26 अक्टूबर 2026 (भारत बानी ब्यूरो) : भारत ने वर्ष 2047 तक दुनिया के शीर्ष पांच जहाज निर्माण करने वाले देशों में शामिल होने का लक्ष्य तय किया है। इस महत्वाकांक्षी योजना को पूरा करने के लिए सरकार जहाज निर्माण उद्योग में आधुनिक तकनीक, निवेश, कौशल विकास और अंतरराष्ट्रीय साझेदारी को मजबूत करने पर जोर दे रही है। इस दिशा में दक्षिण कोरिया के साथ सहयोग बढ़ाने को महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि दक्षिण कोरिया वैश्विक जहाज निर्माण उद्योग की प्रमुख शक्तियों में शामिल है।
भारत का लक्ष्य देश में जहाज निर्माण की क्षमता बढ़ाने, घरेलू शिपयार्डों को आधुनिक बनाने और वैश्विक समुद्री आपूर्ति शृंखला में अपनी हिस्सेदारी मजबूत करने से जुड़ा है। इसके लिए तकनीकी सहयोग, संयुक्त उद्यम और कुशल श्रमिकों के प्रशिक्षण जैसे क्षेत्रों में संभावनाएं तलाशने पर जोर दिया जा रहा है।
जहाज निर्माण क्षेत्र में भारत की महत्वाकांक्षा
भारत की समुद्री अर्थव्यवस्था में जहाज निर्माण उद्योग की महत्वपूर्ण भूमिका है। व्यापारिक जहाजों, मालवाहक पोतों, यात्री जहाजों और विशेष उद्देश्य वाले जहाजों की घरेलू मांग को पूरा करने के साथ भारत अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी अपनी उपस्थिति बढ़ाना चाहता है।
सरकार के दीर्घकालिक दृष्टिकोण में जहाज निर्माण के साथ-साथ जहाजों की मरम्मत, रखरखाव, समुद्री उपकरण निर्माण और बंदरगाह आधारित औद्योगिक गतिविधियों को बढ़ावा देना शामिल है। इससे रोजगार के नए अवसर पैदा हो सकते हैं और देश की औद्योगिक क्षमता मजबूत हो सकती है।
हालांकि, वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने के लिए भारत को उत्पादन क्षमता, लागत, तकनीक और समय पर जहाज तैयार करने की दक्षता में सुधार करना होगा।
दक्षिण कोरिया के साथ VOYAGES साझेदारी पर जोर
केंद्रीय बंदरगाह, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्री सर्बानंद सोनोवाल 25 अक्टूबर से दक्षिण कोरिया की चार दिवसीय यात्रा पर हैं। उन्होंने बुसान में भारतीय जहाज निर्माण क्षेत्र के पेशेवरों से मुलाकात की। इनमें Samsung Heavy Industries, Hanwha Ocean, HD Hyundai, DNV और Indian Register of Shipping से जुड़े लोग शामिल थे।
भारत और दक्षिण कोरिया ने अप्रैल 2026 में राष्ट्रपति ली जे-म्युंग की भारत यात्रा के दौरान VOYAGES नाम से व्यापक सहयोग ढांचे पर सहमति जताई थी। इसका उद्देश्य जहाज निर्माण, पोत परिवहन और समुद्री लॉजिस्टिक्स में दोनों देशों के सरकारी संस्थानों और निजी कंपनियों के बीच साझेदारी को बढ़ाना है।
सोनोवाल ने दक्षिण कोरिया में काम कर रहे भारतीय विशेषज्ञों से अपनी तकनीकी जानकारी और अनुभव का इस्तेमाल भारत के जहाज निर्माण उद्योग को मजबूत करने में करने की अपील की। उन्होंने कहा कि ये पेशेवर दोनों देशों के उद्योगों के बीच सेतु बन सकते हैं। वे भारत लौटकर या विदेश में रहते हुए भारतीय कंपनियों को सहयोग दे सकते हैं।
तमिलनाडु में प्रस्तावित मेगा शिपयार्ड
भारत-दक्षिण कोरिया सहयोग के तहत तमिलनाडु के थूथुकुडी में एक बड़े जहाज निर्माण केंद्र की योजना भी महत्वपूर्ण है। सरकारी जानकारी के अनुसार, प्रस्तावित परियोजना की वार्षिक क्षमता 25 लाख ग्रॉस टन तक रखने की परिकल्पना है। परियोजना के स्थिर संचालन पर लगभग 15,000 प्रत्यक्ष रोजगार पैदा होने की उम्मीद जताई गई है। हालांकि, इसे साकार करने के लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट और अन्य तैयारियां जरूरी हैं।
इस तरह के जहाज निर्माण क्लस्टर में केवल शिपयार्ड ही नहीं, बल्कि समुद्री उपकरण बनाने वाली कंपनियां, कलपुर्जे आपूर्ति करने वाले उद्योग, तकनीकी सेवाएं और अन्य सहायक व्यवसाय भी विकसित हो सकते हैं। इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार और औद्योगिक गतिविधियों को बढ़ावा मिल सकता है।
कुशल कर्मचारियों और आधुनिक तकनीक की जरूरत
सोनोवाल ने जहाज निर्माण उद्योग की उत्पादकता और परियोजनाओं को समय पर पूरा करने की क्षमता में सुधार की जरूरत पर जोर दिया। भारत को जहाज निर्माता, मरीन इंजीनियर, नेवल आर्किटेक्ट, डिजाइनर, वेल्डर, परियोजना प्रबंधक और तकनीकी विशेषज्ञों की बड़ी संख्या में आवश्यकता होगी।
दक्षिण कोरिया का अनुभव बड़े व्यावसायिक जहाजों के निर्माण, आधुनिक उत्पादन प्रणालियों और उन्नत इंजीनियरिंग में भारत के लिए उपयोगी हो सकता है। इसी उद्देश्य से भारत में कौशल विकास और तकनीकी प्रशिक्षण कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने पर भी काम किया जा रहा है।
2047 के लक्ष्य तक पहुंचने की चुनौती
भारत की समुद्री रणनीति में 2030 तक दुनिया के शीर्ष 10 जहाज निर्माण देशों में जगह बनाना और 2047 तक शीर्ष पांच में शामिल होना प्रमुख लक्ष्य है। इसके लिए घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाने, निवेश आकर्षित करने, शिपयार्डों का आधुनिकीकरण करने और वैश्विक कंपनियों के साथ तकनीकी साझेदारी मजबूत करने की जरूरत होगी।
