23 सितंबर 2026 (भारत बाणी ब्यूरो)। एलर्जी को आमतौर पर बचपन से जुड़ी समस्या माना जाता है, लेकिन चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार किसी भी उम्र में व्यक्ति को नई एलर्जी हो सकती है। कई बार ऐसे लोग भी किसी खाद्य पदार्थ, परागकण, धूल या पर्यावरणीय तत्व से एलर्जिक प्रतिक्रिया का अनुभव करने लगते हैं, जिन्हें पहले कभी ऐसी परेशानी नहीं हुई थी। हालिया वैज्ञानिक समझ से संकेत मिलता है कि आनुवंशिक प्रवृत्ति के अलावा संक्रमण, हार्मोनल बदलाव, आंतों के माइक्रोबायोम में परिवर्तन और कुछ बाहरी कारक प्रतिरक्षा तंत्र के व्यवहार को प्रभावित कर सकते हैं।
Jamie Ducharme
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हालांकि, किसी व्यक्ति में एलर्जी विकसित होने का कारण हमेशा स्पष्ट नहीं होता। विशेषज्ञों का मानना है कि प्रतिरक्षा तंत्र कभी-कभी सामान्य और हानिरहित पदार्थों को भी खतरे के रूप में पहचानने लगता है। यही प्रतिक्रिया बाद में छींक, नाक बहने, आंखों में खुजली, त्वचा पर चकत्ते या गंभीर मामलों में एनाफिलेक्सिस जैसी समस्याओं का कारण बन सकती है।
एलर्जी के पीछे आनुवंशिक कारणों की भूमिका होती है, लेकिन केवल जीन ही इसके लिए जिम्मेदार नहीं होते। विशेषज्ञों के अनुसार शरीर में कुछ घटनाएं प्रतिरक्षा तंत्र को इस तरह सक्रिय कर सकती हैं कि वह पहले से हानिरहित पदार्थों के प्रति भी अत्यधिक प्रतिक्रिया देने लगे।
कोविड-19 संक्रमण को ऐसे संभावित कारकों में शामिल किया जा रहा है। वर्ष 2026 के एक अध्ययन में कोविड-19 संक्रमण और एलर्जिक राइनाइटिस यानी हे फीवर तथा अस्थमा के विकसित होने के बढ़े हुए जोखिम के बीच संबंध पाया गया। अध्ययन से जुड़े स्वीडन के करोलिंस्का इंस्टीट्यूट के शोधकर्ता फिलिप क्यूरमैन के अनुसार, संक्रमण के दौरान प्रतिरक्षा तंत्र में अत्यधिक सूजन संबंधी प्रतिक्रिया उत्पन्न हो सकती है, जो एलर्जी से जुड़े इम्यून सिस्टम के एक प्रकार को प्रभावित करती है। <Cite refs={[“turn860841search1″,”turn860841search3”]}/>
हालांकि, ऐसे निष्कर्षों को कारण और परिणाम का अंतिम प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए। संक्रमण के बाद एलर्जी का जोखिम बढ़ने का संबंध सामने आया है, लेकिन हर व्यक्ति में संक्रमण के कारण एलर्जी विकसित होगी, ऐसा नहीं है।
बच्चों में रेस्पिरेटरी सिंसिशियल वायरस (RSV) और राइनोवायरस जैसे संक्रमणों के बाद भी एलर्जी संबंधी बदलावों की संभावना पर शोध हुआ है। एक संभावित व्याख्या यह है कि जब शरीर किसी संक्रमण से लड़ने में व्यस्त होता है और उसी दौरान किसी नए पदार्थ के संपर्क में आता है, तो प्रतिरक्षा तंत्र उस पदार्थ को गलती से नुकसान पहुंचाने वाला तत्व समझ सकता है।
एंटीबायोटिक और आंतों के माइक्रोबायोम की भूमिका
एलर्जी के बाद में विकसित होने के पीछे एक अन्य संभावित कारक एंटीबायोटिक दवाओं का इस्तेमाल भी हो सकता है। कुछ अध्ययनों में एंटीबायोटिक उपयोग और बाद में एलर्जी के जोखिम के बीच संबंध पाया गया है। विशेषज्ञों के अनुसार, इसका एक कारण आंतों में मौजूद माइक्रोबायोम पर दवाओं का प्रभाव हो सकता है।
