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31 अगस्त, 2026 (भारत बानी ब्यूरो ) :  पंजाब में भूजल संकट के बीच नहर सिंचाई को बढ़ावा देने के प्रयासों के सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं। एक ताजा अध्ययन के अनुसार, राज्य में नहर का पानी अब उन खेतों तक भी पहुंच रहा है, जो पहले नहर नेटवर्क के टेल एंड पर होने के कारण पर्याप्त सिंचाई सुविधा से वंचित रहते थे। इसी अवधि में अत्यधिक दोहन वाले भूजल ब्लॉकों की संख्या भी कम हुई है।

रिपोर्ट के मुताबिक, पंजाब में ओवर-एक्सप्लॉइटेड ब्लॉकों की संख्या दो वर्षों में 115 से घटकर 110 रह गई है। यह बदलाव ऐसे समय में सामने आया है जब राज्य लंबे समय से गिरते भूजल स्तर और धान की खेती में ट्यूबवेल आधारित सिंचाई के कारण गंभीर जल संकट का सामना कर रहा है।

पंजाब के लिए यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि राज्य की कृषि व्यवस्था लंबे समय से भूजल पर अत्यधिक निर्भर रही है। लगातार ट्यूबवेल से पानी निकालने के कारण कई इलाकों में भूजल स्तर तेजी से नीचे गया है। ऐसे में नहरों के माध्यम से सतही जल को खेतों तक पहुंचाने से ट्यूबवेल पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।

हालिया Dynamic Groundwater Resource Assessment में पंजाब की स्थिति अभी भी चिंताजनक बताई गई है। रिपोर्ट के अनुसार, 2025-26 में राज्य ने करीब 26.32 बिलियन क्यूबिक मीटर (BCM) भूजल निकाला, जबकि सालाना पुनर्भरण 19.14 BCM और निकासी योग्य संसाधन 17.29 BCM था। राज्य में भूजल दोहन का कुल स्तर 152.22 प्रतिशत रहा।

इस आंकड़े से स्पष्ट है कि ओवर-एक्सप्लॉइटेड ब्लॉकों की संख्या में कमी के बावजूद पंजाब का भूजल संकट अभी खत्म नहीं हुआ है। खेती के लिए भूजल का इस्तेमाल अब भी पुनर्भरण की क्षमता से काफी अधिक है।

अध्ययन में नहर सिंचाई के विस्तार को इस सुधार का एक महत्वपूर्ण कारण माना गया है। पंजाब में कई पुरानी और खराब नहरों को बहाल किया गया है, जिससे पानी की आपूर्ति उन क्षेत्रों तक पहुंचने लगी है जहां पहले किसान मुख्य रूप से ट्यूबवेल पर निर्भर थे। रिपोर्टों के अनुसार, कम से कम 102 बंद या निष्क्रिय नहरों को बहाल किया गया है।

नहर का पानी टेल एंड तक पहुंचना इस पूरी प्रक्रिया का अहम हिस्सा है। पारंपरिक रूप से नहर प्रणाली के शुरुआती हिस्सों में पानी की उपलब्धता अपेक्षाकृत बेहतर रहती थी, जबकि आखिरी छोर पर स्थित खेतों को अक्सर पर्याप्त पानी नहीं मिल पाता था। परिणामस्वरूप, टेल एंड के किसान भी सिंचाई के लिए ट्यूबवेल पर निर्भर रहते थे।

अब नहर नेटवर्क में सुधार और पानी के बेहतर प्रबंधन से इस स्थिति में बदलाव दिखाई दे रहा है। दूर-दराज के खेतों तक नहर का पानी पहुंचने से किसानों को भूजल निकालने की जरूरत कम हो सकती है और इससे कृषि लागत पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

जून 2026 में सामने आई एक रिपोर्ट में भी बताया गया था कि पंजाब में भूजल दोहन का स्तर 2023 के करीब 164 प्रतिशत से घटकर 2025 में 156 प्रतिशत हुआ था। इसी दौरान ओवर-एक्सप्लॉइटेड ब्लॉकों की संख्या 117 से घटकर 111 हुई थी। कई ब्लॉकों में भूजल स्तर में सुधार भी दर्ज किया गया।

इन आंकड़ों से संकेत मिलता है कि नहर सिंचाई के विस्तार और भूजल संरक्षण के प्रयासों का असर धीरे-धीरे दिखाई दे रहा है। हालांकि, अलग-अलग आकलन वर्षों और मानकों के कारण ब्लॉकों की संख्या के आंकड़ों में अंतर हो सकता है। ताजा अध्ययन में 115 से 110 की कमी दर्ज की गई है।

भूजल स्तर में सुधार पंजाब के कई हिस्सों में दर्ज किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, 153 में से 81 ब्लॉकों में भूजल स्तर में सुधार हुआ। इनमें लुधियाना का पाक्खोवाल, फतेहगढ़ साहिब का सरहिंद, गुरदासपुर का काहनूवान, लुधियाना का समराला, अमृतसर का तरसिक्का और एसएएस नगर का डेरा बस्सी शामिल हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, केवल नहरों की बहाली से पंजाब का भूजल संकट पूरी तरह दूर नहीं किया जा सकता। फसल विविधीकरण, पानी की बचत वाली सिंचाई तकनीक, धान की खेती के क्षेत्र में कमी और भूजल दोहन पर प्रभावी नियंत्रण भी जरूरी होगा।

पंजाब में धान की खेती भूजल संकट का एक प्रमुख कारण मानी जाती है। धान को अधिक पानी की जरूरत होती है और कई किसान इसके लिए ट्यूबवेल का इस्तेमाल करते हैं। यदि नहर का पानी अधिक व्यापक रूप से उपलब्ध होता है, तो किसानों को भूजल पर कम निर्भर रहना पड़ सकता है।

सरकार की ओर से नहर नेटवर्क को मजबूत करने के साथ-साथ उन क्षेत्रों में पानी पहुंचाने पर जोर दिया जा रहा है, जहां वर्षों से टेल एंड की समस्या बनी हुई थी। पंजाब के जल संसाधन मंत्री ने भी हाल में दावा किया था कि सरकार ने नहर का पानी टेल एंड तक पहुंचाया है।

हालांकि, भूजल संकट की गंभीरता को देखते हुए इस सुधार को अभी शुरुआती सफलता के तौर पर ही देखा जा सकता है। 2025-26 में पंजाब का कुल भूजल दोहन अभी भी उपलब्ध संसाधनों से काफी ज्यादा था। इसलिए ओवर-एक्सप्लॉइटेड ब्लॉकों की संख्या में कमी के बावजूद राज्य को लंबे समय तक संरक्षण की रणनीति जारी रखनी होगी।

नहरों की क्षमता बढ़ाने के साथ उनकी नियमित सफाई, मरम्मत और पानी के समान वितरण पर भी ध्यान देना जरूरी होगा। यदि नहर नेटवर्क के टेल एंड तक लगातार और पर्याप्त पानी पहुंचता है, तो इससे किसानों की ट्यूबवेल पर निर्भरता घट सकती है और भूजल पर दबाव कम किया जा सकता है।

पंजाब के लिए यह बदलाव कृषि और पर्यावरण दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण है। नहर सिंचाई को मजबूत करने से एक तरफ किसानों को वैकल्पिक जल स्रोत मिलता है, वहीं दूसरी तरफ भूजल के अत्यधिक दोहन को रोकने में मदद मिल सकती है।

फिलहाल, ओवर-एक्सप्लॉइटेड ब्लॉकों की संख्या में गिरावट और टेल एंड तक नहर पानी पहुंचना सकारात्मक संकेत हैं। लेकिन राज्य का भूजल दोहन अभी भी बेहद ऊंचे स्तर पर है। इसलिए आने वाले वर्षों में नहर सिंचाई के विस्तार के साथ पानी की मांग कम करने वाली कृषि नीतियों पर भी जोर देना जरूरी होगा।

Bharat Baani Bureau

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