28 सितंबर 2026 (भारत बाणी ब्यूरो): आधुनिक जीवन में अच्छी नींद के लिए एयर कंडीशनर, आरामदायक बिस्तर, ब्लैकआउट पर्दे और स्लीप ट्रैकर जैसे कई साधन मौजूद हैं। इसके बावजूद बड़ी संख्या में लोग नींद की समस्या से जूझते हैं। ऐसे में शोधकर्ताओं ने उन समुदायों की नींद का अध्ययन किया है, जिनकी जीवनशैली आधुनिक शहरी समाज से काफी अलग है।
अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के कुछ शिकारी-संग्रहकर्ता यानी hunter-gatherer समुदायों पर किए गए अध्ययनों से पता चलता है कि उनकी नींद प्राकृतिक रोशनी, रात के तापमान, दैनिक गतिविधियों और सामाजिक वातावरण के साथ गहराई से जुड़ी होती है। हालांकि, यह धारणा सही नहीं है कि ये समुदाय आधुनिक मनुष्यों की तुलना में हमेशा ज्यादा घंटे सोते हैं। तीन प्री-इंडस्ट्रियल समाजों के अध्ययन में वास्तविक नींद की अवधि औसतन 5.7 से 7.1 घंटे के बीच पाई गई।
सूर्यास्त के तुरंत बाद नहीं सोते
शोध का एक दिलचस्प निष्कर्ष यह है कि शिकारी-संग्रहकर्ता समुदायों में लोग आम तौर पर सूर्यास्त होते ही बिस्तर पर नहीं चले जाते। तीन अलग-अलग समुदायों—तंजानिया के हड्जा, दक्षिण अफ्रीका के सैन और बोलीविया के त्सिमाने—के अध्ययन में नींद शुरू होने का समय सूर्यास्त के करीब 3.3 घंटे बाद पाया गया।
इसके बावजूद वे अक्सर सूर्योदय से पहले जाग जाते हैं। यानी नींद का समय केवल घड़ी देखकर तय नहीं होता, बल्कि प्राकृतिक पर्यावरण के साथ तालमेल में रहता है।
यह पैटर्न आधुनिक जीवनशैली से अलग है, जहां कृत्रिम रोशनी, स्क्रीन और देर रात तक काम या मनोरंजन सोने के समय को प्रभावित कर सकते हैं।
रात का गिरता तापमान महत्वपूर्ण
अध्ययन का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष तापमान से जुड़ा है। शोधकर्ताओं ने पाया कि हड्जा, सैन और त्सिमाने समुदायों में नींद का समय उस अवधि से जुड़ा था जब रात के दौरान वातावरण का तापमान लगातार गिर रहा था।
नींद आम तौर पर रात के उस हिस्से में शुरू होती थी जब तापमान नीचे जा रहा होता था और जागने का समय दैनिक तापमान चक्र के सबसे निचले स्तर के आसपास पाया गया। शोधकर्ताओं ने इसे मानव नींद के प्राकृतिक नियमन में तापमान की संभावित भूमिका से जोड़ा।
इसका मतलब यह नहीं है कि किसी व्यक्ति को अच्छी नींद के लिए जानबूझकर बहुत ठंडे कमरे में सोना चाहिए। बल्कि अध्ययन यह संकेत देता है कि मानव शरीर की नींद-जागने की प्रणाली पर्यावरणीय तापमान में प्राकृतिक बदलावों के प्रति संवेदनशील हो सकती है।
आधुनिक घरों में तापमान लगभग स्थिर
आधुनिक जीवन में हीटिंग और एयर कंडीशनिंग के कारण सोने के वातावरण का तापमान रातभर काफी हद तक स्थिर रखा जा सकता है। इसके विपरीत शिकारी-संग्रहकर्ता समुदायों के सोने के स्थानों में रात और दिन के तापमान में प्राकृतिक बदलाव मौजूद रहते हैं।
हड्जा समुदाय पर हुए एक अलग अध्ययन में पाया गया कि घास से बनी झोपड़ियां बाहरी वातावरण की तुलना में तापमान संबंधी तनाव में होने वाले उतार-चढ़ाव को कम कर सकती थीं। यानी उनका पारंपरिक आश्रय केवल रहने की जगह नहीं था, बल्कि सोने के दौरान अपेक्षाकृत स्थिर माइक्रो-एनवायरनमेंट उपलब्ध कराने में भी मदद कर सकता था।
सामाजिक जीवन भी नींद को प्रभावित करता है
नींद केवल तापमान और रोशनी से निर्धारित नहीं होती। हड्जा समुदाय पर किए गए शोध में रात के दौरान आसपास के ध्वनि स्तर और नींद-जागने की गतिविधि के बीच संबंध पाया गया। अधिक आवाज वाले वातावरण में नींद की मात्रा कम होने की संभावना देखी गई।
इससे पता चलता है कि सोने का स्थान, आसपास मौजूद लोग और रात की सामाजिक गतिविधियां भी नींद के अनुभव को प्रभावित कर सकती हैं।
