30 सितंबर 2026 (भारत बाणी ब्यूरो): भारत की आबादी आने वाले दशकों में एक बड़े जनसांख्यिकीय बदलाव से गुजर सकती है। प्रजनन दर में लगातार गिरावट और आयु संरचना में बदलाव के कारण इस सदी के उत्तरार्ध में भारत में बुजुर्ग आबादी का हिस्सा काफी बढ़ सकता है। Moody’s Ratings ने अपनी वैश्विक जनसांख्यिकी संबंधी रिपोर्ट में कहा है कि भारत की प्रजनन दर अब प्रतिस्थापन स्तर से नीचे आ चुकी है और इसका असर धीरे-धीरे देश की आयु संरचना पर दिखाई देने लगा है।
Moody’s के अनुसार, भारत अभी अपेक्षाकृत युवा आबादी वाला देश है, लेकिन कम होती प्रजनन दर भविष्य में कामकाजी उम्र की आबादी और उपभोक्ताओं की संख्या की वृद्धि को प्रभावित कर सकती है। इससे आर्थिक विकास को बनाए रखने के लिए केवल आबादी की वृद्धि पर निर्भर रहने के बजाय उत्पादकता बढ़ाना अधिक महत्वपूर्ण हो जाएगा।
प्रतिस्थापन स्तर से नीचे पहुंची प्रजनन दर
किसी देश की आबादी को लंबे समय में स्थिर रखने के लिए सामान्य तौर पर करीब 2.1 बच्चों प्रति महिला की प्रजनन दर को प्रतिस्थापन स्तर माना जाता है। Moody’s के मुताबिक वैश्विक प्रजनन दर 1950 में 4.9 बच्चों प्रति महिला थी, जो अब घटकर करीब 2.2 रह गई है। यानी वैश्विक स्तर पर भी प्रजनन दर प्रतिस्थापन स्तर के काफी करीब पहुंच चुकी है।
भारत में भी प्रजनन दर प्रतिस्थापन स्तर से नीचे आ चुकी है। इसका तत्काल अर्थ यह नहीं है कि देश की कुल आबादी अचानक घटने लगेगी। आबादी की आयु संरचना और पहले से मौजूद बड़ी युवा आबादी के कारण जनसंख्या में बदलाव कई दशकों में धीरे-धीरे दिखाई देता है।
हालांकि, कम जन्म दर का दीर्घकालिक असर यह होता है कि नई पीढ़ियों का आकार पहले की तुलना में छोटा होता जाता है। समय के साथ इससे कुल आबादी में बुजुर्गों का अनुपात बढ़ सकता है।
भारत अभी युवा, लेकिन बदलाव शुरू
Moody’s ने कहा है कि भारत की आबादी अभी भी अपेक्षाकृत युवा है, लेकिन इसकी age structure बदलना शुरू हो गई है। यही बदलाव आने वाले दशकों में भारत को तेजी से उम्रदराज आबादी वाले देशों की दिशा में ले जा सकता है।
रिपोर्ट में भारत की तुलना उन देशों से भी की गई है जहां जनसांख्यिकीय बदलाव पहले शुरू हो चुका है। जापान में 65 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों की हिस्सेदारी करीब 30 प्रतिशत है, जबकि चीन भी तेजी से उम्रदराज आबादी की ओर बढ़ रहा है। दक्षिण कोरिया में भी वृद्ध आबादी का अनुपात तेजी से बढ़ा है।
भारत अभी इन देशों की तुलना में अलग चरण में है, लेकिन Moody’s के अनुसार कम प्रजनन दर के कारण देश भी इसी व्यापक वैश्विक बदलाव का हिस्सा बन रहा है।
कामकाजी आबादी पर पड़ सकता है असर
आबादी के उम्रदराज होने का सबसे बड़ा आर्थिक असर working-age population पर पड़ सकता है। यदि युवा आबादी और नए श्रमिकों की संख्या की वृद्धि धीमी होती है, तो लंबे समय में कंपनियों और अर्थव्यवस्था के लिए उपलब्ध श्रमबल का विस्तार सीमित हो सकता है।
Moody’s के मुताबिक कम कामकाजी आबादी देश की productive capacity को प्रभावित कर सकती है। ऐसे में आर्थिक विकास को बनाए रखने के लिए प्रति कर्मचारी अधिक उत्पादन यानी productivity growth महत्वपूर्ण होगी।
भारत के लिए इसका मतलब यह भी हो सकता है कि शिक्षा, कौशल विकास, तकनीक और श्रमबल की भागीदारी बढ़ाने पर ज्यादा ध्यान देना पड़े।
महिलाओं की श्रम भागीदारी और लंबा कार्यजीवन महत्वपूर्ण
Moody’s ने कहा है कि भारत जैसे देशों के पास बदलती जनसांख्यिकी के प्रभाव को कम करने के कुछ अवसर मौजूद हैं। इनमें महिलाओं की श्रमबल में भागीदारी बढ़ाना और लोगों के लंबे समय तक काम करने की क्षमता को बढ़ावा देना शामिल है।
