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21 सितंबर 2026 (भारत बाणी ब्यूरो)। भारत में आधुनिक और महंगी मधुमेह दवाओं को अपेक्षाकृत सुलभ बनाने की रणनीति को समझने के लिए चेन्नई के मधुमेह विशेषज्ञों ने एक अध्ययन किया है। अध्ययन में यह पता लगाने का प्रयास किया गया है कि भारत ने नई पीढ़ी की डायबिटीज दवाओं की कीमतों को कम करने के लिए किन नीतिगत और औद्योगिक उपायों का इस्तेमाल किया और इनसे दूसरे निम्न एवं मध्यम आय वाले देशों (LMICs) को क्या सीख मिल सकती है।

‘Making Modern Diabetes Medications Affordable and Accessible: Lessons from India for Other Countries’ शीर्षक वाला अध्ययन चेन्नई स्थित डॉ. मोहन डायबिटीज स्पेशियलिटीज सेंटर के चेयरमैन डॉ. वी. मोहन के नेतृत्व में किया गया। यह शोध Diabetes Care जर्नल में प्रकाशित हुआ है। अध्ययन में आधुनिक मधुमेह उपचारों, जेनेरिक दवाओं, पेटेंट व्यवस्था, घरेलू दवा निर्माण और सरकारी वितरण प्रणाली के बीच संबंधों का विश्लेषण किया गया है। <Cite refs={[“turn1view0”]}/>

दुनिया में मधुमेह के अधिकांश मरीज निम्न और मध्यम आय वाले देशों में

अध्ययन के अनुसार, दुनिया में मधुमेह से पीड़ित लगभग 589 मिलियन वयस्कों में से करीब 80 प्रतिशत निम्न और मध्यम आय वाले देशों में रहते हैं। मधुमेह एक दीर्घकालिक बीमारी है, जिसमें मरीजों को लंबे समय तक दवाओं, जांच और चिकित्सकीय देखभाल की आवश्यकता होती है।

नई पीढ़ी की दवाएं, जैसे GLP-1 receptor agonists और SGLT2 inhibitors, मधुमेह के इलाज में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। इन दवाओं से कुछ मरीजों में हृदय और किडनी से संबंधित परिणामों में सुधार हो सकता है। इसी तरह, एनालॉग इंसुलिन कुछ परिस्थितियों में हाइपोग्लाइसीमिया यानी रक्त शर्करा के अत्यधिक कम होने के जोखिम को कम करने में मदद कर सकता है।

हालांकि, इन आधुनिक दवाओं की कीमतें कई देशों में मरीजों की पहुंच से बाहर हैं। लंबे समय तक दवा लेने की जरूरत और मधुमेह से जुड़ी जटिलताओं के उपचार का खर्च परिवारों पर आर्थिक दबाव बढ़ा सकता है। <Cite refs={[“turn1view0”]}/>

जेनेरिक दवा निर्माण ने निभाई महत्वपूर्ण भूमिका

अध्ययन में भारत की दवा उद्योग क्षमता को महंगी दवाओं को अधिक सुलभ बनाने वाले प्रमुख कारकों में शामिल किया गया है। भारत लंबे समय से जेनेरिक दवाओं का एक बड़ा निर्माता और निर्यातक रहा है। घरेलू कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा से कई दवाओं की कीमतों को कम करने में मदद मिली है।

शोधकर्ताओं के अनुसार, भारत में ऐसी पेटेंट सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने पर ध्यान दिया गया है, जो अनावश्यक रूप से पेटेंट की अवधि बढ़ाने यानी ‘पेटेंट एवरग्रीनिंग’ को रोकने और जेनेरिक दवाओं के निर्माण की अनुमति देने में मदद करती है। इससे कुछ दवाओं के पेटेंट संरक्षण की अवधि समाप्त होने के बाद अन्य कंपनियों के लिए उनके विकल्प तैयार करने का रास्ता खुल सकता है।

हालांकि, पेटेंट नियमों और जेनेरिक निर्माण के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है, ताकि दवाओं की पहुंच बढ़ाने के साथ-साथ नई चिकित्सा खोजों और नवाचार को भी प्रोत्साहन मिलता रहे। <Cite refs={[“turn1view0”]}/>