एक अन्य अध्ययन में हड्जा समुदाय के लोगों में रात के समय जागने के पैटर्न में उम्र और व्यक्ति की प्राकृतिक जैविक घड़ी यानी chronotype के आधार पर अंतर पाया गया। शोधकर्ताओं के अनुसार, किसी समूह के सभी सदस्य एक ही समय पर पूरी तरह सोए हुए नहीं होते थे। इससे रात के दौरान कुछ लोगों के जागते रहने की संभावना बनी रहती थी।
दिन की रोशनी और रात का अंधेरा
प्राकृतिक प्रकाश भी इस व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। तीन प्री-इंडस्ट्रियल समाजों पर किए गए अध्ययन में सुबह के समय प्रकाश के संपर्क और रात के दौरान अंधेरे के प्राकृतिक चक्र का नींद-जागने के पैटर्न से संबंध पाया गया।
शोधकर्ताओं ने पाया कि इन समुदायों में दिन के दौरान खासकर दोपहर में तेज धूप से बचने के लिए छाया में रहने की प्रवृत्ति थी, जबकि सुबह प्राकृतिक रोशनी का संपर्क अधिक था।
यह आधुनिक जीवनशैली के उस पैटर्न से अलग है जिसमें लोग दिन का बड़ा हिस्सा घर या ऑफिस के अंदर और रात का काफी समय कृत्रिम रोशनी तथा स्क्रीन के सामने बिताते हैं।
क्या वे ज्यादा गहरी नींद लेते हैं?
जरूरी नहीं। हड्जा समुदाय पर किए गए एक अध्ययन में औसत वास्तविक नींद लगभग 6.25 घंटे और sleep efficiency करीब 68.9 प्रतिशत दर्ज की गई थी। हालांकि, उनकी circadian rhythms यानी शरीर की दैनिक जैविक लय अपेक्षाकृत मजबूत पाई गई।
इसलिए इन अध्ययनों से यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि शिकारी-संग्रहकर्ता समुदायों की नींद आधुनिक मनुष्यों से हर मायने में बेहतर है। बल्कि शोध से यह समझने में मदद मिलती है कि मानव नींद पर्यावरण और दैनिक गतिविधियों के साथ किस तरह तालमेल बना सकती है।
दिन में झपकी भी हो सकती है
हड्जा समुदाय पर किए गए शोध में नींद के पैटर्न में लचीलापन भी पाया गया। कुछ दिनों में दिन के समय झपकी लेने की संभावना थी और औसत झपकी की अवधि करीब 47.5 मिनट दर्ज की गई। इससे संकेत मिलता है कि नींद हमेशा एक ही लंबे रात के ब्लॉक में सीमित नहीं होती।
हालांकि, यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि अलग-अलग अध्ययनों में अलग नमूने और अलग परिस्थितियां थीं। इसलिए इन निष्कर्षों को हर व्यक्ति के लिए सीधे लागू नहीं किया जा सकता।
आधुनिक जीवन के लिए क्या सीख?
इन अध्ययनों से आधुनिक लोगों के लिए कुछ व्यावहारिक संकेत जरूर मिलते हैं। नियमित दिनचर्या, दिन के समय प्राकृतिक रोशनी के संपर्क में रहना, रात में तेज रोशनी और अनावश्यक शोर को कम करना तथा आरामदायक तापमान बनाए रखना नींद की गुणवत्ता के लिए उपयोगी हो सकता है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अच्छी नींद केवल बिस्तर पर बिताए गए घंटों का नाम नहीं है। शरीर की जैविक घड़ी, प्रकाश, तापमान, गतिविधि और सामाजिक वातावरण मिलकर नींद के पैटर्न को प्रभावित करते हैं।
शिकारी-संग्रहकर्ता समुदायों पर हुए शोध से मानव नींद के विकास और प्राकृतिक पर्यावरण के साथ उसके संबंध को समझने का एक महत्वपूर्ण अवसर मिलता है। हालांकि, इन समुदायों की जीवनशैली को आधुनिक समाज में सीधे अपनाना न तो आवश्यक है और न ही इन अध्ययनों से ऐसा निष्कर्ष निकलता है। इसके बजाय, प्राकृतिक प्रकाश-अंधकार चक्र, आरामदायक तापमान और शांत नींद के वातावरण जैसे तत्वों को आधुनिक जीवन में समझदारी से शामिल किया जा सकता है।
नोट: नींद की लगातार समस्या, अत्यधिक दिन में नींद आना या बार-बार रात में जागना किसी स्वास्थ्य समस्या का संकेत हो सकता है। ऐसी स्थिति में डॉक्टर या sleep specialist से सलाह लेना उचित है।
