25 सितंबर 2026 (भारत बाणी ब्यूरो)। भारतीय धाविका सीमा कुमारी ने एशियाई खेलों में महिलाओं की 10,000 मीटर दौड़ में कांस्य पदक जीतकर देश के एथलेटिक्स अभियान को यादगार शुरुआत दी। लेकिन उनकी उपलब्धि के पीछे छिपी कहानी पदक से भी अधिक भावुक कर देने वाली है। जब सीमा जापान के नागोया में देश के लिए दौड़ रही थीं, तब उनकी 75 वर्षीय मां केसरी देवी को यह तक पता नहीं था कि बेटी भारत में नहीं, बल्कि जापान में है।
सीमा ने अपनी मां को प्रतियोगिता और प्रशिक्षण से जुड़ी जानकारी नहीं दी थी, क्योंकि वह उम्रदराज हैं और बेटी की सुरक्षा को लेकर काफी चिंतित हो जाती हैं। सीमा ने पदक जीतने के बाद बताया कि उनकी मां अब भी यही समझ रही थीं कि वह भारत में हैं। शायद पदक जीतने के बाद उन्हें अपनी बेटी की वास्तविक उपलब्धि और उसके सफर के बारे में पता चला होगा। <Cite refs={[“turn712121search0″,”turn712121search2”]}/>
10,000 मीटर में 16 साल बाद भारत को पदक
सीमा ने महिलाओं की 10,000 मीटर फाइनल दौड़ में 32 मिनट 50.05 सेकंड का समय निकालकर तीसरा स्थान हासिल किया। बहरीन की विनफ्रेड यावी ने 32:39.18 के समय के साथ स्वर्ण पदक जीता, जबकि जापान की नोजोमी तनाका ने 32:41.54 के समय के साथ रजत पदक अपने नाम किया।
सीमा का कांस्य पदक इस स्पर्धा में भारत के लिए 2010 के बाद पहला एशियाई खेल पदक है। इससे पहले भारत की प्रीजा श्रीधरन और कविता राउत ने 2010 के खेलों में क्रमशः स्वर्ण और रजत पदक जीते थे। इस उपलब्धि के साथ सीमा ने भारतीय महिला लंबी दूरी की दौड़ में एक महत्वपूर्ण स्थान हासिल किया। <Cite refs={[“turn712121search1″,”turn712121search7”]}/>
धीमी और रणनीतिक दौड़ में दिखाया धैर्य
10,000 मीटर की फाइनल दौड़ का शुरुआती हिस्सा अपेक्षाकृत धीमा रहा। धाविकाएं लगातार गति बढ़ाने और कम करने की रणनीति अपना रही थीं। इस तरह की दौड़ में केवल तेज गति ही पर्याप्त नहीं होती, बल्कि सही समय पर अपनी ऊर्जा बचाना और अंतिम चरण के लिए ताकत बनाए रखना भी महत्वपूर्ण होता है।
सीमा ने शुरुआत में कुछ लैप तक बढ़त बनाने की कोशिश की, लेकिन जल्द ही उन्हें समझ आ गया कि कोई भी धाविका लगातार नेतृत्व करने की जिम्मेदारी नहीं लेना चाहती। इसके बाद उन्होंने अपनी रणनीति बदली और अग्रणी समूह के साथ बने रहने पर ध्यान दिया।
दौड़ आगे बढ़ने के साथ प्रतिभागियों का समूह छोटा होता गया। लगभग 8,000 मीटर के बाद सीमा पदक की दौड़ में मजबूती से बनी हुई थीं। अंतिम तीन लैप में वह पांचवें स्थान पर थीं, लेकिन उन्होंने दो अन्य धाविकाओं को पीछे छोड़ते हुए पदक की स्थिति हासिल कर ली। <Cite refs={[“turn712121search0″,”turn149087view0”]}/>
अंतिम चरण में स्वर्ण की उम्मीद, लेकिन कांस्य पर संतोष
दौड़ के अंतिम चरण में सीमा को लगा कि वह स्वर्ण पदक की दौड़ में शामिल हो सकती हैं। हालांकि, विनफ्रेड यावी और नोजोमी तनाका ने अंतिम हिस्से में गति बढ़ाई और सीमा से आगे निकल गईं।
सीमा ने दोनों धाविकाओं के साथ बने रहने की पूरी कोशिश की, लेकिन उनकी गति का मुकाबला नहीं कर सकीं। इसके बावजूद उन्होंने अपनी स्थिति बनाए रखी और कांस्य पदक हासिल किया। उनका प्रदर्शन इस बात का उदाहरण रहा कि रणनीतिक समझ, धैर्य और ऊर्जा का सही इस्तेमाल लंबी दूरी की दौड़ में कितना महत्वपूर्ण हो सकता है। <Cite refs={[“turn712121search0″,”turn712121search1”]}/>
पिता ने जूते खरीदने के लिए बेची थी बकरी
सीमा की सफलता के पीछे उनके परिवार के संघर्ष की भी बड़ी भूमिका रही है। हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले के रेटा गांव से आने वाली सीमा छह भाई-बहनों में सबसे छोटी हैं। उनके पिता की 2012 में सांप के काटने से मृत्यु हो गई थी। परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी थी कि खेल के लिए जरूरी जूते खरीदना भी चुनौती हुआ करता था।
सीमा की मां केसरी देवी ने बताया कि उनके पति ने बेटी के लिए दौड़ने के जूते खरीदने के उद्देश्य से एक बकरी बेची थी। बाद में, 2015 में जब सीमा को धर्मशाला में भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) के ट्रायल में शामिल होना था, तब उनके भाइयों ने भी एक और बकरी बेचकर उसके लिए नए जूते खरीदे।
