21 सितंबर 2026 (भारत बाणी ब्यूरो)। एशियन गेम्स 2026 में भारतीय निशानेबाजों ने पदक जीतने के लिए केवल शूटिंग रेंज पर ही तैयारी नहीं की, बल्कि प्रतियोगिता स्थल तक पहुंचने वाले लगभग दो घंटे के कठिन बस सफर से निपटने के लिए भी विशेष रणनीति अपनाई। गर्दन में अकड़न, मोशन सिकनेस और मानसिक थकान से बचने के लिए खिलाड़ियों को नेक पिलो का इस्तेमाल करने, फोन स्क्रीन से दूरी बनाए रखने और जरूरत पड़ने पर सोने की सलाह दी गई।
भारतीय टीम की यह तैयारी प्रतियोगिता के पहले ही दिन रंग लाई। एलावेनिल वलारिवान, सोनम मस्कर और विदर्शा विनोद ने महिलाओं की 10 मीटर एयर राइफल टीम स्पर्धा में रजत पदक जीता। इसके बाद एलावेनिल ने व्यक्तिगत स्पर्धा में भी रजत पदक हासिल किया। इस तरह भारत ने शूटिंग रेंज से दो रजत पदकों के साथ एशियन गेम्स 2026 में अपना पदक अभियान शुरू किया। <Cite refs={[“turn0search0″,”turn0news12”]} />
नागोया से शूटिंग रेंज तक चुनौतीपूर्ण सफर
टोयोटा सिटी में स्थित आइची प्रीफेक्चुरल जनरल शूटिंग गैलरी समुद्र तल से लगभग 670 मीटर की ऊंचाई पर है। नागोया से शूटिंग रेंज तक पहुंचने वाला रास्ता पहाड़ी और घुमावदार है। आयोजकों ने शुरुआत में यात्रा में लगभग 70 मिनट लगने का अनुमान दिया था, लेकिन वास्तविक सफर करीब दो घंटे तक खिंच गया।
निशानेबाजी जैसे एकाग्रता और स्थिरता पर आधारित खेल में प्रतियोगिता से पहले इतना लंबा और लगातार हिलने-डुलने वाला सफर खिलाड़ियों के लिए चुनौती बन सकता था। बस के मोड़, गर्दन की स्थिति और मोबाइल स्क्रीन देखने से होने वाली परेशानी खिलाड़ियों की शारीरिक तथा मानसिक तैयारी को प्रभावित कर सकती थी।
इसी वजह से भारतीय कोचिंग स्टाफ ने खिलाड़ियों को सफर के दौरान शरीर और दिमाग को आराम देने के लिए कुछ व्यावहारिक उपाय अपनाने की सलाह दी। <Cite refs={[“turn0search0″,”turn0search3”]} />
गर्दन को स्थिर रखने के लिए नेक पिलो
राइफल कोच मनोज कुमार ने खिलाड़ियों को नेक पिलो रखने की सलाह दी, ताकि बस के लगातार झटकों और मोड़ों के दौरान गर्दन में अकड़न न आए। शूटिंग में शरीर की स्थिरता और सही मुद्रा का विशेष महत्व होता है। ऐसे में गर्दन में दर्द या जकड़न प्रतियोगिता के दौरान निशानेबाज की एकाग्रता को प्रभावित कर सकती है।
एलावेनिल वलारिवान ने इस सलाह को विशेष रूप से गंभीरता से लिया, क्योंकि उन्हें पहले से गर्दन में दर्द और उससे जुड़ी परेशानियां हैं। उन्होंने बताया कि होटल से प्रतियोगिता स्थल तक का सफर लगभग दो घंटे का था और वह नहीं चाहती थीं कि यात्रा के कारण उनकी गर्दन की समस्या बढ़ जाए।
एलावेनिल ने बस में नेक पिलो का इस्तेमाल किया, ईयरफोन लगाए और खिड़की के बाहर का दृश्य देखते हुए सफर किया। वह हिंदी के मेलोडी गीतों, इंग्लिश रॉक और क्लासिक तमिल संगीत वाली प्लेलिस्ट सुनती रहीं। उनके लिए यह तरीका गर्दन को स्थिर रखने और मानसिक रूप से शांत रहने में मददगार रहा। <Cite refs={[“turn0search0″,”turn0search5”]} />
सोनम मस्कर ने नींद को बनाया सहारा
सोनम मस्कर ने यात्रा के दौरान अलग तरीका अपनाया। उन्होंने बताया कि वह बस में सोना पसंद करती हैं, क्योंकि बाहर देखने पर उन्हें मितली जैसा महसूस होता है। इसलिए सफर के दौरान आराम करना उनके लिए बेहतर विकल्प था।
खिलाड़ियों के लिए प्रतियोगिता से पहले तरोताजा रहना जरूरी होता है। लंबी यात्रा के दौरान अनावश्यक गतिविधियों से बचना, पर्याप्त आराम करना और मोशन सिकनेस को नियंत्रित करना उनकी तैयारी का हिस्सा बन गया।
कोचिंग स्टाफ ने खिलाड़ियों को जरूरत के अनुसार हल्का नाश्ता करने और सफर के दौरान आराम बनाए रखने की सलाह भी दी। <Cite refs={[“turn0search0″,”turn0search4”]} />
फोन स्क्रीन से दूरी क्यों जरूरी थी?
