25 सितंबर 2026 (भारत बाणी ब्यूरो)। भारतीय शेयर बाजार में शुक्रवार को शुरुआती तेजी के बाद उतार-चढ़ाव देखने को मिला। कच्चे तेल की ऊंची कीमतों, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी और आईटी शेयरों में बिकवाली ने निवेशकों के रुख को प्रभावित किया। पिछले सत्र में बाजार में तेज गिरावट के बाद शुक्रवार को सेंसेक्स और निफ्टी ने शुरुआती कारोबार में कुछ सुधार दिखाया, लेकिन जल्द ही प्रमुख सूचकांक फिर दबाव में आ गए।
शुक्रवार के शुरुआती कारोबार में 30 शेयरों वाला बीएसई सेंसेक्स करीब 86 अंक चढ़कर 73,672.98 पर पहुंचा, जबकि निफ्टी 50 ने 18.80 अंकों की बढ़त के साथ 23,080.45 का स्तर छुआ। इसके बाद तेजी कायम नहीं रह सकी और सेंसेक्स 73,568.22 तथा निफ्टी 23,049.40 के आसपास कारोबार करते दिखाई दिए।
पिछले सत्र में बाजार में बड़ी गिरावट
इससे एक दिन पहले, गुरुवार को भारतीय बाजार में इस साल के सबसे कमजोर कारोबारी सत्रों में से एक देखने को मिला। सेंसेक्स 1,247.71 अंक यानी 1.67 प्रतिशत गिरकर 73,580.54 पर बंद हुआ। निफ्टी 383.70 अंक यानी 1.64 प्रतिशत टूटकर 23,063.10 पर पहुंच गया।
सभी प्रमुख सेक्टोरल और व्यापक बाजार सूचकांकों में गिरावट दर्ज की गई, जबकि इंडिया VIX, जो बाजार में अपेक्षित अस्थिरता को दर्शाता है, करीब 23 प्रतिशत उछल गया।
गुरुवार की गिरावट को कच्चे तेल की कीमतों में तेजी, वैश्विक बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी, रुपये की कमजोरी और पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष से जुड़ी आर्थिक चिंताओं से जोड़ा गया।
100 डॉलर से ऊपर कच्चा तेल बढ़ा रहा चिंता
ब्रेंट क्रूड की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी हुई है। गुरुवार को ब्रेंट करीब 2 प्रतिशत बढ़कर 106 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया। पश्चिम एशिया में संघर्ष और अमेरिका-ईरान संबंधों को लेकर अनिश्चितता ने तेल बाजार पर दबाव बढ़ाया है।
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में लगातार बढ़ोतरी से देश के आयात बिल, व्यापार संतुलन और महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है। यही वजह है कि तेल की कीमतों में तेजी का असर भारतीय शेयर बाजार में निवेशकों की धारणा पर भी पड़ता है।
ऊंचे तेल दाम परिवहन और उत्पादन लागत को प्रभावित कर सकते हैं। साथ ही, यदि महंगाई का दबाव बढ़ता है तो ब्याज दरों में नरमी की उम्मीदों पर भी असर पड़ सकता है।
अमेरिकी बॉन्ड यील्ड बनी दूसरी बड़ी चुनौती
बाजार की चिंता केवल तेल तक सीमित नहीं है। अमेरिकी 10-वर्षीय ट्रेजरी यील्ड करीब 5.10-5.11 प्रतिशत तक पहुंच गई है। रिपोर्टों के अनुसार, यह स्तर 2007 के बाद सबसे ऊंचे स्तरों में शामिल है।
अमेरिकी बॉन्ड यील्ड बढ़ने से वैश्विक निवेशकों के लिए डॉलर आधारित सुरक्षित परिसंपत्तियां अधिक आकर्षक हो सकती हैं। इसका असर उभरते बाजारों में विदेशी पूंजी प्रवाह पर पड़ सकता है। भारत में भी विदेशी संस्थागत निवेशकों की गतिविधियां बाजार की दिशा के लिए महत्वपूर्ण बनी हुई हैं।
25 सितंबर से पहले के कारोबारी सत्र में विदेशी संस्थागत निवेशकों ने भारतीय शेयरों में 5,027.36 करोड़ रुपये की शुद्ध बिकवाली की, जबकि घरेलू संस्थागत निवेशकों ने करीब 4,301 करोड़ रुपये की खरीदारी की।
आईटी शेयरों पर भी दबाव
शुक्रवार को आईटी शेयरों में बिकवाली का दबाव बाजार की तेजी को सीमित करने वाला एक अन्य कारक रहा। ऊंची अमेरिकी ब्याज दरों और आर्थिक विकास को लेकर चिंताओं का असर उन कंपनियों पर पड़ सकता है जिनका कारोबार अमेरिकी बाजार से काफी जुड़ा हुआ है।
रॉयटर्स के अनुसार, शुक्रवार सुबह आईटी सूचकांक में लगभग 0.7 प्रतिशत की गिरावट थी, जबकि व्यापक बाजार में कुछ क्षेत्रों ने सुधार दर्ज किया। विश्लेषकों ने ऊंचे तेल दाम और वैश्विक बॉन्ड यील्ड को भारतीय शेयरों के लिए प्रमुख जोखिमों में गिना है।
बाजार की नजर अमेरिका-ईरान घटनाक्रम पर
निवेशकों के लिए अमेरिका-ईरान संघर्ष से जुड़ी कूटनीतिक गतिविधियां भी महत्वपूर्ण बनी हुई हैं। यदि संघर्ष कम करने की दिशा में ठोस प्रगति होती है तो तेल कीमतों पर दबाव घट सकता है और बाजार धारणा में सुधार संभव है। इसके विपरीत, तनाव बढ़ने पर तेल की कीमतों और वैश्विक जोखिम से जुड़ी चिंताएं और बढ़ सकती हैं।
इसके अलावा, अमेरिकी मौद्रिक नीति, वैश्विक बॉन्ड यील्ड, रुपये की दिशा और विदेशी निवेशकों की गतिविधियां आने वाले कारोबारी सत्रों में बाजार के प्रमुख संकेतक रहेंगे।
अस्थिरता के बीच निवेशकों की सतर्कता
शुक्रवार की शुरुआती गतिविधियों से स्पष्ट है कि गुरुवार की तेज गिरावट के बाद बाजार में कुछ निचले स्तरों पर खरीदारी हुई, लेकिन व्यापक मैक्रो जोखिमों के कारण तेजी टिक नहीं पाई। ऊंचे तेल दाम, बॉन्ड यील्ड और भू-राजनीतिक अनिश्चितता ने निवेशकों को सतर्क रखा है।
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, निकट अवधि में भारतीय शेयर बाजार की दिशा काफी हद तक कच्चे तेल की कीमतों, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और अमेरिका-ईरान संघर्ष से जुड़े घटनाक्रमों पर निर्भर रह सकती है। हालांकि, किसी एक कारोबारी सत्र के उतार-चढ़ाव को बाजार की दीर्घकालिक दिशा का निश्चित संकेत मानना उचित नहीं होगा।
