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21 अक्टूबर 2026 (भारत बानी ब्यूरो) : वैश्विक बाजार में सोने की कीमतों को लेकर लंबी अवधि का सकारात्मक रुझान बना हुआ है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्रीय बैंकों की ओर से सोने की लगातार खरीदारी और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के चलते अगले दो वर्षों में सोने का भाव 5,000 डॉलर प्रति ट्रॉय औंस तक पहुंच सकता है। हालांकि, यह अनुमान है और वास्तविक कीमतों में उतार-चढ़ाव वैश्विक ब्याज दरों, डॉलर की मजबूती, निवेशकों की मांग तथा भू-राजनीतिक घटनाक्रम पर निर्भर करेगा।

सोने को परंपरागत रूप से सुरक्षित निवेश विकल्प माना जाता है। आर्थिक संकट, महंगाई की आशंका, मुद्रा में कमजोरी और अंतरराष्ट्रीय तनाव के समय निवेशक अक्सर सोने की ओर रुख करते हैं। इसके अतिरिक्त, कई केंद्रीय बैंक अपने विदेशी मुद्रा भंडार में विविधता लाने और अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने के लिए सोने का हिस्सा बढ़ा रहे हैं। इन कारकों से लंबी अवधि में सोने की मांग को समर्थन मिल सकता है।

केंद्रीय बैंकों की खरीदारी से मांग को सहारा

सोने की कीमतों के लिए केंद्रीय बैंकों की खरीदारी एक महत्वपूर्ण कारक बन गई है। विश्व स्वर्ण परिषद (World Gold Council) के अनुसार, 2026 की दूसरी तिमाही में केंद्रीय बैंकों और अन्य आधिकारिक संस्थानों ने कुल 288.9 टन सोना खरीदा। यह पहली तिमाही के संशोधित आंकड़े से काफी अधिक था। परिषद के सर्वेक्षण में 89 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने अनुमान जताया कि अगले 12 महीनों में वैश्विक केंद्रीय बैंकों का स्वर्ण भंडार बढ़ेगा। <Cite refs={[“turn462421search1”]}/>

केंद्रीय बैंक आम तौर पर सोने को दीर्घकालिक आरक्षित संपत्ति के रूप में रखते हैं। सोना किसी एक सरकार या मुद्रा जारी करने वाली संस्था की देनदारी नहीं होता, इसलिए इसे विदेशी मुद्रा भंडार में विविधता लाने के एक साधन के रूप में देखा जाता है।

यदि केंद्रीय बैंक आने वाले वर्षों में खरीदारी जारी रखते हैं, तो इससे बाजार में मांग को मजबूती मिल सकती है। हालांकि, खरीदारी की मात्रा हर तिमाही में समान नहीं रहती। ऊंची कीमतें, घरेलू आर्थिक जरूरतें और विदेशी मुद्रा भंडार के प्रबंधन से जुड़े फैसले केंद्रीय बैंकों की खरीदारी को प्रभावित कर सकते हैं।

भू-राजनीतिक तनाव और आर्थिक अनिश्चितता का असर

दुनिया के विभिन्न हिस्सों में जारी तनाव, सरकारी कर्ज को लेकर चिंताएं और वैश्विक आर्थिक विकास की अनिश्चितता भी सोने के लिए महत्वपूर्ण कारक हैं। जब निवेशकों को शेयर बाजार या अन्य वित्तीय परिसंपत्तियों में जोखिम अधिक दिखाई देता है, तो वे अपने निवेश का कुछ हिस्सा सोने में लगा सकते हैं।

फाइनेंशियल टाइम्स की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, निवेशकों और फंड प्रबंधकों के बीच अगले 12 से 24 महीनों में सोने के नए रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने की उम्मीद बनी हुई है। इस आशावाद के पीछे केंद्रीय बैंकों की खरीदारी, सरकारी कर्ज को लेकर चिंताएं और भू-राजनीतिक अस्थिरता जैसे कारण बताए गए हैं। <Cite refs={[“turn462421news21”]}/>

