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16 सितंबर 2026 (भारत बानी ब्यूरो)। सुबह उठकर तबीयत खराब महसूस हो और सामने ऑफिस का कोई जरूरी काम, मीटिंग या डेडलाइन हो, तो कई कर्मचारियों के मन में पहला सवाल यही आता है—क्या आज छुट्टी लेनी चाहिए? कई बार जवाब ‘हां’ होने के बावजूद कर्मचारी काम पर जाने या घर से लॉग-इन करने का फैसला करते हैं। विशेषज्ञ इसे सिकनेस प्रेजेंटिज्म (Sickness Presenteeism) यानी बीमार होने के बावजूद काम करने की प्रवृत्ति कहते हैं।

15 सितंबर 2026 को प्रकाशित एक नई रिपोर्ट में बताया गया कि ब्रिटेन में करीब एक-तिहाई से आधे लोग बीमारी की स्थिति में भी काम करते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, इसके पीछे केवल नौकरी की जिम्मेदारी नहीं बल्कि अपराधबोध, सहकर्मियों पर अतिरिक्त बोझ पड़ने की चिंता और कार्यस्थल की संस्कृति भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

बीमार होने पर भी छुट्टी लेने में क्यों लगता है अपराधबोध?

काम से छुट्टी लेने पर अपराधबोध कई कारणों से पैदा हो सकता है। सबसे आम वजह यह होती है कि कर्मचारी को लगता है कि उसकी गैरमौजूदगी से टीम के दूसरे सदस्यों पर अतिरिक्त काम आ जाएगा।

एक व्यवस्थित समीक्षा में पाया गया कि कई कर्मचारी बीमारी के बावजूद इसलिए काम करते रहते हैं क्योंकि वे सहकर्मियों पर अतिरिक्त काम का बोझ नहीं डालना चाहते। कुछ कर्मचारियों को यह भी डर रहता है कि सहकर्मी उन्हें कमजोर, गैर-जिम्मेदार या कम प्रतिबद्ध समझ सकते हैं।

2024 में 2,000 ब्रिटिश कर्मचारियों पर किए गए एक सर्वेक्षण में 26 प्रतिशत कर्मचारियों ने कहा कि यदि वे बीमारी के कारण छुट्टी लेते हैं तो उन्हें इस बात का अपराधबोध होता है कि उनके सहकर्मियों को उनका काम संभालना पड़ेगा। इसी सर्वेक्षण में 59 प्रतिशत कर्मचारियों ने बताया कि वे जरूरत होने के बावजूद पहले कभी बीमारी के कारण छुट्टी नहीं ले पाए थे।

‘अच्छा कर्मचारी’ बनने का दबाव

कार्यस्थल पर लगातार उपलब्ध रहने और अधिक काम करने की संस्कृति भी इस समस्या को बढ़ा सकती है। कई कर्मचारियों के मन में यह धारणा बन जाती है कि अच्छा और समर्पित कर्मचारी वही है जो बीमारी में भी काम जारी रखे।

इसका असर खास तौर पर तब दिखता है जब किसी संगठन में अनुपस्थिति को लेकर नकारात्मक रवैया हो या पहले कर्मचारियों को बीमारी की छुट्टी लेने पर सवालों का सामना करना पड़ा हो। ऐसे अनुभव भविष्य में छुट्टी मांगते समय चिंता और अपराधबोध को बढ़ा सकते हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, यदि किसी कर्मचारी को पहले बीमारी की छुट्टी लेने पर नकारात्मक प्रतिक्रिया मिली है, तो वह अनुभव बाद में भी उसके व्यवहार को प्रभावित कर सकता है। नौकरी की सुरक्षा, अपनी उपयोगिता साबित करने की इच्छा और प्रबंधन की प्रतिक्रिया का डर इसके पीछे हो सकता है।

आर्थिक असुरक्षा भी बड़ी वजह

बीमारी में काम करने का फैसला हमेशा केवल मनोवैज्ञानिक कारणों से नहीं होता। आर्थिक असुरक्षा और नौकरी जाने का डर भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

अमेरिका में 2023 की एक रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 65 प्रतिशत कर्मचारियों ने बीमारी की छुट्टी मांगते समय तनाव, चिंता, अपराधबोध या डर महसूस करने की बात कही थी। लगभग एक-चौथाई कर्मचारियों ने यह भी कहा था कि बीमारी के दौरान उन पर काम करने का दबाव डाला गया या उनसे ऐसा करने को कहा गया।

इस तरह कर्मचारी का अपराधबोध कभी-कभी पूरी तरह व्यक्तिगत भावना नहीं होता। यदि कार्यस्थल में बीमारी की छुट्टी को लेकर वास्तविक दबाव मौजूद है, तो कर्मचारी की चिंता के पीछे ठोस अनुभव भी हो सकते हैं।

