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21 सितंबर 2026 (भारत बाणी ब्यूरो)। हरियाणा के जींद से निकलकर एशियन गेम्स के मंच तक पहुंचने वाले युवा निशानेबाज हिमांशु धिल्लों की कहानी संघर्ष, आत्मखोज और पारिवारिक सहयोग का उदाहरण है। कभी कुश्ती को अपना खेल बनाने की कोशिश करने वाले हिमांशु ने कुछ ही समय बाद इस खेल से दूरी बना ली। इसके बाद खेतों में पिता के साथ काम करने और नजदीकी शूटिंग रेंज में जाने के फैसले ने उनके जीवन की दिशा बदल दी।

20 वर्षीय हिमांशु ने जापान के आइची-नागोया में आयोजित एशियन गेम्स 2026 में पुरुषों की 10 मीटर एयर राइफल व्यक्तिगत स्पर्धा में रजत पदक जीता। उन्होंने फाइनल में 252.4 अंक हासिल किए और चीन के ओलंपिक चैंपियन शेंग लिहाओ के बाद दूसरा स्थान प्राप्त किया। भारत के रुद्रांक्ष पाटिल ने इसी स्पर्धा में कांस्य पदक जीता। शेंग ने 254.2 अंक के साथ स्वर्ण पदक हासिल किया।

कुश्ती से शुरू हुआ खेल का सफर

हिमांशु का पहला खेल निशानेबाजी नहीं, बल्कि कुश्ती था। उनके परिवार पर कुश्ती का प्रभाव था और ओलंपियन हरदीप सिंह धिल्लों से प्रेरित होकर उन्होंने इस खेल को अपनाने की कोशिश की। लेकिन कुश्ती का शारीरिक दबाव और प्रशिक्षण की कठिनाइयां उन्हें पसंद नहीं आईं। कुछ ही सप्ताह में उन्होंने कुश्ती छोड़ने का फैसला कर लिया।

हिमांशु ने बाद में बताया कि कुश्ती उनके लिए काफी कठिन थी और उन्हें महसूस हुआ कि यह खेल उनके अनुकूल नहीं है। पढ़ाई में भी उनकी विशेष रुचि नहीं थी। ऐसे में उनके किसान पिता ने उन्हें खेतों में अपने साथ काम करने के लिए ले जाना शुरू किया।

धान के खेतों में काम करने के अनुभव ने हिमांशु को मेहनत की वास्तविक कठिनाइयों से परिचित कराया। उन्होंने समझा कि कोई भी काम आसान नहीं होता और सफलता के लिए निरंतर प्रयास जरूरी है। यही अनुभव आगे चलकर उनके खेल जीवन में भी महत्वपूर्ण साबित हुआ।

शूटिंग को शुरुआत में आसान समझने की भूल

हिमांशु के घर के पास एक शूटिंग रेंज थी। कुश्ती छोड़ने के बाद उन्होंने निशानेबाजी को आजमाने का फैसला किया। शुरुआत में उन्हें लगा कि यह खेल अपेक्षाकृत आसान होगा, लेकिन जल्द ही उन्हें पता चला कि निशानेबाजी में शारीरिक नियंत्रण के साथ-साथ मानसिक मजबूती, एकाग्रता और दबाव में सही निर्णय लेने की क्षमता भी आवश्यक है।

कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान उनके पास प्रशिक्षण और अभ्यास के लिए अधिक समय था। उन्होंने शूटिंग पर ध्यान केंद्रित करना शुरू किया और धीरे-धीरे इस खेल के प्रति उनका लगाव बढ़ता गया। शुरुआत में बिना किसी स्पष्ट करियर योजना के रेंज पर पहुंचने वाला यह युवा निशानेबाज आगे चलकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने लगा।

परिवार ने उठाया आर्थिक जोखिम

हिमांशु की खेल यात्रा में उनके परिवार का आर्थिक सहयोग महत्वपूर्ण रहा। रिपोर्टों के अनुसार, उनके परिवार ने लगभग 3 लाख रुपये की राइफल खरीदने का फैसला किया। परिवार को यह आश्वासन दिया गया था कि यदि हिमांशु शूटिंग में आगे नहीं बढ़ पाए, तो राइफल को दोबारा बेचने की संभावना रहेगी।

एक किसान परिवार के लिए यह निवेश आसान नहीं था। लेकिन हिमांशु की क्षमता और रुचि को देखते हुए उनके परिवार ने जोखिम उठाया। उनके पिता ने केवल उपकरण खरीदने में मदद नहीं की, बल्कि प्रशिक्षण के दौरान मानसिक समर्थन भी दिया। हिमांशु के अनुसार, उनके पिता उन्हें प्रेरणादायक वीडियो भेजते रहते हैं, जो उन्हें अपनी यात्रा और जिम्मेदारियों की याद दिलाते हैं।

