21 अगस्त, 2026 (भारत बानी ब्यूरो ) : बिरला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी एंड साइंस (BITS) पिलानी के वैज्ञानिकों ने 3D बायोप्रिंटिंग के क्षेत्र में एक नई बायोइंक विकसित की है, जिसका इस्तेमाल टिशू इंजीनियरिंग के लिए स्कैफोल्ड तैयार करने और मरीजों की जरूरत के अनुसार दवाओं की कस्टमाइज्ड टैबलेट बनाने में किया जा सकता है। शोध में कम लागत और पहले से नियामकीय रूप से स्वीकृत फार्मास्युटिकल पॉलिमर का इस्तेमाल किया गया है।
शोधकर्ताओं ने मक्के के स्टार्च, माल्टोडेक्सट्रिन और सोडियम एल्जिनेट को मिलाकर यह नई बायोइंक तैयार की। इन सामग्रियों को इसलिए चुना गया क्योंकि ये आसानी से उपलब्ध हैं, अपेक्षाकृत कम लागत वाली हैं और चिकित्सा एवं फार्मास्युटिकल इस्तेमाल के लिए उपयुक्त मानी जाती हैं। इसके अलावा, इनमें पशु-आधारित सामग्री का इस्तेमाल नहीं किया गया है।
टीम ने इस सामग्री को सेमी-सॉलिड एक्सट्रूजन 3D बायोप्रिंटिंग तकनीक के जरिए इस्तेमाल किया। इस प्रक्रिया में बायोइंक को एक डिजिटल डिजाइन के आधार पर परत-दर-परत जमा करके वांछित आकार की त्रि-आयामी संरचना तैयार की जाती है।
इस बायोइंक की एक खास विशेषता शियर-थिनिंग है। इसका मतलब है कि प्रिंटर की नोजल से दबाव पड़ने पर सामग्री आसानी से बहती है, लेकिन बाहर निकलने के तुरंत बाद दोबारा ठोस जैसी संरचना हासिल कर लेती है। शोधकर्ताओं के अनुसार, विकसित फॉर्मूलेशन ने बहुत तेजी से अपनी मोटाई का करीब 87 फीसदी हिस्सा वापस हासिल किया, जिससे प्रिंट की गई संरचना के ढहने का खतरा कम हुआ।
प्रिंटिंग के बाद सामग्री को कैल्शियम क्लोराइड के संपर्क में लाकर आयनिक क्रॉस-लिंकिंग की गई। इस प्रक्रिया से पॉलिमर एक स्थिर और पानी से भरपूर जेल यानी हाइड्रोजेल में बदल गए। इस हाइड्रोजेल का इस्तेमाल दो अलग-अलग चिकित्सा अनुप्रयोगों को प्रदर्शित करने के लिए किया गया।
पहला इस्तेमाल त्वचा के दोबारा निर्माण के लिए 3D-प्रिंटेड स्कैफोल्ड तैयार करने में किया गया। शोधकर्ताओं ने ऐसी छिद्रयुक्त संरचनाएं तैयार कीं, जिनमें लगभग 39 माइक्रोमीटर चौड़े छोटे-छोटे छेद थे। इन छिद्रों का उद्देश्य कोशिकाओं तक ऑक्सीजन और पोषक तत्वों की पहुंच को आसान बनाना और कोशिकाओं को बढ़ने के लिए उपयुक्त संरचना उपलब्ध कराना था।
शोध में इन स्कैफोल्ड की जैव-संगतता का भी परीक्षण किया गया। वैज्ञानिकों ने माउस फाइब्रोब्लास्ट और मानव केराटिनोसाइट्स जैसी त्वचा से जुड़ी कोशिकाओं पर सामग्री का परीक्षण किया। 48 घंटे के परीक्षण के दौरान 70 फीसदी से अधिक कोशिकाएं जीवित रहीं, जिससे संकेत मिला कि विकसित सामग्री कोशिकाओं के लिए अनुकूल थी। रक्त-संगतता परीक्षण में भी लाल रक्त कोशिकाओं को न्यूनतम नुकसान पाया गया।
इस तकनीक का दूसरा महत्वपूर्ण इस्तेमाल कस्टमाइज्ड दवा बनाने में किया गया। शोधकर्ताओं ने बायोइंक में ग्लिमेपिराइड नामक दवा को शामिल किया और उसे चबाने योग्य टैबलेट के रूप में 3D प्रिंट किया। ग्लिमेपिराइड टाइप-2 डायबिटीज के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवा है।
शोध के दौरान तैयार की गई 3D-प्रिंटेड टैबलेट में 2 मिलीग्राम की निर्धारित खुराक की अच्छी एकरूपता पाई गई। इसके अलावा, टैबलेट ने लगभग चार घंटे तक धीरे-धीरे दवा रिलीज करने की क्षमता दिखाई। यह खास तौर पर उन दवाओं के लिए उपयोगी हो सकता है जिनमें बहुत सटीक कम मात्रा की खुराक की जरूरत होती है।
शोधकर्ताओं का मानना है कि भविष्य में इस तरह की तकनीक से मरीज की जरूरत के अनुसार दवा की खुराक, आकार और स्वरूप को बदला जा सकता है। उदाहरण के लिए, बच्चों या बुजुर्गों के लिए आसानी से चबाई या निगली जा सकने वाली दवाएं तैयार की जा सकती हैं।
टिशू इंजीनियरिंग के क्षेत्र में भी इस तकनीक की संभावनाएं महत्वपूर्ण हैं। 3D-प्रिंटेड स्कैफोल्ड ऐसी संरचना उपलब्ध करा सकते हैं जिस पर कोशिकाएं विकसित होकर क्षतिग्रस्त टिशू की मरम्मत में मदद कर सकें। हालांकि, इस तरह की तकनीक को व्यापक क्लिनिकल इस्तेमाल तक पहुंचाने के लिए अभी आगे के परीक्षण और नियामकीय मूल्यांकन की आवश्यकता होगी।
इस शोध की खासियत यह भी है कि इसमें महंगे या विशेष रूप से विकसित बायोइंक की जगह आसानी से उपलब्ध फार्मास्युटिकल पॉलिमर का इस्तेमाल किया गया। इससे भविष्य में 3D बायोप्रिंटिंग तकनीक को अधिक किफायती और व्यावहारिक बनाने की संभावना बढ़ सकती है।
यदि आगे के अध्ययनों में इस तकनीक की सुरक्षा और प्रभावशीलता की पुष्टि होती है, तो इसका इस्तेमाल अस्पतालों में कस्टम टिशू स्कैफोल्ड और फार्मेसी स्तर पर मरीजों के लिए व्यक्तिगत दवाएं तैयार करने जैसी प्रक्रियाओं में किया जा सकता है। फिलहाल यह शोध 3D प्रिंटिंग, टिशू इंजीनियरिंग और व्यक्तिगत दवा निर्माण के बीच एक संभावित महत्वपूर्ण कड़ी प्रस्तुत करता है।