माइक्रोबायोम में अरबों सूक्ष्मजीव होते हैं, जो पाचन, चयापचय और प्रतिरक्षा तंत्र के कामकाज से जुड़े होते हैं। एंटीबायोटिक दवाएं हानिकारक बैक्टीरिया को खत्म करने के साथ-साथ कुछ लाभकारी बैक्टीरिया को भी प्रभावित कर सकती हैं। इससे आंतों के सूक्ष्मजीवों का संतुलन बदल सकता है।
एलर्जी विशेषज्ञ रुचि गुप्ता के अनुसार, माइक्रोबायोम में बदलाव प्रतिरक्षा तंत्र को सामान्य पदार्थों और वास्तविक खतरों के बीच अंतर करने में प्रभावित कर सकता है। हालांकि, माइक्रोबायोम और एलर्जी के बीच संबंध जटिल है तथा इसके सभी तंत्र अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं हुए हैं।
इसलिए एंटीबायोटिक दवाओं का इस्तेमाल केवल चिकित्सकीय सलाह के अनुसार करना जरूरी है। एलर्जी से बचने के लिए अपने स्तर पर प्रोबायोटिक, सप्लीमेंट या किसी अन्य उत्पाद का सेवन शुरू करने से पहले डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए।
गर्भावस्था और मेनोपॉज के दौरान हार्मोनल बदलाव
महिलाओं में गर्भावस्था और मेनोपॉज जैसे जीवन के चरण भी एलर्जी के लक्षणों को प्रभावित कर सकते हैं। गर्भावस्था के दौरान शरीर में एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन जैसे हार्मोन के स्तर में बदलाव होता है। ये हार्मोन प्रतिरक्षा तंत्र के कामकाज से भी जुड़े होते हैं।
कुछ महिलाओं में गर्भधारण के बाद पहले से मौजूद पर्यावरणीय एलर्जी के लक्षण बढ़ सकते हैं। वहीं, कुछ लोगों में गर्भावस्था के दौरान पहली बार छींक, नाक बंद होने और नाक बहने जैसी समस्याएं दिखाई देती हैं। इसे ‘प्रेग्नेंसी राइनाइटिस’ कहा जाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, प्रेग्नेंसी राइनाइटिस हमेशा वास्तविक एलर्जी नहीं होती। यह गर्भावस्था से जुड़े अस्थायी शारीरिक बदलावों का परिणाम हो सकती है और अक्सर प्रसव के बाद इसके लक्षण कम हो जाते हैं। इसके विपरीत, मेनोपॉज के दौरान हार्मोनल परिवर्तन कुछ महिलाओं में नई एलर्जी या एलर्जी जैसे लक्षणों की शुरुआत से जुड़े हो सकते हैं। इन प्रक्रियाओं को समझने के लिए अभी और शोध की आवश्यकता है। <Cite refs={[“turn860841search1″,”turn860841search3”]}/>
टिक के काटने से मांसाहार से एलर्जी
बाद की उम्र में एलर्जी विकसित होने का एक असामान्य उदाहरण अल्फा-गैल सिंड्रोम है। यह विशेष रूप से कुछ टिक यानी छोटे परजीवी जीवों के काटने के बाद विकसित हो सकता है। इसमें व्यक्ति को लाल मांस, जैसे बीफ, पोर्क या लैम्ब में मौजूद अल्फा-गैल नामक शुगर अणु के प्रति एलर्जी हो सकती है।
अल्फा-गैल कई स्तनधारी जीवों में पाया जाता है, लेकिन मनुष्यों में स्वाभाविक रूप से मौजूद नहीं होता। कुछ टिक के काटने के बाद शरीर इस अणु के खिलाफ एंटीबॉडी बना सकता है। बाद में जब व्यक्ति अल्फा-गैल युक्त खाद्य पदार्थ खाता है, तो उसे पित्ती, सूजन, पेट दर्द, उल्टी या अन्य एलर्जिक लक्षण हो सकते हैं।
इस एलर्जी की एक विशेषता यह है कि प्रतिक्रिया हमेशा तुरंत नहीं होती। कई मामलों में मांस खाने के कुछ घंटे बाद लक्षण दिखाई दे सकते हैं, जिससे व्यक्ति के लिए भोजन और एलर्जी के बीच संबंध समझना कठिन हो जाता है। अमेरिका में 2017 से 2022 के बीच अल्फा-गैल सिंड्रोम के 90,000 से अधिक निदान सरकारी आंकड़ों में दर्ज किए गए थे। <Cite refs={[“turn860841search2″,”turn860841search3”]}/>
अचानक विकसित हुई एलर्जी का इलाज क्या है?
