट में परिवर्तित किया जा सकता है।

यह काम उस समय बेहद महत्वपूर्ण था क्योंकि इससे पहली बार मांसपेशियों की ऊर्जा व्यवस्था को एक व्यवस्थित रासायनिक प्रक्रिया के रूप में समझने का रास्ता खुला।

ऑक्सीजन की भूमिका पर नई समझ

हिल और मेयरहोफ के संयुक्त निष्कर्षों का एक महत्वपूर्ण पहलू यह था कि मांसपेशियों की शुरुआती गतिविधि के लिए ऑक्सीजन की भूमिका उस समय की सामान्य धारणा से अलग थी।

हिल के प्रयोगों में पाया गया कि शुरुआती मांसपेशीय गर्मी का उत्पादन ऑक्सीजन की मौजूदगी या अनुपस्थिति से काफी हद तक प्रभावित नहीं होता। इसके विपरीत, रिकवरी के दौरान ऑक्सीजन की भूमिका महत्वपूर्ण होती है।

इससे वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिली कि मांसपेशी ऊर्जा उत्पादन में अलग-अलग चरणों में अलग जैव-रासायनिक प्रक्रियाएं काम करती हैं।

लैक्टिक एसिड सिर्फ ‘बेकार उत्पाद’ नहीं

मेयरहोफ के काम ने लैक्टिक एसिड की भूमिका को लेकर भी महत्वपूर्ण सवाल उठाए। उनके अध्ययन से संकेत मिला कि मांसपेशी में बनने वाला लैक्टिक एसिड केवल एक अंतिम अपशिष्ट पदार्थ नहीं है, बल्कि ऊर्जा चक्र और रिकवरी प्रक्रिया का हिस्सा है।

बाद के शोध ने इस क्षेत्र की वैज्ञानिक समझ को और विकसित किया, लेकिन हिल और मेयरहोफ का काम मांसपेशी चयापचय और glycolysis के अध्ययन के शुरुआती महत्वपूर्ण चरणों में शामिल रहा। नोबेल फाउंडेशन के ऐतिहासिक विवरण के अनुसार, मेयरहोफ के काम ने ग्लाइकोजन, लैक्टिक एसिड और ऑक्सीकरण के बीच संबंधों को समझने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

दोनों वैज्ञानिकों का सहयोग

हिल और मेयरहोफ का शोध केवल समान विषय पर अलग-अलग किया गया काम नहीं था। प्रथम विश्व युद्ध के बाद दोनों वैज्ञानिकों के बीच वैज्ञानिक सहयोग भी विकसित हुआ। दोनों का उद्देश्य मांसपेशियों में ऊष्मा, यांत्रिक कार्य और रासायनिक प्रतिक्रियाओं के बीच संबंध स्थापित करना था।

मेयरहोफ ने रासायनिक और ऑक्सीजन संबंधी मापों पर ध्यान दिया, जबकि हिल ने ऊष्मा और यांत्रिक ऊर्जा के पहलू का अध्ययन किया। दोनों दृष्टिकोणों ने मिलकर मांसपेशियों में ऊर्जा परिवर्तन की अधिक व्यापक तस्वीर सामने रखी।

हिल ने अपने नोबेल व्याख्यान में भी इस सहयोग के महत्व को रेखांकित किया था। उन्होंने बताया कि मांसपेशियों के भौतिक पहलुओं को समझने के लिए रसायन विज्ञान और जैव-रसायन की मदद आवश्यक थी।

आधुनिक व्यायाम विज्ञान की नींव में योगदान

आज जब वैज्ञानिक व्यायाम के दौरान ऊर्जा उत्पादन, मांसपेशियों की थकान, ऑक्सीजन की खपत और मेटाबॉलिक प्रतिक्रियाओं का अध्ययन करते हैं, तो इस क्षेत्र का इतिहास हिल और मेयरहोफ के काम तक पहुंचता है।

उनका शोध उस समय शुरू हुआ जब कोशिकीय ऊर्जा उत्पादन की आधुनिक तस्वीर अभी विकसित नहीं हुई थी। बाद में ग्लाइकोलिसिस, क्रिएटिन फॉस्फेट, ATP और अन्य ऊर्जा प्रणालियों की भूमिका के बारे में कहीं अधिक विस्तृत जानकारी सामने आई। फिर भी हिल और मेयरहोफ ने यह स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई कि मांसपेशियों का काम रासायनिक ऊर्जा के नियंत्रित रूपांतरण से जुड़ा है।

1922 का नोबेल सम्मान क्यों महत्वपूर्ण था?

हिल और मेयरहोफ को मिला नोबेल सम्मान केवल दो वैज्ञानिकों की व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं था। इसने फिजियोलॉजी, भौतिकी और जैव-रसायन के बीच बढ़ते संबंध को भी मान्यता दी।

नोबेल फाउंडेशन के अनुसार, हिल की खोज ने मांसपेशियों में ऊष्मा उत्पादन को समझने में योगदान दिया, जबकि मेयरहोफ ने ऑक्सीजन की खपत और लैक्टिक एसिड के मेटाबॉलिज्म के बीच संबंध को स्पष्ट किया। दोनों के काम ने मिलकर मांसपेशियों में ऊर्जा परिवर्तन को वैज्ञानिक रूप से समझने के लिए एक मजबूत आधार तैयार किया।

एक सदी बाद भी उनका शोध इस बात का महत्वपूर्ण उदाहरण है कि किसी जटिल जैविक प्रक्रिया को समझने के लिए भौतिक माप, रासायनिक विश्लेषण और जैविक प्रयोगों को एक साथ जोड़ना कितना प्रभावी हो सकता है।

Bharat Baani Bureau

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