यदि कामकाजी उम्र की आबादी की वृद्धि धीमी होती है, तो श्रम बाजार में अधिक लोगों की भागीदारी आर्थिक गतिविधियों को सहारा दे सकती है। इसके साथ तकनीक और ऑटोमेशन भी कम श्रमिकों के बीच उत्पादन बनाए रखने में भूमिका निभा सकते हैं।
हालांकि, Moody’s ने यह भी रेखांकित किया कि तकनीक कम श्रमिकों की भरपाई करने में मदद कर सकती है, लेकिन कम उपभोक्ताओं की पूरी तरह भरपाई नहीं कर सकती। यानी जनसांख्यिकीय बदलाव का असर केवल उत्पादन पर नहीं, बल्कि मांग और उपभोग पर भी पड़ सकता है।
उपभोक्ता मांग में भी बदलाव की संभावना
कम जन्म दर और बढ़ती उम्र की आबादी से भविष्य में परिवारों और उपभोक्ताओं की संख्या की वृद्धि भी धीमी हो सकती है। Moody’s के अनुसार, इससे कुछ क्षेत्रों में उपभोक्ता मांग पर दबाव पड़ सकता है।
हालांकि, इसका अर्थ सभी क्षेत्रों में मांग में एक समान गिरावट नहीं होगा। उम्रदराज आबादी के बढ़ने के साथ स्वास्थ्य सेवाओं, वरिष्ठ नागरिकों की देखभाल, बीमा, पेंशन और अन्य आयु-विशिष्ट सेवाओं की मांग बढ़ सकती है।
इस तरह जनसांख्यिकीय बदलाव अर्थव्यवस्था में मांग के स्वरूप को भी बदल सकता है।
भारत को उत्पादकता पर देना होगा ज्यादा जोर
Moody’s के अनुसार, दुनिया के देशों को भविष्य में आर्थिक विकास बनाए रखने के लिए जनसंख्या वृद्धि की तुलना में productivity gains पर ज्यादा निर्भर होना पड़ेगा। करीब 70 प्रतिशत से अधिक वैश्विक आबादी अब ऐसे देशों में रहती है जहां प्रजनन दर प्रतिस्थापन स्तर पर या उससे नीचे है।
भारत के लिए यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि देश की आर्थिक वृद्धि में बड़ी युवा आबादी और बढ़ता श्रमबल लंबे समय से महत्वपूर्ण कारक रहे हैं। आने वाले दशकों में इस demographic tailwind के कमजोर होने पर आर्थिक विकास के लिए बेहतर कौशल, तकनीकी प्रगति, पूंजी निवेश और श्रम उत्पादकता का महत्व बढ़ेगा।
तेजी से उम्रदराज हो सकता है भारत
Moody’s के विश्लेषण के मुताबिक भारत का वृद्धावस्था की ओर संक्रमण कई विकसित अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में अपेक्षाकृत तेजी से हो सकता है। Moneycontrol की रिपोर्ट के अनुसार, Moody’s का अनुमान है कि भारत को उस स्थिति से, जहां 65 वर्ष या उससे अधिक उम्र की आबादी 14 प्रतिशत हो, 21 प्रतिशत यानी “super-aged” आबादी तक पहुंचने में करीब 16 वर्ष लग सकते हैं। तुलना में जर्मनी के लिए यह अवधि करीब 43 वर्ष और फ्रांस के लिए 30 वर्ष बताई गई है।
यह बदलाव भारत के लिए स्वास्थ्य व्यवस्था, पेंशन, सामाजिक सुरक्षा और शहरी बुनियादी ढांचे की भविष्य की जरूरतों पर भी असर डाल सकता है।
जनसांख्यिकीय बदलाव के लिए अभी से तैयारी जरूरी
भारत के सामने आने वाली चुनौती केवल बुजुर्गों की बढ़ती संख्या नहीं होगी, बल्कि बदलती उम्र संरचना के अनुरूप आर्थिक और सामाजिक संस्थाओं को ढालना भी होगी।
स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार, वृद्धजन देखभाल, पेंशन और सामाजिक सुरक्षा, कौशल विकास, महिलाओं की रोजगार भागीदारी और तकनीकी उत्पादकता जैसे क्षेत्र आने वाले वर्षों में अधिक महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
Moody’s का आकलन एक दीर्घकालिक जनसांख्यिकीय रुझान को रेखांकित करता है। भारत अभी युवा आबादी वाले देशों में है, लेकिन घटती प्रजनन दर ने भविष्य की उम्र संरचना में बदलाव की दिशा तय करना शुरू कर दिया है। इस बदलाव के बीच देश के लिए आर्थिक विकास को बनाए रखने में उत्पादकता और श्रमबल की प्रभावी भागीदारी की भूमिका और बढ़ सकती है।
