23 सितंबर 2026 (भारत बाणी ब्यूरो)। भारत में बचपन के कैंसर की चुनौती केवल अस्पताल और दवाओं तक सीमित नहीं है। देश के ग्रामीण इलाकों और छोटे शहरों से आने वाले हजारों परिवारों के लिए बच्चे का कैंसर इलाज शुरू कराने के बाद सबसे बड़ी समस्या सुरक्षित और किफायती जगह पर रहना भी बन जाती है। हालिया रिपोर्ट के अनुसार, हर साल 32,000 से अधिक सीमित आय वाले परिवार अपने बच्चों के कैंसर उपचार के लिए बड़े शहरों की यात्रा करते हैं। इनमें से कई परिवारों के लिए लंबे समय तक शहर में रहना आर्थिक और सामाजिक रूप से बेहद कठिन हो जाता है।
बड़े शहरों में केंद्रित है विशेषज्ञ उपचार
भारत में बाल कैंसर के इलाज के लिए आवश्यक विशेषज्ञ सुविधाएं और प्रशिक्षित चिकित्सा दल अभी भी मुख्य रूप से बड़े शहरी केंद्रों और प्रमुख कैंसर अस्पतालों में केंद्रित हैं। इसके कारण ग्रामीण और छोटे शहरों में रहने वाले परिवारों को इलाज के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है।
2026 में प्रकाशित एक बहु-केंद्र अध्ययन ने भी भारत में बच्चों के कैंसर उपचार तक पहुंच की भौगोलिक चुनौती को रेखांकित किया। दिल्ली और चेन्नई के तीन प्रमुख रेफरल केंद्रों में इलाज कराने वाले 22,328 बच्चों के आंकड़ों के विश्लेषण में औसत मोटर-वाहन यात्रा समय 161 मिनट था और 73.5 प्रतिशत मरीजों को एक घंटे से अधिक यात्रा करनी पड़ी। शोधकर्ताओं ने बाल कैंसर सेवाओं को बड़े शहरों से आगे क्षेत्रीय स्तर पर विस्तार देने की आवश्यकता बताई।
इस तरह की लंबी यात्राएं खास तौर पर उन बच्चों और परिवारों के लिए मुश्किल होती हैं जिन्हें कीमोथेरेपी, रेडिएशन, सर्जरी या नियमित फॉलो-अप के लिए बार-बार अस्पताल पहुंचना पड़ता है।
इलाज के साथ रहने की समस्या
कैंसर अस्पताल तक पहुंच जाना समस्या का अंत नहीं है। उपचार कई सप्ताह या महीनों तक चल सकता है, जिसके दौरान परिवार को अस्पताल के आसपास रहना पड़ सकता है।
St. Jude India ChildCare Centres के अनुसार, सीमित आय वाले 32,000 से अधिक परिवार हर साल अपने बच्चे के कैंसर उपचार के लिए बड़े शहरों की ओर आते हैं। संगठन का कहना है कि सुरक्षित और सस्ती आवास सुविधा उपलब्ध न होने के कारण कुछ परिवारों को कम लागत वाली लॉज में रहना पड़ता है और पैसे खत्म होने के बाद उन्हें रेलवे स्टेशनों या अस्पतालों के आसपास खुले स्थानों पर रहने जैसी कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है।
ऐसे वातावरण में रहने वाले बच्चे विशेष रूप से जोखिम में हो सकते हैं क्योंकि कैंसर उपचार के दौरान उनकी प्रतिरक्षा क्षमता कमजोर हो सकती है। भीड़भाड़, अस्वच्छता और पर्याप्त पोषण का अभाव संक्रमण के जोखिम को बढ़ा सकता है।
इलाज छोड़ने का खतरा
बच्चों के कैंसर उपचार में नियमितता बेहद महत्वपूर्ण होती है। यदि परिवार आर्थिक या आवास संबंधी कठिनाइयों के कारण इलाज के बीच में घर लौटने को मजबूर हो जाए या अस्पताल आना बंद कर दे, तो उपचार प्रभावित हो सकता है।
St. Jude India के अनुसार, Tata Memorial Hospital के अनुमानों के आधार पर उसके केंद्रों की सहायता से उपचार छोड़ने की दर पहले 30 प्रतिशत से अधिक के स्तर से घटकर 5 प्रतिशत से कम हुई है। यह आंकड़ा संगठन द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी पर आधारित है और इसके मॉडल में सुरक्षित आवास के साथ परिवहन, पोषण, परामर्श तथा संक्रमण नियंत्रण जैसी सुविधाएं शामिल हैं।
