21 अप्रैल 2026 (भारत बानी ब्यूरो ) : हाल के वर्षों में एक दिलचस्प लेकिन महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिला है—कई लोग अपनी 20s, 30s या उससे भी बाद की उम्र में यह पता लगा रहे हैं कि उन्हें Autism Spectrum Disorder (ASD) है। यह सवाल उठता है कि आखिर बचपन में पहचान क्यों नहीं हो पाती और लोग इतने देर से डायग्नोसिस तक क्यों पहुंचते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, इसका सबसे बड़ा कारण है “मास्किंग” या “कैमोफ्लाजिंग”। कई लोग बचपन से ही अपने व्यवहार को छिपाना सीख लेते हैं—जैसे जबरन आंखों में देखना, सामाजिक स्क्रिप्ट याद करना या दूसरों की नकल करना। इससे बाहर से वे “नॉर्मल” दिखते हैं, लेकिन अंदर से लगातार संघर्ष करते रहते हैं।
दूसरी बड़ी वजह है गलत या अधूरी पहचान। ऑटिज़्म के लक्षण अक्सर anxiety, depression, ADHD या OCD जैसे अन्य मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से मिलते-जुलते होते हैं। ऐसे में कई लोगों को सालों तक इन स्थितियों का इलाज मिलता रहता है, लेकिन असली कारण—ऑटिज़्म—पहचाना नहीं जाता।
तीसरा कारण है जागरूकता की कमी, खासकर पुराने समय में। आज से 20–30 साल पहले ऑटिज़्म को मुख्य रूप से बच्चों और गंभीर मामलों से जोड़ा जाता था। हल्के या “हाई-फंक्शनिंग” मामलों को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता था। अब जब समझ और डायग्नोस्टिक क्राइटेरिया व्यापक हुए हैं, तो अधिक लोग पहचान में आ रहे हैं।
महिलाओं के मामले में यह समस्या और गंभीर रही है। रिसर्च बताती है कि महिलाओं में ऑटिज़्म अक्सर अलग तरीके से प्रकट होता है—वे बेहतर तरीके से सामाजिक व्यवहार सीख लेती हैं, जिससे उनके लक्षण छिप जाते हैं। इसी वजह से उन्हें पुरुषों की तुलना में देर से डायग्नोसिस मिलता है।
कई मामलों में जीवन की परिस्थितियां भी भूमिका निभाती हैं। बचपन में परिवार या स्कूल सपोर्ट सिस्टम होने के कारण व्यक्ति किसी तरह मैनेज कर लेता है। लेकिन जैसे-जैसे जिम्मेदारियां बढ़ती हैं—जॉब, रिश्ते, परिवार—तब चुनौतियां बढ़ जाती हैं और समस्याएं स्पष्ट होने लगती हैं।
दिलचस्प रूप से, कई वयस्कों को तब पता चलता है जब उनके बच्चे का ऑटिज़्म डायग्नोसिस होता है। बच्चे के लक्षणों को समझते हुए वे खुद में भी वही पैटर्न पहचानते हैं और फिर अपनी जांच करवाते हैं।
सोशल मीडिया और इंटरनेट ने भी इस ट्रेंड को बढ़ाया है। लोग अब ऑटिज़्म के बारे में ज्यादा पढ़ते और समझते हैं, जिससे वे अपने अनुभवों को जोड़ पाते हैं। हालांकि विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि सेल्फ-डायग्नोसिस की बजाय प्रोफेशनल मूल्यांकन जरूरी है।
देरी से डायग्नोसिस का असर गहरा हो सकता है। कई लोग सालों तक यह महसूस करते हैं कि वे “अलग” हैं, लेकिन कारण समझ नहीं पाते। इससे आत्मविश्वास में कमी, सामाजिक चिंता और मानसिक थकान (burnout) जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं।
हालांकि, देर से पहचान हमेशा नकारात्मक नहीं होती। कई लोगों के लिए यह “लाइफ-चेंजिंग” अनुभव होता है। उन्हें अपने जीवन के अनुभवों को समझने का नया नजरिया मिलता है और वे खुद को बेहतर तरीके से स्वीकार कर पाते हैं।
डायग्नोसिस के बाद लोगों को सपोर्ट, थेरेपी और वर्कप्लेस में जरूरी सुविधाएं मिल सकती हैं, जो पहले उपलब्ध नहीं थीं। इससे उनकी जीवन गुणवत्ता में सुधार हो सकता है।
कुल मिलाकर, 30 की उम्र में ऑटिज़्म की पहचान होना यह नहीं दिखाता कि समस्या नई है, बल्कि यह दर्शाता है कि पहचान और समझ अब बेहतर हो रही है।
सारांश:
कई लोग 30 के बाद ऑटिज़्म पहचान रहे हैं क्योंकि मास्किंग, गलत डायग्नोसिस और कम जागरूकता के कारण बचपन में पहचान नहीं हो पाती, लेकिन देर से पहचान भी राहत देती है।
