13 अक्टूबर 2026 (भारत बानी ब्यूरो) : मधुमेह यानी डायबिटीज को आमतौर पर टाइप-1 और टाइप-2 में बांटकर समझा जाता है, लेकिन चिकित्सा जगत में ‘डबल डायबिटीज’ शब्द का इस्तेमाल भी किया जाता है। यह शब्द ऐसी स्थिति के लिए प्रयोग होता है, जिसमें किसी व्यक्ति को टाइप-1 डायबिटीज होने के साथ-साथ इंसुलिन प्रतिरोध (इंसुलिन रेजिस्टेंस) भी विकसित हो जाता है। ऐसी स्थिति में शरीर को रक्त में शुगर का स्तर नियंत्रित रखने में अधिक कठिनाई हो सकती है।
हालांकि, ‘डबल डायबिटीज’ कोई अलग और सार्वभौमिक रूप से परिभाषित आधिकारिक डायबिटीज प्रकार नहीं है। इस शब्द का इस्तेमाल आम तौर पर टाइप-1 डायबिटीज और टाइप-2 डायबिटीज से जुड़ी कुछ विशेषताओं के एक साथ मौजूद होने के संदर्भ में किया जाता है।
क्या होती है डबल डायबिटीज?
टाइप-1 डायबिटीज में शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली अग्न्याशय की उन कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाती है, जो इंसुलिन बनाती हैं। इंसुलिन एक हार्मोन है, जो रक्त में मौजूद ग्लूकोज को शरीर की कोशिकाओं तक पहुंचाने में मदद करता है। टाइप-1 डायबिटीज से पीड़ित लोगों को आम तौर पर जीवनभर इंसुलिन की जरूरत होती है।
दूसरी ओर, टाइप-2 डायबिटीज में शरीर की कोशिकाएं इंसुलिन के प्रति कम संवेदनशील हो सकती हैं। इसे इंसुलिन प्रतिरोध कहा जाता है। परिणामस्वरूप, रक्त में शुगर का स्तर बढ़ सकता है।
जब टाइप-1 डायबिटीज वाले व्यक्ति में इंसुलिन प्रतिरोध भी विकसित हो जाता है, तो इसे ‘डबल डायबिटीज’ कहा जा सकता है। ऐसे में रक्त शर्करा को नियंत्रित रखने के लिए उपचार और जीवनशैली पर अतिरिक्त ध्यान देने की जरूरत पड़ सकती है।
किन लोगों को हो सकता है अधिक खतरा?
डबल डायबिटीज का जोखिम हर व्यक्ति में समान नहीं होता। टाइप-1 डायबिटीज के साथ इंसुलिन प्रतिरोध विकसित होने की संभावना कई कारकों से प्रभावित हो सकती है।
1. अधिक वजन या पेट के आसपास चर्बी: शरीर में अतिरिक्त वसा, विशेषकर पेट के आसपास जमा चर्बी, इंसुलिन प्रतिरोध से जुड़ी हो सकती है।
2. परिवार में टाइप-2 डायबिटीज का इतिहास: आनुवंशिक कारण भी इंसुलिन प्रतिरोध और टाइप-2 डायबिटीज के जोखिम को प्रभावित कर सकते हैं।
3. शारीरिक गतिविधि की कमी: लंबे समय तक निष्क्रिय रहने से चयापचय संबंधी स्वास्थ्य पर असर पड़ सकता है।
4. किशोरावस्था और हार्मोनल बदलाव: टाइप-1 डायबिटीज वाले कुछ किशोरों में यौवन के दौरान हार्मोनल बदलावों के कारण इंसुलिन की जरूरत बढ़ सकती है। हालांकि, इंसुलिन की जरूरत बढ़ना अपने आप में डबल डायबिटीज का प्रमाण नहीं है।
5. रक्त शर्करा नियंत्रित रखने में लगातार कठिनाई: यदि इंसुलिन लेने और निर्धारित उपचार का पालन करने के बावजूद शुगर नियंत्रित करना मुश्किल हो रहा है, तो डॉक्टर अन्य कारणों के साथ इंसुलिन प्रतिरोध की भी जांच कर सकते हैं।
किन संकेतों पर ध्यान देना चाहिए?
डबल डायबिटीज के लिए कोई एक विशिष्ट लक्षण नहीं है। इसके संकेत टाइप-1 डायबिटीज और इंसुलिन प्रतिरोध से जुड़े लक्षणों के साथ मिल सकते हैं। इनमें शामिल हैं:
- रक्त में शुगर का बार-बार बढ़ना या लक्ष्य सीमा में बनाए रखने में कठिनाई।
- इंसुलिन की जरूरत में लगातार बदलाव या बढ़ोतरी।
- वजन बढ़ना, विशेषकर पेट के आसपास।
- थकान और ऊर्जा की कमी।
- अधिक प्यास लगना और बार-बार पेशाब आना।
बचाव और प्रबंधन के लिए क्या करें?
डबल डायबिटीज के प्रबंधन में व्यक्तिगत जरूरतों के अनुसार उपचार और जीवनशैली में बदलाव महत्वपूर्ण हैं।
- संतुलित आहार लें और नियमित शारीरिक गतिविधि बनाए रखें।
- वजन को स्वस्थ सीमा में रखने का प्रयास करें।
- डॉक्टर की सलाह के अनुसार रक्त शर्करा की निगरानी करें।
- नियमित जांच के जरिए रक्तचाप और कोलेस्ट्रॉल पर भी ध्यान दें।
- इंसुलिन या अन्य दवाओं की खुराक में बदलाव केवल डॉक्टर की सलाह से करें।
टाइप-1 डायबिटीज में इंसुलिन जीवनरक्षक उपचार है। इसे खुद से बंद करना या खुराक में बड़ा बदलाव करना खतरनाक हो सकता है।
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यदि रक्त शर्करा बहुत अधिक हो और साथ में उल्टी, पेट दर्द, तेज या गहरी सांस, अत्यधिक कमजोरी अथवा भ्रम जैसे लक्षण हों, तो तुरंत आपातकालीन चिकित्सा सहायता लें। ये डायबिटिक कीटोएसिडोसिस जैसी गंभीर स्थिति के संकेत हो सकते हैं।
निष्कर्ष: डबल डायबिटीज का मतलब आम तौर पर टाइप-1 डायबिटीज के साथ इंसुलिन प्रतिरोध का होना है। समय पर चिकित्सकीय मूल्यांकन, नियमित निगरानी और व्यक्तिगत उपचार योजना से रक्त शर्करा तथा इससे जुड़ी जटिलताओं के जोखिम को बेहतर तरीके से संभालने में मदद मिल सकती है।