घरेलू कच्चे माल के उत्पादन पर जोर

अध्ययन में दवाओं के सक्रिय फार्मास्यूटिकल घटकों (API) और अन्य कच्चे माल के घरेलू उत्पादन की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया है। किसी दवा के निर्माण में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल के लिए आयात पर अत्यधिक निर्भरता आपूर्ति श्रृंखला और कीमतों को प्रभावित कर सकती है।

रिपोर्ट के अनुसार, भारत सरकार ने घरेलू स्तर पर कच्चे माल के उत्पादन को प्रोत्साहित करने के लिए एक प्रोत्साहन योजना शुरू की है। वर्ष 2025 तक ऐसे 26 अणुओं (molecules) का उत्पादन शुरू हो चुका था, जिन्हें पहले आयात किया जाता था।

घरेलू उत्पादन बढ़ने से आपूर्ति की स्थिरता, विनिर्माण क्षमता और कुछ दवाओं की लागत पर सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। हालांकि, इसके लिए उत्पादन की गुणवत्ता, पर्याप्त क्षमता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा बनाए रखना भी जरूरी होगा। <Cite refs={[“turn1view0”]}/>

सेमाग्लूटाइड की कीमतों में प्रतिस्पर्धा से गिरावट

अध्ययन में सेमाग्लूटाइड (semaglutide) का उदाहरण भी दिया गया है। यह दवा GLP-1 श्रेणी से संबंधित है और मधुमेह के साथ-साथ कुछ परिस्थितियों में वजन प्रबंधन के उपचार में भी इस्तेमाल की जाती है।

रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में कई घरेलू निर्माताओं के बाजार में प्रवेश के बाद सेमाग्लूटाइड की कीमतों में काफी कमी आई है। इसके साथ ही इसकी बिक्री में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।

हालांकि, अध्ययन यह भी रेखांकित करता है कि कीमतों में गिरावट के बावजूद सेमाग्लूटाइड का मासिक खर्च भारत में कई परिवारों की आय की तुलना में अभी भी अधिक हो सकता है। इसके अलावा, ऐसी दवाएं भारत में आम तौर पर स्वास्थ्य बीमा के तहत उसी स्तर पर कवर नहीं होतीं, जिस स्तर पर कुछ मामलों में अमेरिका में कवरेज उपलब्ध है। <Cite refs={[“turn1view0”]}/>

जन औषधि केंद्रों और वितरण व्यवस्था की भूमिका

अध्ययन में भारत की प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना के तहत संचालित जन औषधि केंद्रों को भी सस्ती दवाओं की उपलब्धता बढ़ाने वाली व्यवस्था के रूप में रेखांकित किया गया है।

जेनेरिक दवाओं की उपलब्धता, सरकारी वितरण रणनीतियां और बाजार में प्रतिस्पर्धा—इन सभी ने भारत में कुछ दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने में भूमिका निभाई है। जन औषधि केंद्रों का उद्देश्य मरीजों को कम कीमत पर गुणवत्तापूर्ण जेनेरिक दवाएं उपलब्ध कराना है।

हालांकि, किसी दवा की कीमत कम होने के साथ-साथ उसकी उपलब्धता, चिकित्सकीय उपयुक्तता और मरीजों को सही दवा मिलने की व्यवस्था भी महत्वपूर्ण है। केवल कम कीमत पर्याप्त नहीं है, यदि दवा मरीज के क्षेत्र में उपलब्ध न हो या डॉक्टर द्वारा उचित रूप से निर्धारित न की जाए। <Cite refs={[“turn1view0”]}/>

टाइप-2 डायबिटीज में पुरानी दवाओं की भूमिका जारी

अध्ययन के अनुसार, मेटफॉर्मिन और सल्फोनाइलयूरिया भारत में टाइप-2 मधुमेह के उपचार की आधारभूत दवाओं में शामिल हैं। दोनों दवाएं भारत की आवश्यक दवाओं की राष्ट्रीय सूची (NLEM) में शामिल हैं।

वहीं, DPP-4 inhibitors, SGLT2 inhibitors और GLP-1 receptor agonists जैसी नई श्रेणी की दवाएं भारत में उपलब्ध हैं, लेकिन अध्ययन के अनुसार वे वर्तमान में NLEM में शामिल नहीं हैं। शोधकर्ताओं ने उल्लेख किया कि इन आधुनिक दवाओं का शुरुआती इस्तेमाल उनकी कीमतों के कारण सीमित रहा।