सहकर्मियों को निराश करने का डर

कई कर्मचारी अपनी गैरमौजूदगी को केवल व्यक्तिगत छुट्टी नहीं मानते। उन्हें लगता है कि टीम का काम प्रभावित होगा और बाकी लोगों को अतिरिक्त जिम्मेदारी उठानी पड़ेगी।

2026 में प्रकाशित NHS कर्मचारियों के एक अध्ययन में भी बीमारी की स्थिति में काम पर जाने या अनुपस्थित रहने के फैसले में कई कारक सामने आए। प्रतिभागियों ने बीमारी की गंभीरता, संक्रमण फैलने की संभावना, अपना काम पूरा कर पाने की क्षमता और टीम में स्टाफ की उपलब्धता को महत्वपूर्ण माना। कुछ प्रतिभागियों ने स्पष्ट रूप से कहा कि वे सहकर्मियों या मरीजों को निराश करने के अपराधबोध के कारण काम पर आने का दबाव महसूस करते हैं।

बीमारी में काम करना हमेशा बेहतर विकल्प नहीं

बीमार होने के बावजूद काम करने से कर्मचारी की उत्पादकता प्रभावित हो सकती है। ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई, थकान और निर्णय लेने की क्षमता में कमी के कारण काम की गुणवत्ता गिर सकती है।

इसके अलावा, यदि बीमारी संक्रामक है तो कर्मचारी के ऑफिस आने से दूसरे लोगों के संक्रमित होने का जोखिम भी बढ़ सकता है। स्वास्थ्य क्षेत्र में किए गए शोध में कर्मचारियों के बीमारी के दौरान काम करने को लेकर सहकर्मियों, मरीजों और संक्रमण फैलने की चिंता भी सामने आई है।

इसलिए बीमारी की छुट्टी केवल कर्मचारी के आराम का मामला नहीं है। कई परिस्थितियों में यह पूरे कार्यस्थल के स्वास्थ्य और सुरक्षा से जुड़ा विषय भी हो सकता है।

अपराधबोध को कैसे समझें?

विशेषज्ञों के मुताबिक बीमारी की छुट्टी लेते समय अपराधबोध महसूस होना अपने आप में इस बात का प्रमाण नहीं है कि कर्मचारी गैर-जिम्मेदार है। कई बार यह भावना व्यक्ति की जिम्मेदारी की भावना, टीम के प्रति प्रतिबद्धता और कार्यस्थल में लंबे समय से बनी अपेक्षाओं का परिणाम होती है।

एक उपयोगी तरीका यह है कि कर्मचारी खुद से पूछे—अगर यही बीमारी किसी सहकर्मी को होती, तो क्या मैं उसे काम पर आने के लिए कहता? यदि जवाब ‘नहीं’ है, तो संभव है कि व्यक्ति खुद पर दूसरों की तुलना में ज्यादा कठोर मानक लागू कर रहा हो।

साथ ही, कंपनी की वास्तविक sick-leave policy को समझना भी मददगार हो सकता है। इससे कर्मचारी को यह स्पष्ट रहता है कि बीमारी की स्थिति में उससे वास्तव में क्या अपेक्षा की जाती है।

छुट्टी लेना और जिम्मेदारी विरोधी नहीं

स्वस्थ कार्यस्थल में बीमारी के दौरान छुट्टी लेना और जिम्मेदार कर्मचारी होना एक-दूसरे के विरोध में नहीं हैं। जिम्मेदारी का अर्थ केवल काम पर उपस्थित रहना नहीं है। इसमें अपनी सेहत का ध्यान रखना, बीमारी फैलने से बचना और स्वस्थ होकर काम पर लौटना भी शामिल है।

विशेषज्ञों के अनुसार, यदि कर्मचारी लगातार बीमारी के बावजूद काम करता है, तो संगठन को भी यह देखना चाहिए कि कहीं अत्यधिक काम का बोझ, अपर्याप्त स्टाफ या ऐसी संस्कृति तो नहीं है जो लोगों को आराम करने से रोक रही है।

आखिरकार, बीमारी में छुट्टी लेने पर महसूस होने वाला अपराधबोध कई बार व्यक्ति की कमजोरी नहीं, बल्कि कार्यस्थल की अपेक्षाओं और सामाजिक दबाव का प्रतिबिंब हो सकता है। इस भावना को समझना कर्मचारियों और नियोक्ताओं दोनों के लिए स्वस्थ और अधिक टिकाऊ कार्य संस्कृति बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।

Bharat Baani Bureau

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