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29  जुलाई  2026 (भारत बानी ब्यूरो ) :  भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) का मानना है कि भारतीय रुपया अपनी वास्तविक आर्थिक क्षमता की तुलना में कम मूल्यांकित (Undervalued) है। केंद्रीय बैंक का यह आकलन हाल ही में जारी विश्लेषण में सामने आया, जिसमें रुपये की विनिमय दर, विदेशी मुद्रा प्रवाह और भारत की आर्थिक स्थिति का मूल्यांकन किया गया।

‘अंडरवैल्यूड’ रुपये का क्या मतलब है?

जब किसी देश की मुद्रा का बाजार मूल्य उसकी आर्थिक बुनियाद, उत्पादकता और व्यापारिक क्षमता की तुलना में कम माना जाता है, तो उसे अंडरवैल्यूड कहा जाता है। इसका अर्थ है कि रुपया विदेशी मुद्राओं के मुकाबले जितना मजबूत होना चाहिए, उससे कम स्तर पर कारोबार कर रहा है।

RBI ऐसा क्यों मानता है?

RBI के अनुसार, भारत में मजबूत आर्थिक वृद्धि, विदेशी मुद्रा भंडार, स्थिर वित्तीय प्रणाली और हाल के वर्षों में बढ़े विदेशी पूंजी प्रवाह के बावजूद रुपये का मूल्य अपेक्षाकृत कमजोर बना हुआ है।

केंद्रीय बैंक का मानना है कि वैश्विक अनिश्चितता, डॉलर की मजबूती, कच्चे तेल की ऊंची कीमतें और भू-राजनीतिक तनाव जैसे बाहरी कारकों ने रुपये पर दबाव बनाए रखा है। इन कारणों से रुपये का बाजार मूल्य उसकी वास्तविक आर्थिक स्थिति को पूरी तरह प्रतिबिंबित नहीं कर रहा।

इसका क्या असर पड़ता है?

विशेषज्ञों के अनुसार, कमजोर रुपया निर्यातकों के लिए लाभदायक हो सकता है क्योंकि भारतीय उत्पाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपेक्षाकृत सस्ते हो जाते हैं। वहीं, आयात महंगे हो जाते हैं, जिससे कच्चे तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य आयातित वस्तुओं की लागत बढ़ सकती है।

FCNR(B) प्रवाह का महत्व

RBI ने यह भी बताया कि Foreign Currency Non-Resident (Bank) [FCNR(B)] खातों के जरिए विदेशी मुद्रा का प्रवाह बढ़कर लगभग 32 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। इससे भारत के विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूती मिलती है और रुपये को समर्थन मिलता है।

आगे क्या?

RBI ने स्पष्ट किया है कि उसका उद्देश्य किसी निश्चित विनिमय दर को बनाए रखना नहीं, बल्कि विदेशी मुद्रा बाजार में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करना और वित्तीय स्थिरता बनाए रखना है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि विदेशी निवेश मजबूत रहता है और वैश्विक परिस्थितियां अनुकूल होती हैं, तो रुपये में आगे मजबूती देखने को मिल सकती है।

Bharat Baani Bureau

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