नई दवाओं की प्रभावशीलता और संभावित स्वास्थ्य लाभों के साथ उनके खर्च का आकलन करना जरूरी है। अलग-अलग मरीजों के लिए दवा का चुनाव उनकी चिकित्सकीय स्थिति, जोखिम, सह-रोगों और डॉक्टर की सलाह के आधार पर किया जाना चाहिए। <Cite refs={[“turn1view0”]}/>

दूसरे देशों के लिए अध्ययन की सिफारिशें

शोधकर्ताओं ने निम्न और मध्यम आय वाले देशों के लिए कई नीतिगत उपाय सुझाए हैं। इनमें स्थानीय दवा निर्माण क्षमता को सार्वजनिक स्वास्थ्य निवेश के रूप में विकसित करना, पेटेंट नीतियों में पहुंच और नवाचार के बीच संतुलन बनाना तथा दवाओं की कीमतों के लिए स्पष्ट और पूर्वानुमान योग्य नियमन शामिल हैं।

अध्ययन में निम्नलिखित उपायों पर जोर दिया गया है:

  • स्थानीय स्तर पर दवा और कच्चे माल के निर्माण को प्रोत्साहन।
  • नई दवाओं तक पहुंच बढ़ाने वाली पेटेंट नीतियां।
  • उचित और पारदर्शी मूल्य नियमन।
  • कम लागत वाली खुदरा वितरण व्यवस्था।
  • दवा नीति को स्वास्थ्य वित्तपोषण योजनाओं से जोड़ना।
  • दवाओं की गुणवत्ता, कीमतों और डॉक्टरों द्वारा लिखे जाने वाले नुस्खों की निगरानी।
  • मरीजों की वास्तविक पहुंच और उपचार परिणामों का नियमित मूल्यांकन।

शोधकर्ताओं का कहना है कि इन सिद्धांतों को महंगी दवाओं की समस्या का सामना कर रहे कुछ उच्च आय वाले देशों में भी लागू करने की संभावनाएं हो सकती हैं। <Cite refs={[“turn1view0”]}/>

चुनौतियां अभी भी मौजूद

अध्ययन में यह भी स्पष्ट किया गया है कि भारत में दवाओं को सुलभ बनाने के बावजूद कई चुनौतियां बनी हुई हैं। इनमें शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच दवाओं की उपलब्धता का अंतर, कड़े नियमन का नवाचार पर संभावित प्रभाव और जेनेरिक दवाओं की गुणवत्ता से जुड़ी धारणाएं शामिल हैं।

इसके अलावा, दवाओं की सुरक्षा पर निगरानी, सरकारी योजनाओं के दीर्घकालिक प्रभाव का मूल्यांकन और मरीजों तक नियमित आपूर्ति सुनिश्चित करना भी महत्वपूर्ण मुद्दे हैं।

भारत का अनुभव बताता है कि दवाओं को सस्ता बनाने के लिए केवल जेनेरिक निर्माण पर्याप्त नहीं है। इसके साथ मजबूत आपूर्ति श्रृंखला, प्रतिस्पर्धी बाजार, प्रभावी सरकारी नीतियां, गुणवत्ता नियंत्रण और मरीजों के लिए वित्तीय सहायता की जरूरत होती है।

सस्ती दवाओं के साथ गुणवत्तापूर्ण उपचार भी जरूरी

मधुमेह के मरीजों के लिए दवाओं की कीमत कम होना उपचार तक पहुंच बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। लेकिन उपचार की निरंतरता, डॉक्टर की सलाह, नियमित जांच और दवा की गुणवत्ता भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं।

चेन्नई के विशेषज्ञों का यह अध्ययन भारत की दवा नीति और घरेलू फार्मास्यूटिकल क्षमता से जुड़े अनुभवों को दूसरे देशों के लिए उपयोगी संदर्भ के रूप में प्रस्तुत करता है। भविष्य में इन उपायों की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सस्ती दवाओं की उपलब्धता वास्तविक रूप से कितने मरीजों तक पहुंचती है और क्या इससे उनके स्वास्थ्य परिणामों में सुधार होता है।

Bharat Baani Bureau

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