Notice: Trying to get property 'post_content' of non-object in /home/bharatbaani/htdocs/bharatbaani.com/wp-content/plugins/custom-css-js/custom-css-js.php on line 203

9 अक्टूबर 2026 (भारत बाणी ब्यूरो): महिलाओं को लंबे समय से विनम्र, शांत, सहनशील और दूसरों का ख्याल रखने वाला बनने की सीख दी जाती रही है। परिवार हो या कार्यस्थल, उनसे अक्सर अपेक्षा की जाती है कि वे अपनी नाराजगी दबाकर रखें और रिश्तों में टकराव से बचें। लेकिन अब कई महिलाएं इस सोच को चुनौती देते हुए अपने गुस्से को खुलकर व्यक्त करने लगी हैं। उनके लिए गुस्सा अब केवल एक नकारात्मक भावना नहीं, बल्कि अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने और अपनी सीमाएं तय करने का माध्यम भी बन रहा है।

ब्रिटेन में महिलाओं के बीच इस बदलाव पर हालिया चर्चा में संगीत कलाकार चेस गेलिया (Chess Galea) का अनुभव सामने आया है। उन्होंने बताया कि पहले उन्हें डर रहता था कि गुस्सा जाहिर करने पर उन्हें ‘हिस्टीरिकल’ या दूसरों के साथ काम करने में मुश्किल पैदा करने वाली महिला कहा जाएगा। अब उनका कहना है कि यदि कोई सड़क पर अभद्र टिप्पणी करता है, तो वह अपनी नाराजगी व्यक्त करने से पीछे नहीं हटतीं। यह बदलाव इस व्यापक बहस का हिस्सा है कि महिलाओं को अपनी भावनाएं व्यक्त करने की कितनी स्वतंत्रता मिलती है। <Cite refs={[“turn912528search0″,”turn912528search3”]}/>

क्या महिलाएं पहले से ज्यादा गुस्सा महसूस कर रही हैं?

हालिया रिपोर्ट में उद्धृत आंकड़ों के मुताबिक, ब्रिटेन में 2024 के दौरान लगभग हर पांच में से एक महिला ने बताया कि पिछले दिन के बड़े हिस्से में वह गुस्से में थी। 2020 में यह अनुपात लगभग हर दस में से एक था। हालांकि, ये आंकड़े अपने आप यह साबित नहीं करते कि सभी महिलाएं पहले से अधिक गुस्सा महसूस कर रही हैं। संभव है कि कुछ महिलाएं अब अपनी भावनाओं को पहले की तुलना में अधिक खुलकर स्वीकार कर रही हों। <Cite refs={[“turn912528search0″,”turn912528search5”]}/>

विशेषज्ञों के अनुसार, इस बदलाव के पीछे कई कारण हो सकते हैं—काम और परिवार की दोहरी जिम्मेदारियां, घर की देखभाल का मानसिक बोझ, कार्यस्थल पर लैंगिक भेदभाव, उत्पीड़न और महिलाओं के खिलाफ हिंसा। जब किसी व्यक्ति को बार-बार लगता है कि उसकी बात नहीं सुनी जा रही या उसके साथ अन्याय हो रहा है, तो नाराजगी स्वाभाविक प्रतिक्रिया बन सकती है।

‘अच्छी लड़की’ बनने की सामाजिक अपेक्षा

मनोचिकित्सक जेनिफर कॉक्स के अनुसार, महिलाओं को बचपन से ही अच्छा, विनम्र, विचारशील और दूसरों की देखभाल करने वाला बनने की सीख दी जाती है। ऐसी अपेक्षाएं कई बार उन्हें अपनी असहमति जाहिर करने से रोक सकती हैं।

परिवार में शांति बनाए रखने, बच्चों की जरूरतें पूरी करने और कार्यस्थल पर पेशेवर दिखने की कोशिश के बीच महिलाएं अपनी नाराजगी को दबा सकती हैं। समय के साथ यह स्थिति उन्हें अपनी जरूरतों और सीमाओं को नजरअंदाज करने के लिए मजबूर कर सकती है। <Cite refs={[“turn912528search0″,”turn912528search2”]}/>

हालांकि, हर महिला का अनुभव एक जैसा नहीं होता। गुस्सा व्यक्त करने का तरीका व्यक्ति के स्वभाव, सामाजिक माहौल, आर्थिक परिस्थितियों और उपलब्ध सहयोग पर भी निर्भर करता है।

गुस्सा दबाने की कीमत क्या हो सकती है?

लगातार अपनी भावनाओं को अनदेखा करना तनाव और मानसिक थकान से जुड़ सकता है। कुछ लोगों में तनाव के साथ सिरदर्द, नींद की परेशानी या पाचन संबंधी लक्षण भी दिखाई दे सकते हैं। लेकिन इन समस्याओं का कारण केवल गुस्सा ही है, ऐसा मानना सही नहीं होगा; इनके पीछे अन्य शारीरिक और मानसिक कारण भी हो सकते हैं।

महिलाओं और गुस्से पर हुए शोध में यह पाया गया है कि लैंगिक रूढ़ियां महिलाओं को अपनी नाराजगी जाहिर करने से रोक सकती हैं। कुछ परिस्थितियों में महिलाओं को डर रहता है कि असहमति व्यक्त करने पर उन्हें जरूरत से ज्यादा भावुक, आक्रामक या सहयोग न करने वाला माना जाएगा। <Cite refs={[“turn912528search4″,”turn912528search12”]}/>

