16 अक्टूबर 2026 (भारत बानी ब्यूरो) : इंस्टेंट नूडल्स, चिप्स, मीठे पेय और प्रोसेस्ड मीट जैसे अत्यधिक प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों की जगह साबुत अनाज और कम से कम प्रोसेस्ड भोजन को शामिल करना आंतों के कैंसर के जोखिम को कम करने में मददगार हो सकता है। अमेरिका के 4.6 लाख से अधिक वयस्कों के आंकड़ों पर आधारित एक नए अध्ययन में पाया गया कि अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड की खपत का 10 प्रतिशत हिस्सा कम प्रोसेस्ड भोजन से बदलने का संबंध कोलोरेक्टल यानी बड़ी आंत और मलाशय के कैंसर की कम घटनाओं से था।
शोध में इस बदलाव के साथ आंतों के कैंसर की घटनाओं में लगभग 2 प्रतिशत कमी का संबंध पाया गया। हालांकि, यह एक अध्ययन से सामने आया सांख्यिकीय संबंध है, इस बात का प्रमाण नहीं कि केवल भोजन बदलने से किसी व्यक्ति में कैंसर होना निश्चित रूप से रुक जाएगा।
क्या होते हैं अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड?
अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थ आम तौर पर औद्योगिक तरीके से तैयार किए जाते हैं और इनमें कई बार अतिरिक्त चीनी, नमक, वसा, स्वाद बढ़ाने वाले तत्व या अन्य एडिटिव्स शामिल होते हैं। इनके उदाहरणों में पैकेट वाले स्नैक्स, कुछ इंस्टेंट भोजन, मीठे पेय और प्रोसेस्ड मीट शामिल हैं।
हालांकि, हर पैकेट में मिलने वाला भोजन एक जैसा नहीं होता। कुछ औद्योगिक रूप से तैयार खाद्य पदार्थों में साबुत अनाज, फाइबर, कैल्शियम या डेयरी जैसे पोषक तत्व भी हो सकते हैं। इसलिए किसी खाद्य पदार्थ का केवल प्रोसेस्ड होना ही उसकी पोषण गुणवत्ता का पूरा आकलन नहीं करता।
अध्ययन में क्या सामने आया?
शोधकर्ताओं ने भोजन के प्रकार और कोलोरेक्टल कैंसर की घटनाओं के बीच संबंधों का विश्लेषण किया। निष्कर्षों के अनुसार, अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड के एक हिस्से को कम प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों से बदलने का संबंध कैंसर की कम घटनाओं से था। वहीं, कुल अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड की खपत और आंतों के कैंसर के बीच कोई स्पष्ट संबंध नहीं मिला।
अध्ययन में यह भी पाया गया कि अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों से मिलने वाले साबुत अनाज, फाइबर, डेयरी और कैल्शियम का सेवन कम कोलोरेक्टल कैंसर जोखिम से जुड़ा था। इसके विपरीत, प्रोसेस्ड मीट का सेवन अधिक जोखिम से संबंधित पाया गया। ये निष्कर्ष बताते हैं कि भोजन की गुणवत्ता और उसमें मौजूद पोषक तत्वों को समझना भी जरूरी है।
भोजन में छोटे बदलाव कैसे मदद कर सकते हैं?
विशेषज्ञों की सामान्य पोषण सलाह के अनुरूप, रोजमर्रा के भोजन में कुछ व्यावहारिक बदलाव किए जा सकते हैं। उदाहरण के लिए, पैकेट वाले स्नैक्स की जगह फल या बिना नमक वाले मेवे, रिफाइंड अनाज की जगह साबुत अनाज और प्रोसेस्ड मीट की जगह दालें, बीन्स या अन्य पौष्टिक विकल्प अपनाए जा सकते हैं।
भारतीय भोजन में दाल, चना, राजमा, सब्जियां, फल और साबुत अनाज को शामिल करना फाइबर की मात्रा बढ़ाने का एक व्यावहारिक तरीका है। हालांकि, किसी एक खाद्य पदार्थ को शामिल करना या हटाना कैंसर से पूर्ण सुरक्षा की गारंटी नहीं देता।
क्या केवल डाइट बदलना पर्याप्त है?
नहीं। कोलोरेक्टल कैंसर का जोखिम उम्र, पारिवारिक इतिहास, आनुवंशिक कारकों, शारीरिक गतिविधि, धूम्रपान, शराब के सेवन और अन्य स्वास्थ्य संबंधी परिस्थितियों से भी प्रभावित हो सकता है। अध्ययन में मिले संबंधों को कारण और परिणाम का निश्चित प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए।
लगातार पेट दर्द, मल त्याग की आदतों में बदलाव, मल में खून या बिना स्पष्ट कारण वजन कम होने जैसे लक्षण होने पर डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है। उम्र और व्यक्तिगत जोखिम के अनुसार स्क्रीनिंग भी महत्वपूर्ण है।
कुल मिलाकर, अध्ययन का संदेश यह है कि भोजन में छोटे और टिकाऊ बदलाव उपयोगी हो सकते हैं। अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों का कुछ हिस्सा साबुत और कम प्रोसेस्ड विकल्पों से बदलना बेहतर आहार की दिशा में एक कदम है, लेकिन कैंसर के जोखिम को समझने और कम करने के लिए संतुलित जीवनशैली तथा समय पर चिकित्सकीय जांच भी जरूरी है।
