23 सितंबर 2026 (भारत बाणी ब्यूरो)। भारत-पाकिस्तान सीमा पर बना करतारपुर कॉरिडोर केवल करीब चार किलोमीटर लंबा रास्ता नहीं है। सिख समुदाय के लिए यह उस ऐतिहासिक और आध्यात्मिक विरासत तक पहुंचने का मार्ग है, जिसे 1947 के विभाजन ने राजनीतिक सीमा के दूसरी ओर कर दिया था। गुरदासपुर के डेरा बाबा नानक से पाकिस्तान के नारोवाल जिले में स्थित गुरुद्वारा श्री करतारपुर साहिब तक जाने वाला यह गलियारा गुरु नानक देव जी के जीवन और शिक्षाओं से जुड़ा है।
सितंबर 2026 में कॉरिडोर की सेवाएं सुरक्षा परिस्थितियों के कारण फिलहाल निलंबित हैं। इसी बीच 21 सितंबर को अकाल तख्त के कार्यवाहक जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गर्गज के नेतृत्व में सिख प्रतिनिधिमंडल ने डेरा बाबा नानक की जीरो लाइन पर अरदास कर कॉरिडोर को फिर खोलने की मांग उठाई। पाकिस्तान की ओर भी करतारपुर में जीरो लाइन के पास धार्मिक आयोजन किए गए।
गुरु नानक देव जी के अंतिम 18 वर्षों से जुड़ा स्थल
गुरुद्वारा श्री करतारपुर साहिब उस स्थान पर स्थित है जहां गुरु नानक देव जी ने अपने जीवन के अंतिम 18 वर्ष बिताए। यहीं उन्होंने संगत, कीर्तन, सेवा और समानता पर आधारित जीवन-पद्धति को आगे बढ़ाया। भारत सरकार के अनुसार, गुरुद्वारा डेरा बाबा नानक भारत-पाकिस्तान सीमा से करीब एक किलोमीटर दूर है, जबकि करतारपुर साहिब सीमा से लगभग 4.5 किलोमीटर की दूरी पर पाकिस्तान में स्थित है।
विभाजन से पहले पंजाब के लोगों के लिए इन धार्मिक स्थलों तक पहुंच सामान्य सामाजिक और धार्मिक जीवन का हिस्सा थी। 1947 के बाद अंतरराष्ट्रीय सीमा खिंचने से पाकिस्तान में स्थित कई प्रमुख सिख तीर्थस्थल भारतीय सिखों से भौगोलिक रूप से अलग हो गए। कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में सितंबर 2026 में प्रकाशित एक अध्ययन ने भी इस ऐतिहासिक अलगाव को रेखांकित किया है और करतारपुर को विभाजन के बाद अलग हुए सबसे महत्वपूर्ण सिख धार्मिक स्थलों में शामिल किया है।
2019 में खुला ऐतिहासिक गलियारा
करतारपुर कॉरिडोर को खोलने की दिशा में निर्णायक कदम नवंबर 2018 में उठाया गया, जब भारत सरकार ने डेरा बाबा नानक से अंतरराष्ट्रीय सीमा तक कॉरिडोर बनाने की पहल की और पाकिस्तान से अपनी तरफ भी आवश्यक सुविधाएं विकसित करने का आग्रह किया। दोनों देशों ने अक्टूबर 2019 में कॉरिडोर के संचालन से संबंधित समझौते पर हस्ताक्षर किए।
9 नवंबर 2019 को गुरु नानक देव जी की 550वीं जयंती के अवसर पर करतारपुर साहिब कॉरिडोर का उद्घाटन हुआ। समझौते के तहत भारतीय तीर्थयात्रियों और OCI कार्डधारकों को बिना वीजा करतारपुर साहिब जाने की सुविधा दी गई। यात्रियों को वैध पासपोर्ट के साथ यात्रा करनी होती है और निर्धारित प्रक्रिया के तहत पंजीकरण कराना होता है।
समझौते में प्रतिदिन 5,000 तीर्थयात्रियों के आवागमन की व्यवस्था का प्रावधान किया गया था। विशेष अवसरों पर क्षमता बढ़ाए जाने की संभावना भी रखी गई थी। कॉरिडोर को पूरे वर्ष संचालित करने और तीर्थयात्रियों को व्यक्तिगत या समूह में जाने की सुविधा देने पर भी सहमति बनी थी।
सीमा नहीं, रास्ता बन गया पहचान
करतारपुर कॉरिडोर की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि तीर्थयात्रियों को भारत से पाकिस्तान स्थित गुरुद्वारे तक जाने के लिए सामान्य वीजा प्रक्रिया से नहीं गुजरना पड़ता। यही व्यवस्था इसे भारत-पाकिस्तान संबंधों के संदर्भ में भी असाधारण बनाती है।
