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22 अक्टूबर 2026 (भारत बानी ब्यूरो) :अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने भारत को रुपये की विनिमय दर में अधिक लचीलापन अपनाने की सलाह दी है। IMF का कहना है कि वैश्विक आर्थिक झटकों के दौरान मुद्रा विनिमय दर को परिस्थितियों के अनुसार समायोजित होने देना चाहिए, ताकि वह अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले बाहरी दबाव को कम करने में मदद कर सके। यह सुझाव ऐसे समय आया है, जब भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और विदेशी निवेशकों की लगातार निकासी के बीच रुपये को सहारा देने के लिए कदम उठा रहा है।

IMF के एशिया और प्रशांत विभाग के निदेशक कृष्णा श्रीनिवासन ने बुधवार को मुंबई में मीडिया से बातचीत के दौरान कहा कि वैश्विक झटकों के बीच विनिमय दर को दबाव सहने देना चाहिए। उनके मुताबिक, जिन देशों में विनिमय दर को बाजार की परिस्थितियों के अनुसार बदलने दिया जाता है, उन्हें ऐसे हालात में अपेक्षाकृत अधिक लाभ मिलता है।

IMF ने रुपये को ‘पहली सुरक्षा पंक्ति’ बनाने की दी सलाह

श्रीनिवासन ने कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में विनिमय दर को बाहरी आर्थिक झटकों के प्रभाव को समायोजित करने वाली पहली सुरक्षा पंक्ति के रूप में काम करना चाहिए। उन्होंने भारत को भी रुपये-डॉलर विनिमय दर में उतार-चढ़ाव की अनुमति देने की सलाह दी।

IMF का तर्क है कि जब कच्चे तेल जैसी महत्वपूर्ण वस्तुओं की कीमतें बढ़ती हैं या विदेशी पूंजी का प्रवाह प्रभावित होता है, तो मुद्रा बाजार पर दबाव स्वाभाविक रूप से बढ़ सकता है। ऐसी स्थिति में केंद्रीय बैंक के लगातार हस्तक्षेप से रुपये को कुछ समय के लिए राहत मिल सकती है, लेकिन इससे बाहरी दबाव पूरी तरह खत्म नहीं होता।

हालांकि, विनिमय दर में लचीलापन अपनाने का अर्थ यह नहीं है कि केंद्रीय बैंक बाजार से पूरी तरह दूर हो जाए। RBI का घोषित दृष्टिकोण अत्यधिक उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करना और विदेशी मुद्रा बाजार में व्यवस्थित कारोबार बनाए रखना है।

रुपये को सहारा देने के लिए RBI के कदम

रुपये पर बढ़ते दबाव के बीच RBI ने विदेशी मुद्रा बाजार में कई उपाय किए हैं। इनमें अपने विदेशी मुद्रा भंडार से डॉलर की बिक्री, सरकारी तेल कंपनियों की डॉलर संबंधी जरूरतों के लिए विशेष व्यवस्था और कुछ विदेशी मुद्रा लेनदेन पर बैंकों के लिए अतिरिक्त नकदी आरक्षित रखने की शर्त शामिल है।

इन कदमों का उद्देश्य डॉलर की तत्काल मांग को कम करना और रुपये में अत्यधिक गिरावट को रोकना है। रिपोर्टों के अनुसार, अक्टूबर की शुरुआत में रुपये के रिकॉर्ड निचले स्तर के करीब पहुंचने के बाद केंद्रीय बैंक के कदमों से इसमें लगभग दो प्रतिशत की रिकवरी आई। <Cite refs={[“turn447573news17″,”turn447573search1”]}/>

RBI ने ब्याज दरों के मोर्चे पर भी कदम उठाया है। हाल में की गई बढ़ोतरी का उद्देश्य महंगाई के जोखिम और मुद्रा पर पड़ने वाले दबाव को ध्यान में रखते हुए आर्थिक स्थिरता बनाए रखना है। हालांकि, ब्याज दरों में ज्यादा वृद्धि से कर्ज महंगा होने और आर्थिक गतिविधियों पर असर पड़ने की आशंका भी रहती है।

महंगा कच्चा तेल भारत के लिए बड़ी चुनौती

भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो देश को तेल खरीदने के लिए अधिक डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। इससे डॉलर की मांग बढ़ सकती है और रुपये पर दबाव पड़ सकता है।

