15 जून 2026 (भारत बानी ब्यूरो ) : भारत में थोक मूल्य सूचकांक (WPI) आधारित महंगाई दर मई महीने में बढ़कर 9.68 प्रतिशत पहुंच गई है। ईंधन, खाद्य वस्तुओं और विनिर्मित उत्पादों की कीमतों में तेज वृद्धि को इसका प्रमुख कारण माना जा रहा है।
जारी आंकड़ों के अनुसार, वैश्विक स्तर पर ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव और आपूर्ति संबंधी चुनौतियों का असर घरेलू बाजार पर भी देखने को मिला। इसके परिणामस्वरूप ईंधन और बिजली श्रेणी में कीमतों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई।
खाद्य वस्तुओं की बात करें तो सब्जियां, फल, अनाज और अन्य आवश्यक उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि ने महंगाई पर अतिरिक्त दबाव बनाया। इससे आम उपभोक्ताओं के घरेलू बजट पर असर पड़ने की आशंका बढ़ गई है।
विनिर्मित वस्तुओं (Manufactured Products) की कीमतों में भी बढ़ोतरी देखी गई। उद्योगों के लिए कच्चे माल और ऊर्जा लागत बढ़ने के कारण उत्पादन खर्च में इजाफा हुआ, जिसका प्रभाव तैयार उत्पादों की कीमतों पर पड़ा।
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में हालिया उतार-चढ़ाव ने भी महंगाई के दबाव को बढ़ाया है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए वैश्विक तेल कीमतों में बदलाव का सीधा असर अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि ईंधन और खाद्य वस्तुओं की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं तो आने वाले महीनों में खुदरा महंगाई (CPI) पर भी दबाव बढ़ सकता है।
उद्योग जगत ने चिंता जताई है कि बढ़ती लागत से उत्पादन और निवेश गतिविधियां प्रभावित हो सकती हैं। वहीं उपभोक्ताओं के लिए रोजमर्रा की वस्तुएं महंगी होने का खतरा बना हुआ है।
आर्थिक विश्लेषकों का कहना है कि महंगाई में यह उछाल मौद्रिक नीति निर्माताओं के लिए भी चुनौती बन सकता है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) आने वाले समय में कीमतों की स्थिति पर करीबी नजर बनाए रख सकता है।
हालांकि कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में स्थिरता आती है और आपूर्ति श्रृंखला संबंधी समस्याएं कम होती हैं, तो महंगाई के दबाव में राहत मिल सकती है।
फिलहाल मई के आंकड़े यह संकेत देते हैं कि खाद्य, ईंधन और औद्योगिक लागतों में वृद्धि भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक प्रमुख चिंता बनी हुई है।