2018 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने करतारपुर परियोजना की तुलना बर्लिन की दीवार गिरने से की थी और इसे दोनों देशों के लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने वाला कदम बताया था। उस समय इसे धार्मिक यात्रा के साथ-साथ लोगों के बीच संपर्क का एक माध्यम भी माना गया।
हालांकि, दोनों देशों के बीच राजनीतिक और सुरक्षा संबंधों में उतार-चढ़ाव का असर कॉरिडोर के संचालन पर भी पड़ा है। कोविड-19 महामारी के दौरान यात्रा बंद रही और बाद में भी सुरक्षा परिस्थितियों के कारण संचालन प्रभावित हुआ। सितंबर 2026 में भी भारत सरकार की आधिकारिक वेबसाइट पर सेवाओं को अगली सूचना तक निलंबित बताया गया है।
तीर्थयात्रियों की संख्या ने दिखाया महत्व
कॉरिडोर के शुरू होने के बाद बड़ी संख्या में भारतीय तीर्थयात्रियों ने इसका इस्तेमाल किया। लैंड पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया के आंकड़ों के अनुसार, 2024-25 में डेरा बाबा नानक लैंड पोर्ट के माध्यम से करतारपुर जाने वाले यात्रियों की संख्या 1,21,113 रही। 2023-24 में यह संख्या 85,672 थी। 2025-26 में सुरक्षा और संचालन संबंधी परिस्थितियों के बीच यह संख्या घटकर 12,339 रह गई।
भारत के विदेश मंत्रालय की 2024 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, केवल 2024 में 1,14,702 तीर्थयात्रियों ने करतारपुर कॉरिडोर के माध्यम से गुरुद्वारा दरबार साहिब की यात्रा की थी।
ये आंकड़े बताते हैं कि जब कॉरिडोर सामान्य रूप से संचालित होता है, तो इसकी धार्मिक मांग काफी अधिक रहती है।
जीरो लाइन पर फिर उठी reopening की मांग
सितंबर 2026 में कॉरिडोर बंद रहने के बीच जीरो लाइन पर हुई अरदास ने एक बार फिर इस मुद्दे को सार्वजनिक चर्चा में ला दिया। भारतीय पक्ष से सिख प्रतिनिधियों ने इसे धार्मिक यात्रा के लिए फिर खोलने की मांग से जोड़ा। पाकिस्तान की ओर भी सिख संगत ने जीरो लाइन के पास अरदास, शबद कीर्तन और आरती जैसे धार्मिक कार्यक्रम किए।
पाकिस्तान के धार्मिक मामलों के मंत्रालय ने करतारपुर कॉरिडोर को भारत और पाकिस्तान के बीच धार्मिक यात्रा तथा शांति और सहयोग के प्रतीक के रूप में वर्णित किया है। वहीं पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के हालिया बयान में कहा गया है कि वह भारतीय सिख तीर्थयात्रियों के स्वागत के लिए तैयार है, जबकि भारत की ओर से फिलहाल कॉरिडोर का संचालन बंद है। यह पाकिस्तान का आधिकारिक पक्ष है।
आस्था और कूटनीति के बीच एक रास्ता
करतारपुर कॉरिडोर का महत्व धार्मिक यात्रा से आगे भी है। यह उस भूगोल को जोड़ता है जिसे 1947 के विभाजन ने राजनीतिक सीमा से अलग कर दिया था। एक ओर डेरा बाबा नानक है और दूसरी ओर करतारपुर साहिब—दोनों गुरु नानक देव जी की स्मृति से गहराई से जुड़े स्थान हैं।
कॉरिडोर के भविष्य का संचालन भारत-पाकिस्तान के सुरक्षा आकलनों, द्विपक्षीय संबंधों और प्रशासनिक फैसलों से जुड़ा रहेगा। लेकिन सिख समुदाय के लिए इसका मूल महत्व वही है जो 2019 में इसके खुलने के समय था—गुरु नानक देव जी की धरती पर सहज पहुंच और विभाजन के कारण दूर हुए एक पवित्र स्थल से दोबारा जुड़ने का अवसर।
यही कारण है कि करतारपुर कॉरिडोर को केवल सीमा पार यात्रा की सुविधा के रूप में नहीं, बल्कि इतिहास, आस्था और बंटे हुए पंजाब की साझा विरासत को जोड़ने वाले मार्ग के रूप में देखा जाता है।
