14 सितंबर 2026 (भारत बानी ब्यूरो): भारत में सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवा का लक्ष्य केवल अधिक अस्पताल बनाने, अत्याधुनिक तकनीक उपलब्ध कराने या स्वास्थ्य बीमा का विस्तार करने से हासिल नहीं किया जा सकता। देश को ऐसा जन-केंद्रित स्वास्थ्य मॉडल विकसित करने की जरूरत है, जिसमें व्यक्ति, परिवार और स्थानीय समुदाय अपने स्वास्थ्य की देखभाल में सक्रिय भागीदार बनें। यह बात Society for Education, Action and Research in Community Health (SEARCH) के चेयरमैन डॉ. अभय बंग ने ETHealthWorld Healthcare Leaders Summit के छठे संस्करण में कही।
डॉ. बंग ने कहा कि भारत जैसे विशाल और विविध देश में स्वास्थ्य सेवाओं को केवल अस्पतालों तक सीमित रखना व्यावहारिक नहीं है। देश की बड़ी आबादी गांवों, छोटे कस्बों, दूरदराज के इलाकों और शहरी बस्तियों में रहती है, जहां विशेषज्ञ चिकित्सा सुविधाओं तक पहुंच हर व्यक्ति के लिए आसान नहीं है। ऐसे में स्वास्थ्य व्यवस्था की प्राथमिकता लोगों तक सेवाएं पहुंचाने और उन्हें अपने स्वास्थ्य के प्रति सक्षम बनाने की होनी चाहिए।
अस्पताल तक पहुंचने वालों से आगे सोचने की जरूरत
डॉ. बंग ने स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने एक बुनियादी सवाल रखा—क्या स्वास्थ्य प्रणाली की जिम्मेदारी केवल उन मरीजों तक सीमित होनी चाहिए जो अस्पताल या स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंच जाते हैं, या उन लोगों तक भी होनी चाहिए जो किसी कारणवश वहां पहुंच ही नहीं पाते?
इसी सोच के आधार पर SEARCH ने महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जैसे दूरदराज के क्षेत्रों में समुदाय आधारित स्वास्थ्य मॉडल विकसित किए। इनमें स्थानीय महिलाओं को प्रशिक्षण देकर नवजात शिशुओं की शुरुआती देखभाल, बीमारी के संकेतों की पहचान और आवश्यक स्वास्थ्य सेवाएं गांव के स्तर पर उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गई।
इस तरह के मॉडल का उद्देश्य अस्पतालों की भूमिका को खत्म करना नहीं, बल्कि अस्पतालों पर अनावश्यक निर्भरता कम करना है। गंभीर और जटिल मामलों में अस्पताल महत्वपूर्ण रहेंगे, लेकिन प्राथमिक रोकथाम, शुरुआती पहचान और सामान्य स्वास्थ्य जरूरतों को समुदाय के करीब लाना जरूरी होगा।
सार्वभौमिक स्वास्थ्य के लिए समुदाय को सक्षम बनाना जरूरी
डॉ. बंग ने भारत को महंगे और अत्यधिक अस्पताल-केंद्रित पश्चिमी स्वास्थ्य मॉडल की नकल करने से बचने की सलाह दी। उनका तर्क है कि केवल महंगे अस्पताल और अत्याधुनिक तकनीक देश की पूरी आबादी तक समान स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं पहुंचा सकते।
इसके बजाय लोगों को स्वास्थ्य संबंधी जानकारी, शुरुआती जांच, रोकथाम और स्थानीय स्तर पर आवश्यक देखभाल के लिए प्रशिक्षित एवं सक्षम बनाना होगा। उनके अनुसार, सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवा तभी संभव है जब व्यक्ति, परिवार और गांव अपने स्वास्थ्य की जिम्मेदारी निभाने में सक्षम हों।
भारत में यह दृष्टिकोण विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि देश को संक्रामक बीमारियों के साथ-साथ मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग और कैंसर जैसी गैर-संचारी बीमारियों के बढ़ते बोझ का भी सामना करना पड़ रहा है।
प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना जरूरी