एलर्जी तब होती है जब प्रतिरक्षा तंत्र किसी सामान्य पदार्थ को खतरनाक बाहरी तत्व मानकर उसके खिलाफ प्रतिक्रिया शुरू कर देता है। शरीर एंटीबॉडी बनाता है और दोबारा उस पदार्थ के संपर्क में आने पर लक्षण उत्पन्न हो सकते हैं। लक्षण हल्के हो सकते हैं, जैसे खुजली और नाक बहना, या गंभीर भी हो सकते हैं, जैसे सांस लेने में कठिनाई और एनाफिलेक्सिस।
हर नई एलर्जी को पूरी तरह खत्म करने का कोई निश्चित उपचार फिलहाल उपलब्ध नहीं है। हालांकि, एलर्जी के प्रकार और गंभीरता के अनुसार डॉक्टर एंटीहिस्टामिन, इनहेलर, इम्यूनोथेरेपी या अन्य उपचार सुझा सकते हैं। ओमालिजुमैब यानी Xolair जैसी इम्यून-मॉड्यूलेटिंग दवाओं का उपयोग कुछ एलर्जिक स्थितियों और खाद्य एलर्जी से जुड़े जोखिमों को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है। इनका इस्तेमाल विशेषज्ञ की निगरानी में ही किया जाना चाहिए।
शोधकर्ता ऐसे उपचारों पर भी काम कर रहे हैं, जिनका उद्देश्य प्रतिरक्षा तंत्र को एलर्जी पैदा करने वाले पदार्थों के प्रति कम आक्रामक प्रतिक्रिया देना सिखाना है। इनमें एलर्जेन-विशिष्ट इम्यूनोथेरेपी, संभावित वैक्सीन आधारित उपाय और एलर्जेन को रोकने वाली एंटीबॉडी से जुड़े प्रयोगात्मक उपचार शामिल हैं। ये सभी दृष्टिकोण अभी शोध और चिकित्सकीय मूल्यांकन के अलग-अलग चरणों में हैं।
किन लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए?
यदि किसी व्यक्ति को वयस्क होने के बाद पहली बार किसी भोजन, दवा, कीट के काटने या पर्यावरणीय पदार्थ के संपर्क में आने पर एलर्जी जैसे लक्षण दिखाई दें, तो उसे चिकित्सकीय जांच करानी चाहिए। बार-बार होने वाले चकत्ते, सांस लेने में परेशानी, होंठ या जीभ में सूजन, चक्कर या बेहोशी जैसे लक्षण गंभीर एलर्जिक प्रतिक्रिया का संकेत हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में तुरंत आपात चिकित्सा सहायता लेनी चाहिए।
विशेषज्ञों के अनुसार, नई एलर्जी की पहचान के लिए लक्षणों का इतिहास, संपर्क की जानकारी, शारीरिक जांच और आवश्यकता पड़ने पर एलर्जी टेस्ट मददगार हो सकते हैं। बिना चिकित्सकीय सलाह के किसी खाद्य पदार्थ को लंबे समय तक पूरी तरह बंद करना या दवाओं में बदलाव करना उचित नहीं है।
एलर्जी के विकास को लेकर विज्ञान में अभी कई सवाल अनुत्तरित हैं। फिर भी, संक्रमण, माइक्रोबायोम, हार्मोन और पर्यावरण के बीच संबंधों की बेहतर समझ भविष्य में रोकथाम और उपचार के नए रास्ते खोल सकती है। फिलहाल, किसी भी उम्र में विकसित होने वाले नए एलर्जी लक्षणों को पहचानना और समय पर विशेषज्ञ से सलाह लेना सबसे महत्वपूर्ण कदम है।