कमजोर रुपये का असर आयातित तेल, गैस और अन्य वस्तुओं की लागत पर पड़ सकता है। यदि महंगे आयात का दबाव लंबे समय तक बना रहता है, तो परिवहन, उत्पादन और माल ढुलाई की लागत बढ़ सकती है। इसका प्रभाव अंततः वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों पर भी पड़ने की आशंका रहती है।

तेल की कीमतों और रुपये की विनिमय दर का संयुक्त प्रभाव सरकार तथा RBI दोनों के लिए चुनौती बन सकता है। सरकार को ऊर्जा आपूर्ति और घरेलू कीमतों के बीच संतुलन बनाना होता है, जबकि केंद्रीय बैंक को महंगाई और वित्तीय स्थिरता पर नजर रखनी पड़ती है।

विदेशी निवेश की निकासी से बढ़ी डॉलर की मांग

रुपये पर दबाव का एक अन्य कारण भारतीय शेयर बाजार से विदेशी निवेशकों की निकासी है। जब विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बेचकर अपनी पूंजी वापस ले जाते हैं, तो उन्हें रुपये को डॉलर में बदलने की जरूरत पड़ सकती है। इससे विदेशी मुद्रा बाजार में डॉलर की मांग बढ़ती है।

विदेशी पूंजी का प्रवाह वैश्विक ब्याज दरों, निवेशकों के जोखिम लेने के रुझान और भारत की आर्थिक संभावनाओं सहित कई कारकों पर निर्भर करता है। ऐसे में रुपये को स्थिर रखने के लिए केवल केंद्रीय बैंक की डॉलर बिक्री पर निर्भर रहना दीर्घकाल में महंगा पड़ सकता है।

IMF ने विदेशी पूंजी आकर्षित करने के लिए भारत की ओर से उठाए गए कुछ अन्य कदमों को सकारात्मक बताया है। इनमें सरकारी ऋण प्रतिभूतियों में विदेशी निवेश से संबंधित कर व्यवस्था में बदलाव और विदेशों में रहने वाले भारतीयों से डॉलर जमा आकर्षित करने की पहल शामिल है। IMF के भारत, भूटान और मालदीव के वरिष्ठ प्रतिनिधि रानिल सालगाडो ने कहा कि विदेशी पूंजी प्रवाह को प्रोत्साहित करने वाले ऐसे उपाय मददगार हो सकते हैं।

रुपये में लचीलापन बनाम स्थिरता

मुद्रा विनिमय दर को बाजार के अनुसार बदलने देने से अर्थव्यवस्था बाहरी झटकों के प्रभाव को कुछ हद तक अपने भीतर समायोजित कर सकती है। लेकिन रुपये में तेज गिरावट होने पर आयात महंगा होने, महंगाई बढ़ने और विदेशी मुद्रा में कर्ज लेने वाली कंपनियों की लागत बढ़ने का जोखिम भी रहता है।

दूसरी ओर, विनिमय दर को एक निश्चित स्तर के आसपास बनाए रखने के लिए लगातार हस्तक्षेप करने से विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव पड़ सकता है। इसलिए नीति निर्माताओं के सामने चुनौती यह है कि वे अत्यधिक अस्थिरता को रोकें, लेकिन बाजार को वास्तविक आर्थिक परिस्थितियों के अनुरूप समायोजन करने की गुंजाइश भी दें।

आगे क्या रहेगा महत्वपूर्ण?

आने वाले समय में रुपये की दिशा अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों, विदेशी निवेशकों के व्यवहार, डॉलर की वैश्विक मांग और RBI की नीतियों पर निर्भर करेगी। यदि तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं और विदेशी पूंजी की निकासी जारी रहती है, तो रुपये पर दबाव बना रह सकता है।

IMF की सलाह ने इस बहस को फिर सामने ला दिया है कि मुद्रा को स्थिर रखने के लिए केंद्रीय बैंक को कितना हस्तक्षेप करना चाहिए। भारत के लिए चुनौती केवल रुपये की गिरावट रोकना नहीं, बल्कि महंगाई, आर्थिक विकास और विदेशी निवेश के बीच संतुलन बनाए रखना भी है।

Bharat Baani Bureau

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