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11 सितंबर, 2026 (भारत बानी ब्यूरो): निर्देशक तिग्मांशु धूलिया एक बार फिर भारतीय हिंदी पट्टी के अपराध, राजनीति और सत्ता की दुनिया में लौटे हैं। उनकी नई फिल्म ‘घमासान’ में प्रतीक गांधी और अरशद वारसी आमने-सामने हैं। बुंदेलखंड की बीहड़ पृष्ठभूमि में बनी यह क्राइम-थ्रिलर एक ईमानदार पुलिस अधिकारी और करीब तीन दशक से इलाके में अपना दबदबा बनाए बैठे खूंखार डकैत के बीच टकराव को केंद्र में रखती है। फिल्म 11 सितंबर को ZEE5 पर स्ट्रीम हुई है।

फिल्म में अरशद वारसी ने महाराज नाम के खौफनाक डकैत का किरदार निभाया है, जबकि प्रतीक गांधी आईपीएस अधिकारी आदित्य सिंह की भूमिका में हैं। आदित्य का मिशन महाराज और उसके गिरोह के आतंक को खत्म करना है। इसके बाद शुरू होती है पुलिस और डकैत के बीच एक तनावपूर्ण बिल्ली-चूहे की दौड़, जिसमें अपराध के साथ-साथ स्थानीय राजनीति, जातिगत समीकरण और सत्ता के खेल की झलक भी देखने को मिलती है।

अरशद वारसी का बदला हुआ अंदाज

‘घमासान’ की सबसे बड़ी ताकत अरशद वारसी का प्रदर्शन है। कॉमेडी और हल्के-फुल्के किरदारों के लिए मशहूर रहे वारसी यहां एक बेरहम और डरावने डकैत के रूप में दिखाई देते हैं। उनका महाराज वाला अंदाज फिल्म के सबसे प्रभावशाली हिस्सों में से एक है।

वारसी अपने किरदार में आक्रामकता और रहस्य दोनों लेकर आते हैं। समीक्षकों ने उनके अभिनय को फिल्म की प्रमुख खूबियों में गिना है। वहीं प्रतीक गांधी भी ईमानदार और दृढ़निश्चयी आईपीएस अधिकारी के रूप में गंभीर नजर आते हैं। दोनों कलाकारों की आमने-सामने की मौजूदगी फिल्म को जरूरी तनाव देती है।

प्रतीक गांधी की गंभीर भूमिका

प्रतीक गांधी का आदित्य महाराज के बिल्कुल विपरीत नजर आता है। जहां महाराज स्थानीय इलाके में डर और प्रभाव के सहारे अपनी सत्ता चलाता है, वहीं आदित्य कानून के रास्ते पर चलते हुए उसे पकड़ने की कोशिश करता है।

गांधी ने अधिकारी के किरदार को संयमित तरीके से निभाया है। उनके अभिनय में अनावश्यक नाटकीयता के बजाय गंभीरता दिखाई देती है। हालांकि कुछ समीक्षाओं का मानना है कि फिल्म आदित्य के चरित्र को उतनी गहराई नहीं देती, जितनी वह दे सकती थी।

बुंदेलखंड का माहौल फिल्म की ताकत

तिग्मांशु धूलिया की फिल्मों में भारतीय हिंदी पट्टी का माहौल हमेशा महत्वपूर्ण रहा है और ‘घमासान’ में भी यह स्पष्ट दिखाई देता है। बीहड़, जंगल, गांव, बंदूकें और स्थानीय सत्ता संरचना फिल्म को एक खुरदुरा और वास्तविक वातावरण देते हैं।

कहानी कथित तौर पर वास्तविक घटनाओं से प्रेरित है, हालांकि यह किसी एक व्यक्ति की बायोपिक नहीं है। फिल्म बुंदेलखंड के अपराध जगत को एक ऐसे समय और सामाजिक माहौल में रखती है, जहां डकैतों का प्रभाव, स्थानीय राजनीति और पुलिस व्यवस्था एक-दूसरे से गहराई से जुड़े नजर आते हैं।

कहानी में है दम, लेकिन लेखन कमजोर कड़ी

‘घमासान’ का विषय दिलचस्प है, लेकिन फिल्म की सबसे बड़ी समस्या इसका असमान लेखन और गति है। शुरुआती हिस्सों में तनाव पैदा होता है और कई दृश्य प्रभावी ढंग से आगे बढ़ते हैं, लेकिन दूसरे हिस्से में कहानी कुछ जगहों पर बिखरी हुई महसूस होती है।

कुछ समीक्षकों के अनुसार कई दृश्य एक-दूसरे से सहज रूप से नहीं जुड़ते और कुछ किरदारों की कहानी अधूरी-सी लगती है। करीब ढाई घंटे की फिल्म में संपादन अधिक चुस्त होता तो इसकी गति और प्रभाव दोनों बेहतर हो सकते थे।

हिंसा और एक्शन

फिल्म का ट्रीटमेंट काफी कच्चा और हिंसक है। डकैतों की दुनिया को ग्लैमराइज करने के बजाय ‘घमासान’ कई जगह इसकी क्रूरता को सामने लाने की कोशिश करती है। हालांकि एक्शन और पीछा करने वाले कुछ दृश्यों को समीक्षकों ने अपेक्षाकृत सामान्य और कम प्रभावशाली माना है।

फिल्म में राजपाल यादव और जतिन गोस्वामी जैसे कलाकार भी अपनी भूमिकाओं में नजर आते हैं। सीमित स्क्रीन टाइम के बावजूद राजपाल यादव अपनी छाप छोड़ते हैं, जबकि जतिन गोस्वामी महाराज के करीबी सहयोगी के रूप में प्रभावी दिखाई देते हैं।

क्या ‘घमासान’ देखनी चाहिए?

‘घमासान’ उन दर्शकों को पसंद आ सकती है जिन्हें रॉ क्राइम ड्रामा, डकैतों की कहानियां और तिग्मांशु धूलिया की यथार्थवादी शैली पसंद है। अरशद वारसी और प्रतीक गांधी का अभिनय फिल्म देखने की सबसे बड़ी वजह है।

हालांकि जो दर्शक लगातार तेज रफ्तार, चौंकाने वाले ट्विस्ट और बेहद सधे हुए स्क्रीनप्ले की उम्मीद कर रहे हैं, उनके लिए फिल्म थोड़ी निराशाजनक हो सकती है। अलग-अलग समीक्षाओं में भी फिल्म को लेकर राय मिश्रित रही है—जहां कुछ ने इसके माहौल और कलाकारों की तारीफ की, वहीं कहानी के बिखरेपन और गति को इसकी कमजोरी बताया गया है। टाइम्स ऑफ इंडिया ने इसे 2.5/5 की रेटिंग दी है, जबकि आउटलुक ने 2/5 स्टार दिए हैं।

फैसला: ‘घमासान’ में अरशद वारसी और प्रतीक गांधी की टक्कर दमदार है और बुंदेलखंड की पृष्ठभूमि इसे अलग पहचान देती है, लेकिन असमान पटकथा और धीमी गति फिल्म को उस ऊंचाई तक पहुंचने से रोक देती है जिसकी इससे उम्मीद की जा सकती थी।

Bharat Baani Bureau

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