जूनियर स्तर पर मिली शुरुआती सफलता

निशानेबाजी में हिमांशु की प्रतिभा धीरे-धीरे सामने आने लगी। उन्होंने 2025 में नई दिल्ली में आयोजित ISSF जूनियर वर्ल्ड कप में पुरुषों की 10 मीटर एयर राइफल स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीता। उन्होंने मिश्रित टीम स्पर्धा में भी स्वर्ण पदक हासिल किया और सुहल में कांस्य पदक जीता।

2026 में उन्होंने नई दिल्ली में आयोजित एशियन राइफल/पिस्टल चैंपियनशिप में पुरुषों की 10 मीटर एयर राइफल और जूनियर मिश्रित टीम स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीते। इन परिणामों ने उन्हें वरिष्ठ स्तर की अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के लिए तैयार किया।

इसके बाद हिमांशु ने वरिष्ठ वर्ग में कदम रखा। म्यूनिख में अपने पहले वरिष्ठ ISSF वर्ल्ड कप में उन्होंने 10 मीटर एयर राइफल की क्वालिफिकेशन में 635.7 अंक हासिल किए और नौवां स्थान प्राप्त किया। यह प्रदर्शन उनके बढ़ते आत्मविश्वास और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता का संकेत था।

एशियन गेम्स में टीम और व्यक्तिगत पदक

एशियन गेम्स 2026 में हिमांशु ने व्यक्तिगत स्पर्धा से पहले पुरुषों की 10 मीटर एयर राइफल टीम स्पर्धा में भी भारत को रजत पदक दिलाने में योगदान दिया। भारतीय टीम में हिमांशु धिल्लों, रुद्रांक्ष पाटिल और पार्थ माने शामिल थे।

भारतीय टीम ने कुल 1890.1 अंक हासिल किए। चीन ने 1899.0 अंकों के साथ स्वर्ण पदक जीता और विश्व रिकॉर्ड बनाया, जबकि दक्षिण कोरिया ने कांस्य पदक हासिल किया। टीम स्पर्धा में हिमांशु ने 630.0 अंक बनाए। रुद्रांक्ष पाटिल ने 631.8 और पार्थ माने ने 628.3 अंक हासिल किए।

इसके बाद व्यक्तिगत फाइनल में हिमांशु ने दबाव के बीच संयम बनाए रखा। प्रतियोगिता के दौरान वह लगातार पदक की दौड़ में बने रहे। रुद्रांक्ष पाटिल के बाहर होने के बाद हिमांशु का पदक सुनिश्चित हो गया। अंतिम चरण में वह चीन के शेंग लिहाओ के साथ स्वर्ण पदक की प्रतिस्पर्धा में पहुंचे, लेकिन अंततः उन्हें रजत पदक से संतोष करना पड़ा।

मानसिक मजबूती ने निभाई अहम भूमिका

निशानेबाजी में तकनीकी कौशल के साथ मानसिक संतुलन का विशेष महत्व होता है। फाइनल जैसे मुकाबलों में खिलाड़ियों को लगातार बदलते दबाव, सीमित समय और प्रत्येक शॉट के महत्व के बीच प्रदर्शन करना पड़ता है।

हिमांशु की यात्रा में कोचिंग और मानसिक तैयारी का भी योगदान रहा। शुरुआत में शूटिंग को आसान समझने वाले हिमांशु ने समय के साथ जाना कि उच्च स्तर की निशानेबाजी में छोटी-सी गलती भी परिणाम बदल सकती है। जूनियर प्रतियोगिताओं से लेकर वरिष्ठ विश्व कप और एशियन गेम्स तक उनके सफर ने उन्हें बड़े मंच पर दबाव से निपटने का अनुभव दिया।

नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा

हिमांशु धिल्लों की कहानी केवल एक पदक जीतने की कहानी नहीं है। यह उस युवा खिलाड़ी के बदलाव को दर्शाती है, जिसने पहले कुश्ती में खुद को आजमाया, फिर खेतों में मेहनत का अनुभव लिया और अंततः निशानेबाजी में अपनी दिशा खोजी।

उनकी सफलता यह भी दिखाती है कि खेल प्रतिभा को आगे बढ़ाने में परिवार, कोच, प्रशिक्षण सुविधाओं और आर्थिक सहयोग की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। जींद के खेतों से एशियन गेम्स के पोडियम तक पहुंचने वाले हिमांशु अब भारतीय निशानेबाजी में उभरते हुए नामों में शामिल हो गए हैं।

एशियन गेम्स में व्यक्तिगत और टीम दोनों स्पर्धाओं में रजत पदक जीतकर हिमांशु ने अपने अंतरराष्ट्रीय करियर की मजबूत शुरुआत की है। आने वाले वर्षों में उनका लक्ष्य इन उपलब्धियों को आगे बढ़ाना और भारत के लिए बड़े अंतरराष्ट्रीय मंचों पर लगातार पदक जीतना होगा।

Bharat Baani Bureau

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