भारतीय शूटिंग टीम के हाई परफॉर्मेंस मैनेजर रोनक पंडित ने खिलाड़ियों को बस में फोन पर वीडियो देखने या गेम खेलने से बचने की सलाह दी। उनका कहना था कि लगातार स्क्रीन देखने और बिना उद्देश्य के स्क्रॉल करने से मानसिक थकान बढ़ सकती है।
पंडित के अनुसार, खिलाड़ियों को प्रतियोगिता स्थल पर शारीरिक और मानसिक रूप से अपनी सर्वश्रेष्ठ स्थिति में पहुंचना चाहिए। बस में मोबाइल स्क्रीन पर लगातार ध्यान केंद्रित करने से मोशन सिकनेस, चक्कर या संज्ञानात्मक थकान की समस्या पैदा हो सकती है। इसलिए खिलाड़ियों को फोन का इस्तेमाल मुख्य रूप से संगीत सुनने तक सीमित रखने के लिए कहा गया।
इस रणनीति का उद्देश्य खिलाड़ियों को प्रतियोगिता से पहले अनावश्यक मानसिक दबाव और थकान से बचाना था। निशानेबाजी में छोटी-सी असावधानी भी प्रदर्शन पर असर डाल सकती है, इसलिए तैयारी के दौरान ऊर्जा और एकाग्रता को बचाए रखना महत्वपूर्ण माना गया। <Cite refs={[“turn0search0″,”turn0search3”]} />
बदलती रोशनी और मौसम भी चुनौती
शूटिंग रेंज तक पहुंचने का सफर ही एकमात्र चुनौती नहीं था। मनोज कुमार ने बताया कि प्रतियोगिता स्थल पर रोशनी में लगातार बदलाव हो रहा था। कभी मौसम बादलों से घिर जाता था, तो कभी तेज रोशनी दिखाई देती थी। हवा की स्थिति में भी बदलाव हो रहा था।
ऐसे वातावरण में निशानेबाजों को अपनी दृष्टि, निशाने की दिशा और साइट एडजस्टमेंट पर ध्यान देना पड़ता है। ऊंचाई में बदलाव का असर सांस लेने की क्षमता से अधिक निशाने और आसपास के वातावरण को समझने पर पड़ सकता है।
कोचिंग टीम ने खिलाड़ियों को प्रतियोगिता से पहले इन परिस्थितियों के बारे में जानकारी दी, ताकि वे मानसिक रूप से तैयार रहें और बदलती रोशनी तथा हवा के अनुसार अपने निशाने को समायोजित कर सकें। <Cite refs={[“turn0search0″,”turn0search3”]} />
रणनीति का मिला परिणाम
भारतीय निशानेबाजों की तैयारी का परिणाम महिलाओं की 10 मीटर एयर राइफल टीम स्पर्धा में दिखाई दिया। एलावेनिल वलारिवान, सोनम मस्कर और विदर्शा विनोद ने चीन के बाद दूसरा स्थान हासिल करते हुए भारत को रजत पदक दिलाया।
इसके बाद एलावेनिल ने व्यक्तिगत 10 मीटर एयर राइफल स्पर्धा में भी रजत पदक जीता। वह स्वर्ण पदक से केवल 0.6 अंक पीछे रहीं। जापान की ताइची हिनाता ने 253.0 अंक के साथ स्वर्ण पदक जीता, जबकि एलावेनिल ने 252.4 अंक हासिल किए। <Cite refs={[“turn0search0″,”turn0news12”]} />
तैयारी में छोटे उपायों का बड़ा महत्व
भारतीय निशानेबाजों का अनुभव दिखाता है कि उच्चस्तरीय खेलों में सफलता केवल प्रशिक्षण और तकनीकी कौशल पर निर्भर नहीं करती। यात्रा, नींद, शरीर की स्थिति, मानसिक एकाग्रता और प्रतियोगिता स्थल के वातावरण के अनुकूल खुद को ढालना भी महत्वपूर्ण होता है।
नेक पिलो का इस्तेमाल, फोन से दूरी, संगीत सुनना और सफर के दौरान सोना जैसे छोटे उपाय खिलाड़ियों को प्रतियोगिता से पहले अपनी ऊर्जा बचाने में मदद कर सकते हैं। भारतीय टीम ने घरेलू प्रशिक्षण के साथ-साथ आयोजन स्थल की व्यावहारिक चुनौतियों के अनुसार खुद को ढालने की क्षमता भी दिखाई।
एशियन गेम्स 2026 में दो रजत पदकों के साथ भारतीय निशानेबाजों की शुरुआत इस बात का उदाहरण बनी कि खेलों में तैयारी का दायरा केवल मैदान या शूटिंग रेंज तक सीमित नहीं होता। प्रतियोगिता स्थल तक पहुंचने का सफर भी प्रदर्शन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है।
