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25 सितंबर 2026 (भारत बाणी ब्यूरो)। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने अमेरिका के साथ जारी संघर्ष को समाप्त करने, रणनीतिक होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने और परमाणु कार्यक्रम पर व्यापक शांति वार्ता बहाल करने के लिए सात दिन की योजना पेश की है। अराघची के अनुसार, यदि अमेरिका ईरान की निर्धारित शर्तों को स्वीकार करता है, तो सातवें दिन के अंत तक होर्मुज को खोला जा सकता है और इसके बाद बातचीत दोबारा शुरू की जा सकती है। प्रस्ताव को मध्यस्थों के माध्यम से अमेरिकी पक्ष तक पहुंचाया गया है।

संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान पत्रकारों से बातचीत में अराघची ने कहा कि ईरान ने अमेरिका के सामने एक ऐसी योजना रखी है, जो जून में हुए समझौता ज्ञापन (MoU) से मिलती-जुलती है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि अमेरिकी मध्यावधि चुनावों से पहले समझौता हो जाना दोनों पक्षों के हित में हो सकता है। हालांकि, योजना की सभी शर्तों और अमेरिका की औपचारिक प्रतिक्रिया का पूरा विवरण सार्वजनिक नहीं किया गया है। <Cite refs={[“turn271599search11″,”turn271599search14″,”turn271599search16”]}/>

सात दिन में होर्मुज खोलने का प्रस्ताव

ईरानी विदेश मंत्री के अनुसार, प्रस्ताव के तहत कुछ निर्धारित शर्तें पूरी होने पर होर्मुज जलडमरूमध्य को सातवें दिन के अंत तक फिर से खोलने की योजना है। इसके बाद ईरान और अमेरिका के बीच व्यापक बातचीत दोबारा शुरू की जा सकती है, जिसमें ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़े मुद्दे शामिल होंगे।

होर्मुज जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी के बीच स्थित एक महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति का बड़ा हिस्सा इस रास्ते से गुजरता है। इसलिए इस जलमार्ग में व्यवधान से अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार, समुद्री परिवहन और तेल आयात करने वाले देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर असर पड़ सकता है।

ईरान का प्रस्ताव होर्मुज को फिर से खोलने की प्रक्रिया को अमेरिकी कदमों और व्यापक संघर्ष समाप्त करने वाली वार्ता से जोड़ता है। इसका अर्थ है कि तेहरान केवल समुद्री मार्ग खोलने के बजाय सुरक्षा, सैन्य दबाव और प्रतिबंधों से जुड़े मुद्दों को भी बातचीत का हिस्सा बनाना चाहता है। <Cite refs={[“turn271599news20″,”turn271599search17″,”turn271599search18”]}/>

अमेरिकी सैन्य दबाव कम करने की मांग

ईरानी अधिकारियों ने पहले भी संकेत दिया है कि होर्मुज खोलने के लिए अमेरिका को सैन्य दबाव कम करना होगा और ईरानी बंदरगाहों पर लगाए गए नौसैनिक अवरोध को हटाना होगा। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान ने अमेरिका से कूटनीतिक समाधान की इच्छा को औपचारिक रूप से स्पष्ट करने और आगे की प्रक्रिया के लिए समयसीमा तय करने की मांग की है।

तेहरान का कहना है कि बातचीत तभी आगे बढ़ सकती है, जब वॉशिंगटन ठोस कदम उठाए। ईरानी अधिकारियों ने अमेरिका और इजरायल की सैन्य कार्रवाइयों को क्षेत्रीय अस्थिरता का कारण बताया है। दूसरी ओर, अमेरिकी प्रशासन ईरान के परमाणु कार्यक्रम, सैन्य क्षमताओं और क्षेत्रीय गतिविधियों को लेकर अपनी सुरक्षा चिंताओं पर जोर देता रहा है।

इन अलग-अलग प्राथमिकताओं के कारण प्रस्ताव पर सहमति बनाना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। सात दिन की योजना बातचीत शुरू करने का आधार उपलब्ध करा सकती है, लेकिन इसके क्रियान्वयन के लिए दोनों पक्षों के बीच शर्तों और सुरक्षा व्यवस्था पर स्पष्ट सहमति आवश्यक होगी। <Cite refs={[“turn271599news20″,”turn271599search19″,”turn271599search17”]}/>

जून के समझौता ज्ञापन से जुड़ा प्रस्ताव

अराघची ने बताया कि नया प्रस्ताव जून में अमेरिका और ईरान के बीच हुए समझौता ज्ञापन के समान है। उस समझौते में अस्थायी संघर्षविराम, प्रतिबंधों और समुद्री अवरोधों से जुड़े मुद्दों तथा होर्मुज से सुरक्षित आवाजाही को लेकर प्रावधानों पर चर्चा की गई थी।

कुछ रिपोर्टों के अनुसार, जून के समझौते में 60 दिन की अस्थायी संघर्षविराम व्यवस्था और चरणबद्ध तरीके से होर्मुज को खोलने का विचार शामिल था। हालांकि, पुराने समझौते के क्रियान्वयन और दोनों पक्षों की प्रतिबद्धताओं को लेकर विवाद उत्पन्न हुए। ईरान का वर्तमान प्रस्ताव उसी प्रकार के ढांचे को कम समयसीमा में लागू करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

