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28 अगस्त, 2026 (भारत बानी ब्यूरो ) : जी ग्रुप के संस्थापक सुभाष चंद्रा को उनकी कंपनियों द्वारा लिए गए कर्ज से जुड़े पर्सनल गारंटी मामले में बड़ी राहत मिली है। नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) ने ऐसा रिपेमेंट प्लान मंजूर किया है, जिसके तहत करीब ₹22,006 करोड़ के दावों के मुकाबले लेनदारों को सिर्फ ₹6.5 करोड़ मिलने हैं। इसका मतलब है कि लेनदारों को करीब 99.97% का हेयरकट स्वीकार करना पड़ेगा।

यह मामला उन कर्जों से जुड़ा है, जिनके लिए सुभाष चंद्रा ने व्यक्तिगत गारंटी दी थी। उनकी कंपनियों द्वारा लिए गए कर्ज के भुगतान में चूक के बाद वित्तीय लेनदारों ने व्यक्तिगत गारंटर के खिलाफ दिवालिया प्रक्रिया शुरू की थी। रिपोर्ट के मुताबिक, इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस की याचिका के बाद 2024 में चंद्रा के खिलाफ व्यक्तिगत दिवालिया कार्यवाही शुरू हुई थी।

NCLT के 25 अगस्त के आदेश में मंजूर किए गए समाधान के तहत लेनदारों को कुल दावे का बेहद छोटा हिस्सा ही वापस मिलेगा। ₹22,006.57 करोड़ के दावों के मुकाबले ₹6.5 करोड़ की रिकवरी लगभग 0.03% बैठती है। यही वजह है कि इस फैसले को लेकर बैंकिंग और वित्तीय क्षेत्र में काफी चर्चा हो रही है।

इस मामले में कई बड़े बैंक और वित्तीय संस्थान लेनदार हैं। HDFC Bank ने संकेत दिया है कि वह NCLT के फैसले के खिलाफ अपील करने के विकल्प पर विचार कर रहा है। बैंक के मुताबिक, वह इस आदेश की समीक्षा कर रहा है और कानूनी रास्ते तलाश सकता है।

LIC Housing Finance भी इस फैसले को चुनौती देने की तैयारी में है। रिपोर्टों के अनुसार, HDFC Bank और LIC Housing Finance दोनों ₹22,006 करोड़ के इस मामले में NCLT के आदेश के खिलाफ कानूनी कदम उठाने पर विचार कर रहे हैं।

इस मामले में सुभाष चंद्रा का पक्ष भी महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा है कि वह मुख्य कर्जदार नहीं थे, बल्कि केवल व्यक्तिगत गारंटर की भूमिका में थे। उनके अनुसार, उन्होंने सीधे तौर पर इन कर्जों को उधार नहीं लिया था।

पर्सनल गारंटी का मतलब है कि किसी कंपनी के कर्ज के लिए प्रमोटर या व्यक्ति व्यक्तिगत रूप से गारंटी देता है। यदि कंपनी कर्ज चुकाने में असफल रहती है, तो कुछ परिस्थितियों में लेनदार गारंटर से भी बकाया रकम की वसूली की कानूनी प्रक्रिया शुरू कर सकते हैं।

सुभाष चंद्रा का मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें कर्ज की मूल राशि और मंजूर किए गए समाधान के बीच बहुत बड़ा अंतर है। लगभग ₹22,006 करोड़ के दावों के मुकाबले केवल ₹6.5 करोड़ की रिकवरी ने इस सवाल को जन्म दिया है कि व्यक्तिगत दिवालिया प्रक्रिया में लेनदारों की वास्तविक वसूली कितनी प्रभावी हो सकती है।

99.97% हेयरकट का सीधा अर्थ है कि लेनदारों को अपने दावे की लगभग पूरी रकम छोड़नी पड़ रही है। हालांकि, इसे सीधे तौर पर बैंकों के तत्काल नकद नुकसान के बराबर नहीं माना जा सकता, क्योंकि बैंकिंग संस्थानों के खातों में पहले से इस कर्ज के लिए प्रावधान और मूल्यांकन किए गए हो सकते हैं। वास्तविक वित्तीय प्रभाव संबंधित संस्थानों के बही-खातों और पहले की रिकवरी पर निर्भर करेगा।

NCLT के फैसले ने व्यक्तिगत दिवालियापन व्यवस्था को लेकर भी बहस छेड़ दी है। इस मामले में यह सवाल उठ रहा है कि यदि किसी गारंटर की संपत्ति और भुगतान क्षमता सीमित हो, तो बड़े कर्ज के मामले में लेनदारों को कितनी वास्तविक वसूली मिल सकती है।

रिपोर्टों के मुताबिक, ट्रिब्यूनल ने इस मामले में फोरेंसिक जांच को अनिवार्य नहीं माना और लेनदारों के बहुमत से स्वीकृत समाधान योजना को मंजूरी दी। इससे प्रक्रिया और लेनदारों के अधिकारों को लेकर भी चर्चा तेज हुई है।

HDFC Bank और LIC Housing Finance की संभावित अपील के बाद इस मामले में आगे की कानूनी प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी। यदि उच्च न्यायिक मंच NCLT के फैसले में बदलाव करता है, तो रिकवरी की शर्तों पर दोबारा विचार हो सकता है। वहीं, यदि आदेश बरकरार रहता है, तो यह व्यक्तिगत गारंटी और दिवालिया मामलों से जुड़े भविष्य के मामलों के लिए महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है।

यह मामला ऐसे समय में सामने आया है जब भारतीय बैंकिंग क्षेत्र में बड़े कॉरपोरेट कर्ज और उनकी रिकवरी को लेकर लगातार निगरानी बढ़ी है। बैंकों के लिए व्यक्तिगत गारंटी को कर्ज जोखिम कम करने का एक महत्वपूर्ण साधन माना जाता है, लेकिन इस मामले में बेहद कम रिकवरी ने इसकी व्यावहारिक प्रभावशीलता पर सवाल खड़े किए हैं।

फिलहाल सुभाष चंद्रा को NCLT के मंजूर किए गए समाधान से राहत मिली है, लेकिन मामले का अंतिम परिणाम अभी तय नहीं माना जा सकता। प्रमुख लेनदारों की ओर से संभावित कानूनी चुनौती के कारण आने वाले दिनों में यह मामला फिर अदालतों में जा सकता है।

Bharat Baani Bureau

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