इसलिए समस्या सिर्फ गुस्सा महसूस करने की नहीं, बल्कि उस सामाजिक माहौल की भी है जिसमें कुछ लोगों को अपनी बात रखने की अधिक स्वतंत्रता मिलती है और दूसरों को इसके लिए आलोचना झेलनी पड़ती है।

कार्यस्थल पर गुस्सा दिखाने की दोहरी कसौटी

कार्यस्थल पर महिलाओं के लिए अपनी नाराजगी जाहिर करना विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकता है। यदि कोई महिला वेतन, काम के बंटवारे, अनुचित व्यवहार या भेदभाव के खिलाफ दृढ़ता से बात करती है, तो उसके व्यवहार को कभी-कभी उसकी योग्यता या व्यक्तित्व से जोड़कर देखा जाता है।

इसके विपरीत, समान परिस्थिति में पुरुष का सख्त रवैया नेतृत्व क्षमता या आत्मविश्वास के रूप में समझा जा सकता है। हालांकि, यह हर संगठन या हर परिस्थिति में लागू नहीं होता, लेकिन लैंगिक रूढ़ियों पर किए गए शोध से पता चलता है कि गुस्सा व्यक्त करने के सामाजिक परिणाम महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग हो सकते हैं। <Cite refs={[“turn912528search4″,”turn912528search15”]}/>

लाइफ कोच यान डांग का सुझाव है कि महिलाओं को अपनी असहमति स्पष्ट शब्दों में रखने का अभ्यास करना चाहिए। उदाहरण के लिए, वे कह सकती हैं—“मैं इससे सहमत नहीं हूं”, “यह मेरे लिए स्वीकार्य नहीं है” या “इस स्थिति से मैं निराश हूं।” ऐसी भाषा भावनाओं को छिपाए बिना अपनी बात रखने में मदद कर सकती है। <Cite refs={[“turn912528search0″,”turn912528search3”]}/>

गुस्सा कमजोरी नहीं, लेकिन उसे संभालना जरूरी

मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुस्सा एक सामान्य मानवीय भावना है। यह संकेत दे सकता है कि किसी की सीमा का उल्लंघन हुआ है, उसके साथ अनुचित व्यवहार किया गया है या उसकी कोई महत्वपूर्ण जरूरत पूरी नहीं हो रही।

मनोवैज्ञानिक तारा ब्रैक के अनुसार, गुस्से के पीछे अक्सर कोई ऐसी बात होती है जिसकी व्यक्ति को परवाह है। यह भावना अन्याय का विरोध करने, अपनी सुरक्षा करने और बदलाव की दिशा में कदम उठाने की ऊर्जा दे सकती है। लेकिन जब गुस्सा व्यक्ति के व्यवहार पर पूरी तरह हावी हो जाए या वह खुद को अथवा दूसरों को नुकसान पहुंचाने लगे, तो स्थिति अस्वस्थ हो सकती है। <Cite refs={[“turn912528search0”]}/>

इसलिए गुस्से को स्वीकार करना और उसे नुकसान पहुंचाए बिना व्यक्त करना—दोनों महत्वपूर्ण हैं। अपनी भावना को पहचानना, उसके कारण को समझना, जरूरत पड़ने पर बातचीत से विराम लेना और स्पष्ट सीमाएं तय करना उपयोगी कदम हो सकते हैं।

सोशल मीडिया ने महिलाओं को दी साझा मंच की ताकत

महिलाओं के अनुभवों को साझा करने में सोशल मीडिया की भी भूमिका है। उत्पीड़न, भेदभाव और घरेलू या पेशेवर जिम्मेदारियों से जुड़े अनुभव जब सार्वजनिक चर्चा का हिस्सा बनते हैं, तो महिलाओं को यह महसूस हो सकता है कि वे अकेली नहीं हैं।

पहले जिन अनुभवों को निजी समस्या मानकर सह लिया जाता था, उन पर अब समूहों, अभियानों और सार्वजनिक मंचों पर चर्चा होने लगी है। इससे महिलाओं को अपनी नाराजगी के कारण पहचानने और बदलाव की मांग करने का अवसर मिल सकता है। हालांकि, सोशल मीडिया पर हर प्रतिक्रिया उपयोगी या सुरक्षित नहीं होती; इसलिए व्यक्तिगत परिस्थितियों और सुरक्षा को ध्यान में रखना जरूरी है। <Cite refs={[“turn912528search0″,”turn912528search3”]}/>

अपनी आवाज उठाना और सम्मान बनाए रखना साथ-साथ संभव

महिलाओं का गुस्सा खुलकर व्यक्त करना जरूरी नहीं कि हर स्थिति में चिल्लाने या टकराव करने के रूप में सामने आए। कई बार स्पष्ट ‘ना’ कहना, अनुचित मांग को अस्वीकार करना, मदद मांगना या भेदभाव की शिकायत दर्ज कराना भी अपनी नाराजगी और असहमति व्यक्त करने का तरीका होता है।

मुख्य बदलाव यह है कि महिलाएं अपनी भावनाओं को केवल इसलिए दबाने के लिए तैयार नहीं हैं कि समाज उन्हें हमेशा शांत और सबको खुश रखने वाली भूमिका में देखना चाहता है। गुस्से को समझना और उचित तरीके से व्यक्त करना व्यक्तिगत सीमाओं, आत्मसम्मान और बेहतर संवाद को मजबूत कर सकता है।

Bharat Baani Bureau

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *