4 सितंबर , 2026 (भारत बानी ब्यूरो ) : भारत को 2047 तक विकसित अर्थव्यवस्था बनाने की महत्वाकांक्षा में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रहने वाली है। KPMG की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, भारत के मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र को मौजूदा करीब 0.5 ट्रिलियन डॉलर से बढ़ाकर 2047 तक 7.5 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचाने के लिए लगभग 13.1 प्रतिशत की सालाना चक्रवृद्धि वृद्धि दर (CAGR) हासिल करनी होगी। यह वृद्धि वर्तमान अनुमानित रफ्तार की तुलना में काफी अधिक है।
KPMG के मुताबिक, भारत का लक्ष्य 2047 तक लगभग 30 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का है और इसमें मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र से करीब 7.5 ट्रिलियन डॉलर का योगदान अपेक्षित है। इसका अर्थ है कि अगले दो दशकों में विनिर्माण क्षेत्र को लगभग 15 गुना विस्तार करना होगा। यदि मौजूदा विकास दर जारी रहती है, तो 2047 तक भारतीय मैन्युफैक्चरिंग का आकार करीब 2.7 ट्रिलियन डॉलर तक ही पहुंचने का अनुमान है। इससे 7.5 ट्रिलियन डॉलर के लक्ष्य और संभावित उपलब्धि के बीच बड़ा अंतर दिखाई देता है।
केवल क्षमता बढ़ाने से पूरा नहीं होगा लक्ष्य
KPMG का कहना है कि भारत की मैन्युफैक्चरिंग प्रतिस्पर्धा केवल नई फैक्ट्रियां लगाने, पूंजी निवेश बढ़ाने या ज्यादा कर्मचारियों को जोड़ने से मजबूत नहीं होगी। इसके लिए कंपनियों को यह भी देखना होगा कि मौजूदा कर्मचारियों, तकनीक और संसाधनों से अधिक उत्पादन और बेहतर मूल्य कैसे बनाया जा सकता है।
रिपोर्ट में वर्कफोर्स प्रोडक्टिविटी को भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर का सबसे कम इस्तेमाल किया गया महत्वपूर्ण विकास-लीवर बताया गया है। KPMG ने 130 से अधिक बड़ी भारतीय मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों के पिछले 10 वर्षों के प्रदर्शन का विश्लेषण किया है। इस अध्ययन में कर्मचारियों की उत्पादकता और कंपनियों के मूल्य निर्माण के बीच मजबूत संबंध पाया गया।
उत्पादकता बढ़ाने वाली कंपनियों का बेहतर प्रदर्शन
रिपोर्ट के अनुसार, उत्पादकता के क्षेत्र में अग्रणी कंपनियों ने अपने समकक्षों की तुलना में 10 वर्षों की अवधि में 50 प्रतिशत से अधिक ज्यादा लाभप्रदता वृद्धि दर्ज की। इन कंपनियों में बाजार पूंजीकरण की वृद्धि भी करीब दोगुनी रही।
KPMG के विश्लेषण में यह भी सामने आया कि अलग-अलग मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों के बीच उत्पादकता में अंतर 300 प्रतिशत से लेकर 1,000 प्रतिशत तक हो सकता है। यह अंतर बताता है कि समान या तुलनीय संसाधनों के बावजूद कंपनियों के प्रदर्शन में कितना बड़ा फर्क हो सकता है।
रिपोर्ट का अनुमान है कि यदि मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में लंबे समय तक 30 प्रतिशत उत्पादकता सुधार हासिल किया जा सके, तो इससे भविष्य के कुल विनिर्माण उत्पादन का लगभग 35 प्रतिशत हिस्सा पैदा करने में मदद मिल सकती है।
सात प्रमुख उत्पादकता बाधाओं की पहचान
KPMG ने मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों के सामने आने वाली कई संरचनात्मक समस्याओं की पहचान की है। इनमें संगठनात्मक ढांचे की अक्षमताएं, प्रक्रियाओं और सिस्टम की कमजोरियां, कर्मचारियों की क्षमता में कमी, अलग-अलग शिफ्टों के बीच उत्पादकता का अंतर और अप्रत्यक्ष कर्मचारियों की संख्या का जरूरत से ज्यादा होना शामिल हैं।
इन समस्याओं को दूर करने के लिए रिपोर्ट में “Productivity Triad” मॉडल की बात कही गई है। इसके तहत कंपनियों को काम करने के तरीकों को दोबारा डिजाइन करने, संगठनात्मक ढांचे को सरल और प्रभावी बनाने तथा भविष्य की जरूरतों के अनुरूप वर्कफोर्स मॉडल तैयार करने पर ध्यान देना चाहिए।
KPMG के अनुसार, इन उपायों के जरिए कंपनियां 15 से 30 प्रतिशत तक उत्पादकता सुधार हासिल करने की क्षमता रखती हैं।
AI और ऑटोमेशन बनेंगे महत्वपूर्ण साधन
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल तकनीक भी इस परिवर्तन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। KPMG के अनुसार, AI का प्रभाव केवल उत्पादन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि गुणवत्ता नियंत्रण, वित्त, मानव संसाधन, खरीद, इंजीनियरिंग और ग्राहक सेवा जैसे क्षेत्रों तक फैल रहा है।
हालांकि रिपोर्ट इस बात पर जोर देती है कि केवल नई तकनीक खरीद लेना पर्याप्त नहीं है। कंपनियों को तकनीक के साथ काम करने के तरीकों और संगठनात्मक प्रक्रियाओं में भी बदलाव करना होगा। यही संयोजन उत्पादकता में स्थायी सुधार ला सकता है।
MSME और सप्लाई चेन की भूमिका अहम
भारत के 7.5 ट्रिलियन डॉलर के मैन्युफैक्चरिंग लक्ष्य को हासिल करने में बड़े उद्योगों के साथ-साथ छोटे और मध्यम उद्यमों की भूमिका भी महत्वपूर्ण होगी। सरकार पहले ही उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (PLI), बुनियादी ढांचे और औद्योगिक निवेश को बढ़ावा देने वाली कई योजनाओं के जरिए विनिर्माण क्षमता मजबूत करने की कोशिश कर रही है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, मैन्युफैक्चरिंग को भारत की दीर्घकालिक आर्थिक वृद्धि, रोजगार और निर्यात प्रतिस्पर्धा का प्रमुख आधार माना जा रहा है।
KPMG के अनुसार, भारत को केवल अंतिम उत्पादों की असेंबली तक सीमित रहने के बजाय उत्पादन की पूरी वैल्यू चेन में अपनी हिस्सेदारी बढ़ानी होगी। इससे घरेलू वैल्यू एडिशन बढ़ेगा और भारतीय कंपनियों को वैश्विक सप्लाई चेन में अधिक मजबूत स्थान मिल सकता है।
2047 की राह में बड़ी चुनौती और बड़ा अवसर
भारत के लिए 2047 तक 7.5 ट्रिलियन डॉलर का मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर बनाना महत्वाकांक्षी लक्ष्य है। इसके लिए लगातार दो दशकों तक करीब 13 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि बनाए रखना आसान नहीं होगा। वैश्विक व्यापार, ऊर्जा लागत, भू-राजनीतिक परिस्थितियां, तकनीकी बदलाव और कुशल श्रम की उपलब्धता जैसे कारक भी इस यात्रा को प्रभावित करेंगे।
फिर भी KPMG की रिपोर्ट का संदेश स्पष्ट है कि भारत के पास विकास का एक बड़ा अवसर मौजूद है। यदि कंपनियां वर्कफोर्स प्रोडक्टिविटी, AI, ऑटोमेशन, कौशल विकास और बेहतर संगठनात्मक ढांचे पर एक साथ ध्यान देती हैं, तो मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र न केवल 2047 के आर्थिक लक्ष्य में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है, बल्कि भारत को वैश्विक उत्पादन और सप्लाई चेन का प्रमुख केंद्र बनाने में भी मदद कर सकता है।
