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15 सितंबर 2026 (भारत बानी ब्यूरो)। बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर अपनी बेबाक अदाकारी और सादगी के लिए जाने जाते हैं, लेकिन उनके सामाजिक सरोकारों से जुड़ी एक पुरानी कहानी एक बार फिर चर्चा में है। लेखक और अभिनेता से जुड़े पुराने इंटरव्यू के अनुसार, नाना पाटेकर ने करीब 1.5 करोड़ रुपये की लग्जरी कार खरीदने के लिए अलग रखी रकम को किसानों के परिवारों की मदद के लिए देने का फैसला किया था। यही पहल आगे चलकर महाराष्ट्र के किसानों के लिए काम करने वाली नाम फाउंडेशन (NAAM Foundation) की शुरुआत की वजह बनी।

कार खरीदने के बजाय किसानों की मदद का फैसला

नाना पाटेकर ने एक इंटरव्यू में बताया था कि उन्होंने करीब 1 से 1.5 करोड़ रुपये एक लग्जरी कार खरीदने के लिए अलग रखे थे। इसी दौरान उन्होंने टीवी पर एक ऐसे किसान के परिवार को देखा, जिसने आर्थिक संकट और परेशानियों के बीच आत्महत्या कर ली थी।

किसान की पत्नी और बच्चों को देखकर नाना को यह महसूस हुआ कि जिस रकम से वह अपने लिए महंगी कार खरीदने वाले थे, उससे उन परिवारों की तत्काल मदद की जा सकती है, जिन्होंने अपना कमाने वाला सदस्य खो दिया है। इसके बाद उन्होंने कार खरीदने का विचार छोड़ दिया और रकम किसानों के परिवारों के बीच बांटने का फैसला किया।

नाना ने अपने दोस्त और मराठी अभिनेता मकरंद अनासपुरे से इस बारे में बात की। हालांकि अनासपुरे ने उन्हें केवल पैसा बांटने के बजाय पहले उन परिवारों से मिलने और उनकी वास्तविक स्थिति समझने की सलाह दी।

बीड जाकर बदली सोच

मकरंद अनासपुरे की सलाह पर नाना पाटेकर महाराष्ट्र के बीड इलाके में पहुंचे। वहां उन्होंने किसान आत्महत्या से प्रभावित परिवारों और बड़ी संख्या में विधवाओं की स्थिति देखी।

नाना ने बाद में बताया कि वहां जाकर उन्हें समझ आया कि यह केवल कुछ परिवारों को आर्थिक सहायता देने से हल होने वाली समस्या नहीं है। उन्होंने महसूस किया कि किसानों के लिए लंबे समय तक काम करने और उनकी समस्याओं के मूल कारणों से निपटने की जरूरत है।

एक इंटरव्यू में नाना ने बताया था कि उन्होंने शुरुआत में किसानों के परिवारों को मदद देने के लिए अपनी बचाई हुई रकम इस्तेमाल करने की योजना बनाई थी, लेकिन बीड में सैकड़ों विधवाओं को देखने के बाद उन्हें लगा कि यह काम बहुत बड़ा है और लगातार प्रयास की जरूरत होगी।

इसी सोच से बनी नाम फाउंडेशन

किसानों की स्थिति ने नाना पाटेकर और मकरंद अनासपुरे को संगठित तरीके से काम करने के लिए प्रेरित किया। सितंबर 2015 में दोनों ने नाम फाउंडेशन की शुरुआत की, जिसका उद्देश्य किसान आत्महत्या से प्रभावित परिवारों की मदद करने के साथ-साथ गांवों में रोजगार, पानी और बुनियादी सुविधाओं से जुड़े काम करना था।

शुरुआती दौर में फाउंडेशन ने किसान आत्महत्या में अपने कमाने वाले सदस्य को खो चुके परिवारों को आर्थिक सहायता दी। बाद में इसका काम केवल तत्काल आर्थिक मदद तक सीमित नहीं रहा, बल्कि गांवों में जल संरक्षण, रोजगार और आधारभूत सुविधाओं के विकास तक फैल गया।

किसानों की समस्या को केवल आर्थिक मदद से नहीं देखा

नाना पाटेकर का मानना रहा है कि किसान आत्महत्या की समस्या का समाधान केवल एक बार आर्थिक सहायता देने से नहीं हो सकता। उनके अनुसार किसानों को पानी, रोजगार, शिक्षा और सम्मानजनक जीवन के अवसर उपलब्ध कराना जरूरी है।

नाम फाउंडेशन ने महाराष्ट्र के सूखाग्रस्त इलाकों में जल संरक्षण से जुड़े कई काम किए। पुराने तालाबों और जलस्रोतों के पुनर्जीवन, पानी के संचयन और गांवों में बुनियादी सुविधाओं पर भी ध्यान दिया गया। फाउंडेशन ने आगे चलकर महाराष्ट्र से बाहर भी अपनी गतिविधियों का विस्तार किया।

नाना के लिए सामाजिक काम बना ज्यादा संतोषजनक

नाना पाटेकर ने कई मौकों पर कहा है कि उन्हें फिल्मों से प्रसिद्धि, पैसा और पुरस्कार मिले, लेकिन किसानों के लिए काम करने से उन्हें अलग तरह की संतुष्टि मिली।

उनका मानना था कि समाज के कमजोर वर्गों के लिए काम करने के लिए केवल सरकार पर निर्भर रहने के बजाय नागरिकों और सामाजिक संगठनों को भी आगे आना चाहिए। उनके अनुसार, किसान केवल आर्थिक सहायता नहीं बल्कि आत्मसम्मान और अपने भविष्य को बेहतर बनाने के अवसर चाहते हैं।

एक कार से शुरू हुई सोच बनी बड़ा अभियान

नाना पाटेकर की यह कहानी इसलिए भी खास है क्योंकि इसकी शुरुआत किसी बड़े सरकारी कार्यक्रम या कॉर्पोरेट फंडिंग से नहीं, बल्कि एक निजी फैसले से हुई थी। करीब 1.5 करोड़ रुपये की लग्जरी कार खरीदने की रकम को किसानों की मदद के लिए इस्तेमाल करने का फैसला धीरे-धीरे एक बड़े सामाजिक अभियान में बदल गया।

नाना का यह कदम आज भी उनकी सामाजिक प्रतिबद्धता के उदाहरण के तौर पर याद किया जाता है। उन्होंने खुद के लिए महंगी कार खरीदने के बजाय उन परिवारों की ओर रुख किया, जो किसान आत्महत्या के बाद आर्थिक और सामाजिक संकट से जूझ रहे थे। बाद में इसी भावना ने उन्हें और मकरंद अनासपुरे को नाम फाउंडेशन के जरिए लंबे समय तक किसानों के बीच काम करने के लिए प्रेरित किया।

Bharat Baani Bureau

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