28 सितंबर 2026 (भारत बाणी ब्यूरो): अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के नए युद्धविराम प्रस्ताव को ठुकराए जाने के बाद अब अमेरिकी राजनयिक ने इसके पीछे की वजह बताई है। संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका के राजदूत माइक वॉल्ट्ज के मुताबिक, वॉशिंगटन को लगा कि ईरान बातचीत की मेज पर लौटने के बदले बहुत अधिक रियायतें मांग रहा था।
ईरान ने अमेरिका के सामने एक ऐसी योजना रखी थी, जिसके तहत सात दिनों के भीतर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को दोबारा खोलने और परमाणु वार्ता शुरू करने की बात कही गई थी। इसके बदले तेहरान ने अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी हटाने, ईरानी तेल पर प्रतिबंधों में राहत और क्षेत्रीय युद्धविराम जैसी शर्तें रखी थीं। ट्रंप ने 26 सितंबर को प्रस्ताव को खारिज करते हुए कहा कि यह समझौता स्वीकार्य नहीं था।
अमेरिका को ईरान की शर्तें मंजूर नहीं
माइक वॉल्ट्ज ने कहा कि ईरान बातचीत शुरू करने से पहले ही ऐसी रियायतें चाहता था, जिन्हें अमेरिका स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था। उनके अनुसार, वॉशिंगटन का आकलन था कि ईरान की मांगें केवल वार्ता की शुरुआत से जुड़ी नहीं थीं, बल्कि प्रतिबंधों और सैन्य दबाव में व्यापक राहत की मांग करती थीं।
ईरान की योजना के अनुसार, अमेरिका को ईरानी बंदरगाहों की नौसैनिक नाकाबंदी हटानी थी और तेल निर्यात पर लगे प्रतिबंधों में छूट देनी थी। इसके अलावा क्षेत्र में युद्धविराम लागू करने तथा कथित तौर पर ईरान की फ्रीज की गई संपत्तियों को जारी करने जैसी शर्तें भी प्रस्ताव का हिस्सा थीं।
ट्रंप ने कहा—ईरान ‘बहुत बुरी स्थिति’ में है
ट्रंप ने प्रस्ताव को खारिज करते हुए सार्वजनिक रूप से कहा कि ईरान समझौता इसलिए करना चाहता है क्योंकि वह बहुत खराब स्थिति में है। उन्होंने यह भी कहा कि वह समझौते के पक्ष में हैं, लेकिन ईरान की ओर से रखा गया प्रस्ताव स्वीकार्य नहीं था।
हालांकि, अमेरिकी अधिकारियों ने यह भी संकेत दिया है कि मध्यस्थों के माध्यम से अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत पूरी तरह बंद नहीं हुई है। Axios के अनुसार, अमेरिकी अधिकारियों ने वार्ता को सकारात्मक और रचनात्मक बताया है, जबकि दोनों पक्षों के बीच प्रमुख मुद्दों पर मतभेद अभी भी बने हुए हैं।
होर्मुज बना हुआ है सबसे बड़ा मुद्दा
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज इस पूरे विवाद का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। यह दुनिया के महत्वपूर्ण तेल और गैस परिवहन मार्गों में से एक है और यहां लंबे समय से जारी तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजारों पर दबाव बढ़ाया है।
ईरान का कहना है कि यदि उसकी शर्तें स्वीकार की जाती हैं तो वह सात दिनों के भीतर सामान्य समुद्री आवाजाही बहाल कर सकता है। दूसरी ओर, अमेरिका का रुख है कि ईरान को होर्मुज पर ऐसी शर्तें लगाने का अधिकार नहीं है। Axios की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी वार्ताकारों ने ईरानी पक्ष से कहा कि ईरान इस जलमार्ग को अपने नियंत्रण में होने के आधार पर मांगें नहीं रख सकता।
अमेरिका ने समुद्री आवाजाही जारी रखने की कोशिश की
अमेरिका ने पिछले महीनों में होर्मुज के जरिए वाणिज्यिक जहाजों की आवाजाही को बनाए रखने के लिए सैन्य संसाधनों का इस्तेमाल किया है। ईरान की ओर से समुद्री मार्ग को लेकर खतरे के बीच अमेरिकी बलों ने जहाजों को सुरक्षा उपलब्ध कराने और मार्ग से तेल की आवाजाही जारी रखने में भूमिका निभाई है।
ईरान की प्रस्तावित योजना में होर्मुज को फिर से सामान्य अंतरराष्ट्रीय समुद्री यातायात के लिए खोलना एक प्रमुख बिंदु था। इससे वैश्विक तेल आपूर्ति पर दबाव कम हो सकता है, लेकिन अमेरिका के लिए इसका सवाल व्यापक युद्ध और परमाणु मुद्दे के समाधान से भी जुड़ा हुआ है।
अमेरिकी राजनयिक ने बताई एक और वजह
पूर्व अमेरिकी ईरान विशेष दूत रॉब मैली ने ABC को दिए विश्लेषण में कहा कि जमीन पर मौजूदा परिस्थितियां अमेरिका को ईरान की पेशकश स्वीकार करने के लिए मजबूर नहीं कर रही थीं। उनके अनुसार, अमेरिकी नाकाबंदी ने ईरान की अर्थव्यवस्था पर दबाव डाला है और अमेरिका तथा उसके सहयोगियों ने होर्मुज से तेल की आवाजाही जारी रखने के तरीके विकसित किए हैं।
यह विश्लेषण बताता है कि वॉशिंगटन के लिए ईरान के प्रस्ताव को स्वीकार करना तत्काल आवश्यकता नहीं माना जा रहा है। हालांकि, यह एक पूर्व अमेरिकी अधिकारी का आकलन है और इसे अमेरिकी सरकार की आधिकारिक स्थिति से अलग समझना जरूरी है।
आगे क्या होगा?
ट्रंप द्वारा प्रस्ताव खारिज किए जाने के बावजूद ईरान ने बातचीत का रास्ता पूरी तरह बंद नहीं किया है। ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा है कि तेहरान की शर्तें स्पष्ट हैं और होर्मुज को फिर से खोलना इन्हीं शर्तों के पूरा होने पर निर्भर करेगा। उन्होंने यह भी कहा कि गतिरोध को केवल बातचीत के जरिए दूर किया जा सकता है।
फिलहाल दोनों देशों के बीच मुख्य मतभेद होर्मुज, अमेरिकी सैन्य नाकाबंदी, तेल प्रतिबंध, युद्धविराम और ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर बने हुए हैं। ट्रंप प्रशासन की ओर से ईरान पर दबाव बनाए रखने की नीति और तेहरान की ओर से बातचीत के लिए रखी गई शर्तें आने वाले दिनों में इस संकट की दिशा तय करने वाले प्रमुख कारक होंगे।