ईरान ने यह भी संकेत दिया है कि वह अपने पहले से रखे गए दावों और शर्तों से पीछे नहीं हट रहा है। इसलिए सात दिन की योजना को बिना शर्त समझौते के बजाय निर्धारित पूर्वशर्तों के आधार पर बातचीत बहाल करने का प्रस्ताव माना जा रहा है। <Cite refs={[“turn271599search13″,”turn271599search16″,”turn271599search9”]}/>

परमाणु कार्यक्रम पर व्यापक वार्ता की तैयारी

प्रस्ताव का एक प्रमुख उद्देश्य ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर व्यापक वार्ता को फिर से शुरू करना है। अमेरिका और ईरान के बीच इस मुद्दे को लेकर लंबे समय से मतभेद रहे हैं। वॉशिंगटन ईरान की परमाणु गतिविधियों पर सीमाएं और सत्यापन व्यवस्था चाहता है, जबकि तेहरान अपने शांतिपूर्ण परमाणु कार्यक्रम के अधिकार तथा प्रतिबंधों में राहत की मांग करता है।

अराघची ने ईरान की कूटनीति के प्रति प्रतिबद्धता पर जोर दिया है। ईरान का कहना है कि उसके परमाणु कार्यक्रम का उद्देश्य शांतिपूर्ण है और बातचीत को सैन्य दबाव के बजाय आपसी सम्मान तथा अंतरराष्ट्रीय दायित्वों के आधार पर आगे बढ़ाया जाना चाहिए।

हालांकि, परमाणु वार्ता बहाल होने के लिए केवल राजनीतिक घोषणा पर्याप्त नहीं होगी। इसमें निरीक्षण, संवर्धित यूरेनियम, प्रतिबंधों में राहत, सुरक्षा गारंटी और समझौते के अनुपालन की निगरानी जैसे तकनीकी मुद्दों पर विस्तृत बातचीत की आवश्यकता होगी।

मध्यस्थों की भूमिका महत्वपूर्ण

ईरान ने अपना प्रस्ताव सीधे टकराव के बजाय मध्यस्थों के माध्यम से अमेरिका तक पहुंचाया है। कतर सहित कुछ क्षेत्रीय देश दोनों पक्षों के बीच संदेशों के आदान-प्रदान और बातचीत की संभावनाओं को आगे बढ़ाने में भूमिका निभा रहे हैं।

न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान दोनों पक्षों के प्रतिनिधियों के बीच अप्रत्यक्ष संपर्क की संभावना बढ़ी है। रिपोर्टों के अनुसार, ईरानी और अमेरिकी अधिकारियों के बीच मध्यस्थों की मदद से बातचीत हुई है। हालांकि, इन संपर्कों को औपचारिक शांति समझौते या युद्ध समाप्ति की अंतिम सहमति नहीं माना जा सकता।

मध्यस्थ देशों के लिए चुनौती यह होगी कि वे दोनों पक्षों की सुरक्षा चिंताओं, होर्मुज में समुद्री आवाजाही और संघर्षविराम की शर्तों पर न्यूनतम सहमति तैयार कर सकें।

वैश्विक ऊर्जा बाजार पर संभावित असर

होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने की संभावना ने अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजारों का ध्यान आकर्षित किया है। इस मार्ग से तेल और गैस की आपूर्ति प्रभावित होने पर कच्चे तेल की कीमतों, बीमा लागत और समुद्री परिवहन पर दबाव बढ़ सकता है। इसके विपरीत, मार्ग खुलने और संघर्ष कम होने की उम्मीद से बाजारों में अस्थायी राहत आ सकती है।

हाल की रिपोर्टों में कूटनीतिक प्रगति की उम्मीदों के बीच कच्चे तेल की कीमतों में नरमी का उल्लेख किया गया है। हालांकि, बाजार की दिशा केवल ईरान-अमेरिका वार्ता पर निर्भर नहीं करती। क्षेत्रीय हमले, जहाजरानी की वास्तविक स्थिति, उत्पादन और निर्यात क्षमता तथा अन्य देशों की ऊर्जा नीतियां भी कीमतों को प्रभावित कर सकती हैं।

भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देश के लिए होर्मुज में स्थिर समुद्री आवाजाही महत्वपूर्ण है। लंबे समय तक व्यवधान से आयात लागत, व्यापार घाटे और घरेलू ईंधन कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।

समझौते की राह में बनी हुई चुनौतियां

ईरान का सात दिन का प्रस्ताव कूटनीतिक प्रक्रिया को फिर से शुरू करने का अवसर प्रदान करता है, लेकिन इसके परिणाम को लेकर अभी निश्चित निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। अमेरिका की औपचारिक प्रतिक्रिया, ईरान की शर्तों की विस्तृत सूची और संघर्षविराम के सत्यापन की व्यवस्था आगे की दिशा तय करेगी।

दोनों पक्षों के बीच अविश्वास, सैन्य कार्रवाई, आर्थिक प्रतिबंध और परमाणु कार्यक्रम से जुड़े मतभेद अभी भी मौजूद हैं। यदि अमेरिका और ईरान कुछ शुरुआती कदमों पर सहमत होते हैं, तो होर्मुज में समुद्री सुरक्षा और व्यापक वार्ता की प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है। यदि शर्तों पर सहमति नहीं बनती, तो क्षेत्रीय तनाव और ऊर्जा आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता जारी रह सकती है।

फिलहाल, अराघची का प्रस्ताव ईरान की ओर से कूटनीति का एक नया रास्ता प्रस्तुत करता है। इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या दोनों देश सैन्य दबाव और राजनीतिक मतभेदों के बीच व्यावहारिक समझौते के लिए तैयार होते हैं।

Bharat Baani Bureau

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