विश्व स्वास्थ्य संगठन भी प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा को स्वास्थ्य प्रणाली का पहला और महत्वपूर्ण संपर्क बिंदु मानता है। इसके तहत केवल बीमारी का इलाज नहीं, बल्कि बीमारी की रोकथाम, स्वास्थ्य संवर्धन, पुनर्वास और समुदाय को अपने स्वास्थ्य के प्रति सक्षम बनाना शामिल है।
भारत में आयुष्मान आरोग्य मंदिर इसी दिशा में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को समुदाय के करीब लाने का प्रयास हैं। सरकार के अनुसार, नवंबर 2025 तक 1.81 लाख से अधिक आयुष्मान आरोग्य मंदिर संचालित हो चुके थे, जहां गैर-संचारी रोगों की स्क्रीनिंग, आवश्यक दवाएं, जांच, टेली-कंसल्टेशन और अन्य प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं।
स्वास्थ्यकर्मियों की भूमिका भी होगी अहम
जन-केंद्रित मॉडल की सफलता के लिए डॉक्टरों और अस्पतालों के साथ-साथ फ्रंटलाइन स्वास्थ्यकर्मियों की क्षमता बढ़ाना महत्वपूर्ण होगा। भारत में आशा कार्यकर्ता, एएनएम, कम्युनिटी हेल्थ ऑफिसर और प्राथमिक स्वास्थ्य टीम लोगों और स्वास्थ्य प्रणाली के बीच महत्वपूर्ण कड़ी हैं।
केंद्र सरकार ने 2026 में प्राथमिक स्वास्थ्य टीमों के लिए एकीकृत प्रशिक्षण व्यवस्था शुरू की है, जिसका उद्देश्य तकनीकी दक्षता के साथ व्यवहारिक कौशल, सहानुभूति और प्रभावी संवाद को मजबूत करना है। इसका लक्ष्य लोगों को उनके घर और समुदाय के करीब बेहतर तथा अधिक मानवीय स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना है।
डिजिटल तकनीक बनेगी सहायक, विकल्प नहीं
जन-केंद्रित स्वास्थ्य मॉडल में डिजिटल स्वास्थ्य और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। टेलीमेडिसिन, डिजिटल स्वास्थ्य रिकॉर्ड, दूरस्थ निगरानी और एआई आधारित जांच तकनीक विशेषज्ञ सेवाओं को उन क्षेत्रों तक पहुंचाने में मदद कर सकती हैं जहां डॉक्टरों और अस्पतालों की उपलब्धता सीमित है।
हालांकि, तकनीक का उद्देश्य मरीज को प्रणाली से और अधिक जोड़ना होना चाहिए, न कि उसे तकनीक पर निर्भर बनाना। 2026 में केंद्र सरकार ने स्वास्थ्य क्षेत्र में जिम्मेदार और जन-केंद्रित एआई के लिए SAHI और BODH जैसी पहल भी शुरू की हैं।
नागरिकों की भागीदारी से बदलेगी स्वास्थ्य व्यवस्था
भारत में स्वास्थ्य व्यवस्था को अधिक नागरिक-केंद्रित बनाने की जरूरत पर Lancet Commission on a Citizen-Centred Health System for India ने भी जोर दिया है। आयोग ने नागरिक भागीदारी, मजबूत सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं, बेहतर वित्तपोषण, निजी क्षेत्र के बेहतर नियमन, डिजिटल तकनीक और जवाबदेह शासन को स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार के प्रमुख क्षेत्रों के रूप में रेखांकित किया है।
आखिरकार, भारत के लिए स्वास्थ्य का भविष्य केवल बड़े अस्पतालों और महंगी मशीनों में नहीं, बल्कि मजबूत प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं, प्रशिक्षित स्थानीय स्वास्थ्यकर्मियों और जागरूक एवं सक्षम समुदायों में भी है।
डॉ. बंग का संदेश इसी बदलाव की ओर संकेत करता है—स्वास्थ्य सेवा ऐसी होनी चाहिए जो लोगों को केवल इलाज उपलब्ध न कराए, बल्कि उन्हें स्वस्थ रहने और अपने स्वास्थ्य संबंधी फैसले लेने में अधिक सक्षम बनाए। यही दृष्टिकोण भारत में अधिक समान, सुलभ और टिकाऊ स्वास्थ्य व्यवस्था की नींव बन सकता है।