यह इस बात की ओर संकेत करता है कि बाल कैंसर देखभाल में चिकित्सा उपचार के साथ-साथ सामाजिक और आर्थिक सहायता भी महत्वपूर्ण हो सकती है।
‘होम अवे फ्रॉम होम’ मॉडल
St. Jude India ChildCare Centres का मॉडल ऐसे परिवारों को कैंसर अस्पताल के पास मुफ्त और स्वच्छ आवास उपलब्ध कराने पर केंद्रित है। इसके साथ परिवहन सहायता, पोषण संबंधी मार्गदर्शन, काउंसलिंग, बच्चों की शिक्षा और संक्रमण नियंत्रण जैसी सेवाएं भी दी जाती हैं। सितंबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, संगठन चेन्नई, दिल्ली, गुवाहाटी, हैदराबाद, जयपुर, कोलकाता, मुंबई, नवी मुंबई, मुजफ्फरपुर, बेंगलुरु, वाराणसी, वेल्लोर और विशाखापत्तनम सहित कई शहरों में 876 से अधिक बच्चों की सहायता कर रहा था।
ऐसी सुविधाओं का उद्देश्य परिवार को अस्पताल के बाहर की उन समस्याओं से राहत देना है, जो बच्चे के इलाज को नियमित बनाए रखने में बाधा बन सकती हैं।
केवल आवास नहीं, पूरे परिवार को सहायता की जरूरत
बच्चे के कैंसर इलाज के दौरान आम तौर पर एक अभिभावक को लंबे समय तक बच्चे के साथ रहना पड़ता है। ग्रामीण या छोटे शहर से आने वाले परिवार के लिए इसका मतलब रोजगार से अनुपस्थिति, यात्रा खर्च, भोजन और अन्य घरेलू जिम्मेदारियों का अतिरिक्त बोझ भी हो सकता है।
एक हालिया BMJ Open अध्ययन में कैंसर उपचार के लिए यात्रा से जुड़े खर्च को भी महत्वपूर्ण आर्थिक बोझ बताया गया है। अध्ययन में भारत में स्वास्थ्य खर्च के बड़े हिस्से के जेब से भुगतान किए जाने और कैंसर देखभाल के दौरान यात्रा से जुड़े खर्चों के महत्व को रेखांकित किया गया।
इसलिए बाल कैंसर की देखभाल को केवल अस्पताल आधारित सेवा के रूप में देखने के बजाय इसमें आवास, परिवहन, पोषण, शिक्षा और मनोसामाजिक सहायता को भी शामिल करना जरूरी माना जा रहा है।
क्षेत्रीय कैंसर सेवाओं का विस्तार जरूरी
विशेषज्ञों के सामने एक बड़ा सवाल यह है कि क्या हर बच्चे और परिवार को इलाज के लिए महानगर तक जाना पड़ेगा। 2026 के यात्रा-अध्ययन के शोधकर्ताओं ने सुझाव दिया है कि बाल कैंसर उपचार की क्षमता को प्रमुख महानगरीय रेफरल केंद्रों से आगे बढ़ाकर क्षेत्रीय नेटवर्क विकसित किए जाएं। इससे यात्रा का समय कम हो सकता है और उपचार में देरी तथा असमानता को कम करने में मदद मिल सकती है।
इसके लिए जिला और क्षेत्रीय अस्पतालों में शुरुआती पहचान, रेफरल व्यवस्था, आवश्यक कीमोथेरेपी सुविधाओं और प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की उपलब्धता बढ़ाने के साथ बड़े कैंसर केंद्रों से मजबूत संपर्क स्थापित करना महत्वपूर्ण हो सकता है।
बचपन का कैंसर इलाज योग्य हो सकता है
बाल कैंसर की चुनौती गंभीर है, लेकिन समय पर निदान और उचित उपचार मिलने पर कई प्रकार के बचपन के कैंसर में अच्छे उपचार परिणाम संभव हैं। राज्यसभा की एक संसदीय समिति की रिपोर्ट में भी कहा गया था कि समर्पित केंद्रों में इलाज मिलने पर बाल कैंसर का पूर्वानुमान अच्छा हो सकता है। उसी रिपोर्ट में ग्रामीण परिवारों द्वारा उपचार के लिए शहरों में लंबे समय तक रहने और इसके कारण आजीविका छोड़ने की समस्या पर ध्यान दिया गया था।
इसलिए भारत में बाल कैंसर देखभाल की अगली चुनौती केवल अधिक अस्पताल बनाने की नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने की भी है कि बच्चे और उनके परिवार उपचार के पूरे दौर में सुरक्षित वातावरण में रह सकें। 32,000 से अधिक परिवारों की हर साल होने वाली शहरों की यात्रा इस व्यापक स्वास्थ्य-सुविधा अंतर की ओर संकेत करती है।