हालांकि, सोने की कीमतों में तेजी का रास्ता सीधा नहीं होगा। अमेरिकी डॉलर मजबूत होने या बॉन्ड पर मिलने वाला प्रतिफल बढ़ने की स्थिति में सोने पर दबाव आ सकता है। चूंकि सोना नियमित ब्याज नहीं देता, इसलिए ऊंची ब्याज दरों के दौर में कुछ निवेशक दूसरी परिसंपत्तियों को प्राथमिकता दे सकते हैं।

क्या 5,000 डॉलर का स्तर हासिल करना संभव है?

अगले दो वर्षों में 5,000 डॉलर प्रति ट्रॉय औंस का स्तर हासिल करने की संभावना इस बात पर निर्भर करेगी कि सोने की मांग और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियां किस दिशा में आगे बढ़ती हैं। यदि केंद्रीय बैंकों की खरीदारी मजबूत बनी रहती है, निवेशकों की मांग बढ़ती है और भू-राजनीतिक जोखिम बने रहते हैं, तो कीमतों को ऊपर जाने में मदद मिल सकती है।

इसके विपरीत, यदि वैश्विक अर्थव्यवस्था अपेक्षा से अधिक मजबूत रहती है, अमेरिकी डॉलर में तेजी आती है या वास्तविक ब्याज दरें ऊंची बनी रहती हैं, तो सोने की तेजी सीमित हो सकती है। विश्व स्वर्ण परिषद ने भी अपने 2026 के मध्य-वर्षीय आकलन में कहा था कि सोने को 5,000 डॉलर प्रति औंस की ओर टिकाऊ ढंग से बढ़ने के लिए मजबूत और स्पष्ट आर्थिक या बाजार संबंधी कारणों की आवश्यकता होगी। <Cite refs={[“turn462421search4”]}/>

इसलिए 5,000 डॉलर का अनुमान संभावित परिदृश्य के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि निश्चित लक्ष्य के रूप में। निवेशकों को यह समझना होगा कि सोने की कीमतें तेजी से ऊपर जाने के बाद उल्लेखनीय गिरावट भी दर्ज कर सकती हैं।

भारतीय बाजार पर क्या हो सकता है असर?

अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतों का भारतीय बाजार पर सीधा प्रभाव पड़ता है, लेकिन घरेलू कीमतें केवल वैश्विक दरों से तय नहीं होतीं। डॉलर के मुकाबले रुपये की विनिमय दर, आयात शुल्क, कर और घरेलू मांग भी भारतीय बाजार में सोने के भाव को प्रभावित करते हैं।

यदि अंतरराष्ट्रीय कीमतों में लगातार तेजी आती है और रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर होता है, तो भारत में सोना और महंगा हो सकता है। इससे आभूषण खरीदने वाले परिवारों, ज्वेलरी कारोबार और सोने में निवेश करने वालों पर असर पड़ सकता है। दूसरी ओर, ऊंची कीमतों से आभूषणों की मांग और खरीदारी की मात्रा पर दबाव भी पड़ सकता है।

निष्कर्ष: केंद्रीय बैंकों की लगातार खरीदारी और वैश्विक अनिश्चितता सोने की लंबी अवधि की संभावनाओं को समर्थन दे सकती हैं। लेकिन अगले दो वर्षों में कीमत 5,000 डॉलर प्रति औंस तक पहुंचेगी या नहीं, यह कई आर्थिक और वित्तीय कारकों पर निर्भर करेगा। निवेशकों के लिए किसी एक पूर्वानुमान के आधार पर निर्णय लेने के बजाय जोखिम, निवेश अवधि और अपने वित्तीय लक्ष्यों को ध्यान में रखना जरूरी है।

Bharat Baani Bureau

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