ईरान को लेकर जारी युद्ध ने उभरती अर्थव्यवस्थाओं के समूह ब्रिक्स (BRICS) के भीतर मौजूद रणनीतिक मतभेदों को उजागर कर दिया है। एक ऐसा समूह जो वैश्विक दक्षिण की एकजुट आवाज, पश्चिमी वर्चस्व के विकल्प और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की पैरवी करता रहा है, पश्चिम एशिया के संकट के बीच उसके सदस्य देशों के हितों और प्राथमिकताओं में अंतर साफ दिखाई देने लगा है।
ईरान युद्ध ने ब्रिक्स के सामने सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा किया है कि क्या आर्थिक और कूटनीतिक हितों के आधार पर साथ आए देशों का यह समूह किसी बड़े भू-राजनीतिक संकट के दौरान साझा रणनीति बना सकता है। सदस्य देशों की अलग-अलग विदेश नीति, अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ उनके संबंध तथा ऊर्जा और व्यापार से जुड़े हित इस एकता के रास्ते में बड़ी चुनौती बनकर उभरे हैं।
ईरान को लेकर अलग-अलग रुख
ईरान के मुद्दे पर ब्रिक्स के प्रमुख देशों की प्राथमिकताएं एक जैसी नहीं हैं। कुछ सदस्य देश ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की कड़ी आलोचना करते हैं, जबकि कुछ अन्य देश सीधे टकराव से बचते हुए संतुलित कूटनीतिक रुख अपनाना चाहते हैं।
यही अंतर ब्रिक्स की सामूहिक प्रतिक्रिया को सीमित करता है। समूह के लिए एक ओर अंतरराष्ट्रीय कानून, संप्रभुता और गैर-हस्तक्षेप जैसे सिद्धांत महत्वपूर्ण हैं, वहीं दूसरी ओर उसके सदस्य देशों के अपने रणनीतिक और आर्थिक हित हैं।
ईरान के साथ रूस और चीन के संबंध लंबे समय से रणनीतिक महत्व रखते हैं। वहीं भारत के लिए पश्चिम एशिया में स्थिरता, ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार मार्ग और खाड़ी क्षेत्र में रहने वाले भारतीयों के हित महत्वपूर्ण हैं। इस कारण नई दिल्ली का दृष्टिकोण कई बार अन्य ब्रिक्स सदस्यों से अलग दिखाई दे सकता है।
रूस-चीन के लिए ईरान का रणनीतिक महत्व
ईरान रूस और चीन दोनों के लिए महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार है। रूस और ईरान के बीच रक्षा, ऊर्जा और क्षेत्रीय सहयोग बढ़ा है, जबकि चीन ईरान के साथ ऊर्जा और व्यापार संबंधों को मजबूत करता रहा है।
ईरान पर किसी बड़े सैन्य संघर्ष का विस्तार इन दोनों देशों के रणनीतिक हितों को प्रभावित कर सकता है। इसके बावजूद रूस और चीन की प्रतिक्रिया और प्राथमिकताएं भी पूरी तरह समान नहीं मानी जा सकतीं।
मॉस्को के लिए पश्चिम एशिया में शक्ति संतुलन और पश्चिमी दबाव का विरोध महत्वपूर्ण है, जबकि बीजिंग क्षेत्रीय स्थिरता और ऊर्जा आपूर्ति की निरंतरता को प्राथमिकता देता है।
भारत की चुनौती
ईरान संकट भारत के लिए विशेष रूप से जटिल कूटनीतिक स्थिति पैदा करता है। भारत के ईरान के साथ ऐतिहासिक संबंध हैं और चाबहार बंदरगाह जैसे प्रोजेक्ट भारत की रणनीतिक कनेक्टिविटी के लिए महत्वपूर्ण हैं। दूसरी ओर भारत अमेरिका और यूरोप के साथ अपने आर्थिक, रक्षा और तकनीकी संबंधों को भी तेजी से मजबूत कर रहा है।
इसलिए नई दिल्ली को ईरान संकट पर ऐसा रुख अपनाना पड़ता है जिसमें क्षेत्रीय स्थिरता, भारतीय नागरिकों की सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति और अपने व्यापक विदेश नीति हितों के बीच संतुलन बना रहे।
ब्रिक्स विस्तार ने बढ़ाई जटिलता
ब्रिक्स का विस्तार होने के बाद समूह में देशों की संख्या और भौगोलिक पहुंच दोनों बढ़ी हैं। इससे संगठन का आर्थिक और राजनीतिक महत्व तो बढ़ा है, लेकिन सभी सदस्यों के हितों को एक साझा नीति में समेटना भी अधिक मुश्किल हो गया है।
सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और ईरान जैसे पश्चिम एशियाई देशों का समूह से जुड़ना ब्रिक्स को क्षेत्रीय राजनीति में अधिक प्रभावशाली बनाता है, लेकिन इनके आपसी और पश्चिमी शक्तियों के साथ संबंधों की जटिलता समूह के लिए चुनौती भी पैदा करती है।
क्या ब्रिक्स राजनीतिक गठबंधन है?
ईरान युद्ध ने यह सवाल भी फिर से खड़ा किया है कि ब्रिक्स वास्तव में किस तरह का संगठन है। ब्रिक्स कोई पारंपरिक सैन्य गठबंधन या औपचारिक राजनीतिक संघ नहीं है। इसका मुख्य आधार आर्थिक सहयोग, विकास, व्यापार और वैश्विक संस्थानों में सुधार की मांग है।
इसी वजह से सदस्य देशों से किसी भी अंतरराष्ट्रीय संकट पर नाटो जैसे सामूहिक और बाध्यकारी रुख की उम्मीद करना व्यावहारिक नहीं है। अलग-अलग देशों की विदेश नीति और राष्ट्रीय हितों के कारण ब्रिक्स के भीतर मतभेद बने रहना स्वाभाविक है।
फिर भी ईरान संकट ने समूह की उस राजनीतिक महत्वाकांक्षा को चुनौती दी है जिसमें वह वैश्विक दक्षिण की एक मजबूत और सामूहिक आवाज बनने की कोशिश करता रहा है।
आगे की राह चुनौतीपूर्ण
ईरान युद्ध से पैदा हुई परिस्थितियां ब्रिक्स के लिए एक परीक्षा की तरह हैं। यदि सदस्य देश युद्धविराम, कूटनीतिक समाधान और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे मुद्दों पर न्यूनतम साझा सहमति विकसित कर पाते हैं, तो समूह की राजनीतिक प्रासंगिकता मजबूत हो सकती है।
लेकिन यदि राष्ट्रीय हितों और आपसी मतभेदों के कारण समूह किसी साझा रुख तक नहीं पहुंच पाता, तो उसके भीतर की सीमाएं और स्पष्ट हो सकती हैं।
फिलहाल ईरान संकट ने यह जरूर दिखा दिया है कि ब्रिक्स आर्थिक सहयोग का प्रभावशाली मंच तो है, लेकिन बड़े भू-राजनीतिक संकटों पर एकजुट राजनीतिक शक्ति के रूप में उसकी क्षमता अभी भी सीमित है। आने वाले समय में पश्चिम एशिया की स्थिति और ब्रिक्स देशों की प्रतिक्रियाएं यह तय करेंगी कि यह समूह वैश्विक दक्षिण की एक साझा आवाज बनने की दिशा में कितना आगे बढ़ पाता है।