सीमा की मां ने भावुक होकर कहा कि एक समय परिवार के पास जूते खरीदने तक के पैसे नहीं थे, लेकिन आज उनकी बेटी ने जापान में भारत के लिए पदक जीता है। यह उपलब्धि परिवार के लंबे संघर्ष और समर्थन को दर्शाती है। <Cite refs={[“turn149087view0″,”turn712121search4”]}/>
स्कूल से शुरू हुई दौड़ की यात्रा
सीमा की दौड़ने की प्रतिभा को 2010 में उनके स्कूल के शारीरिक शिक्षा शिक्षक हंसराज ने पहचाना था। उनका गांव और स्कूल पहाड़ी क्षेत्र में स्थित हैं, जहां सीमा को प्रतिदिन लंबी दूरी तय करनी पड़ती थी।
बाद में उन्होंने धर्मशाला में कोच केहर सिंह पाटियाल के मार्गदर्शन में औपचारिक प्रशिक्षण शुरू किया। प्रशिक्षण शुरू करने के छह महीने के भीतर उन्होंने रांची में अंडर-16 राष्ट्रीय प्रतियोगिता की 2,000 मीटर दौड़ में स्वर्ण पदक जीता।
इसके बाद सीमा ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में अपनी पहचान बनाई। उन्होंने 2022 के राष्ट्रीय खेलों में 10,000 मीटर में स्वर्ण पदक जीता। 2023 में फेडरेशन कप में 5,000 मीटर और 10,000 मीटर में कांस्य पदक हासिल किए। 2024 में जर्मनी में आयोजित वर्ल्ड यूनिवर्सिटी गेम्स में उन्होंने 5,000 मीटर में रजत पदक जीता। <Cite refs={[“turn149087view0″,”turn712121search11”]}/>
अमेरिका में प्रशिक्षण से मिला फायदा
सीमा पिछले तीन वर्षों से अमेरिका के कोलोराडो स्प्रिंग्स में कोच स्कॉट सिमंस के मार्गदर्शन में प्रशिक्षण ले रही हैं। वहां वह ओलंपिक चैंपियनों के साथ कठिन परिस्थितियों में अभ्यास करती हैं।
सीमा के अनुसार, उनके कोच उन्हें लगातार यह भरोसा दिलाते रहे हैं कि वह एक मजबूत और संघर्ष करने वाली खिलाड़ी हैं। एशियाई खेलों की दौड़ के दौरान उन्होंने इसी विश्वास को अपने प्रदर्शन में उतारने की कोशिश की।
अमेरिका में प्रशिक्षण का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि सीमा को उच्च स्तर के खिलाड़ियों के साथ अभ्यास करने का अवसर मिलता है। इससे उनकी तैयारी और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में प्रतिस्पर्धा करने की मानसिकता को मजबूती मिली है। <Cite refs={[“turn712121search0″,”turn712121search2”]}/>
मां की चिंता के पीछे छिपा स्नेह
सीमा ने अपनी मां को यात्रा की जानकारी नहीं देने का कारण उनकी उम्र और चिंता को बताया। उनकी मां स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों से भी जूझ रही हैं, इसलिए परिवार सीमा की गतिविधियों के बारे में उन्हें सीमित जानकारी देता है।
हालांकि, सीमा की बहन को उनके प्रशिक्षण और प्रतियोगिताओं की पूरी जानकारी रहती है। परिवार के अन्य सदस्यों ने भी उनके खेल करियर को आगे बढ़ाने में सहयोग किया है।
सीमा की सफलता के बाद अब उनकी मां को यह जानकर गर्व होगा कि बेटी ने हजारों किलोमीटर दूर जाकर देश के लिए पदक जीता। इस कहानी में पदक की चमक के साथ एक मां की चिंता, परिवार का त्याग और एक खिलाड़ी की वर्षों की मेहनत भी शामिल है।
आगे की नजर ओलंपिक पर
एशियाई खेलों का कांस्य पदक सीमा के करियर की महत्वपूर्ण उपलब्धि है, लेकिन उनका लक्ष्य इससे आगे का है। अमेरिका में ओलंपिक चैंपियनों के साथ प्रशिक्षण लेने से उन्हें 2028 लॉस एंजिल्स ओलंपिक की तैयारी के लिए प्रेरणा मिलती है।
सीमा का सफर गांव की पगडंडियों से शुरू होकर राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं और अब एशियाई खेलों के पदक मंच तक पहुंचा है। आर्थिक कठिनाइयों, पिता को कम उम्र में खोने और सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने अपनी प्रतिभा को निरंतर मेहनत से निखारा।
नागोया में जीता गया कांस्य पदक केवल एक दौड़ का परिणाम नहीं है। यह उस परिवार की कहानी है जिसने जूतों के लिए बकरी बेची, उस मां की कहानी है जो बेटी की चिंता करती रही और उस खिलाड़ी की कहानी है जिसने लंबी दूरी की दौड़ में भारत को एक महत्वपूर्ण पदक दिलाया।
