12 अक्टूबर 2026 (भारत बानी ब्यूरो) : यमन के हूती विद्रोहियों के लगातार हमलों के बीच सऊदी अरब की वायु रक्षा प्रणाली पर दबाव बढ़ता जा रहा है। द वॉल स्ट्रीट जर्नल (WSJ) की रिपोर्ट के अनुसार, सऊदी अरब के पास दुश्मन की मिसाइलों और अन्य हवाई खतरों को रोकने के लिए इस्तेमाल होने वाली इंटरसेप्टर मिसाइलों का भंडार कम हो रहा है। इस स्थिति ने देश के प्रमुख शहरों, हवाई अड्डों और ऊर्जा प्रतिष्ठानों की सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं।
रिपोर्ट में सऊदी अधिकारियों के हवाले से बताया गया है कि देश के विशाल क्षेत्र में हवाई सुरक्षा बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो रहा है। ऐसे में सऊदी अरब अपनी मिसाइल रक्षा प्रणालियों और बैटरियों को रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण स्थानों पर तैनात करने पर ध्यान दे रहा है।
रियाद एयरपोर्ट पर हमलों से बढ़ी चिंता
सऊदी अरब की राजधानी रियाद स्थित किंग खालिद अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर 10 अक्टूबर को हुए हमले में 13 लोगों की मौत होने की खबर है, जबकि सैकड़ों लोग घायल हुए। मृतकों में एक भारतीय नागरिक भी शामिल है। इसके बाद 11 अक्टूबर को हवाई अड्डे पर एक और हमले की खबर सामने आई, जिसमें एक व्यक्ति की मौत और 11 लोगों के घायल होने की सूचना दी गई।
सऊदी अधिकारियों के अनुसार, हाल के दिनों में देश के विभिन्न हिस्सों में मिसाइलों और ड्रोन से जुड़े खतरे सामने आए हैं। हालांकि, सऊदी वायु रक्षा बलों ने कुछ मिसाइलों और ड्रोन को बीच रास्ते में ही रोकने में सफलता भी हासिल की है।
इन घटनाओं ने नागरिक हवाई यातायात, सार्वजनिक सुरक्षा और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे की सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं।
क्या है इंटरसेप्टर मिसाइलों की भूमिका?
इंटरसेप्टर मिसाइलों का इस्तेमाल दुश्मन की ओर से दागी गई बैलिस्टिक मिसाइलों और अन्य हवाई खतरों को लक्ष्य तक पहुंचने से पहले नष्ट करने के लिए किया जाता है। सऊदी अरब अपनी रक्षा के लिए पैट्रियट और THAAD जैसी उन्नत मिसाइल रक्षा प्रणालियों पर निर्भर करता है।
हालांकि, इन प्रणालियों की प्रभावशीलता उपलब्ध इंटरसेप्टर मिसाइलों की संख्या, रडार निगरानी, तैनाती और समय पर आपूर्ति पर भी निर्भर करती है। यदि लगातार हमलों के कारण मिसाइलों का इस्तेमाल तेजी से बढ़ता है, तो उनके भंडार को दोबारा भरना एक बड़ी चुनौती बन सकता है।
फिलहाल, सऊदी अरब के पास कितनी इंटरसेप्टर मिसाइलें शेष हैं और उनकी आपूर्ति कब तक बहाल हो सकती है, इसकी सटीक सार्वजनिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। इसलिए मौजूदा रिपोर्ट को मिसाइलों की कमी को लेकर सामने आई चिंता के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि देश की पूरी रक्षा क्षमता समाप्त होने के संकेत के रूप में।
हूती विद्रोहियों की रणनीति बनी चुनौती
यमन में सक्रिय हूती विद्रोही मिसाइलों और ड्रोन के जरिए सऊदी अरब के विभिन्न ठिकानों को निशाना बना रहे हैं। रिपोर्टों के अनुसार, समूह ने हवाई अड्डों और अन्य महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों को लेकर धमकियां भी दी हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, अलग-अलग प्रकार के हवाई हथियारों का एक साथ इस्तेमाल करना आधुनिक वायु रक्षा प्रणालियों के लिए चुनौती पैदा कर सकता है। सऊदी अरब जैसे बड़े क्षेत्रफल वाले देश के लिए हर महत्वपूर्ण स्थान को लगातार सुरक्षा देना आसान नहीं है।
इसके अलावा, अपेक्षाकृत कम लागत वाले ड्रोन या अन्य हथियारों को रोकने के लिए महंगी इंटरसेप्टर मिसाइलों का इस्तेमाल रक्षा व्यवस्था पर आर्थिक और सैन्य दबाव बढ़ा सकता है।
अमेरिका और सहयोगी देशों की भूमिका अहम
सऊदी अरब की मिसाइल रक्षा व्यवस्था में अमेरिका की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। ऐसे में इंटरसेप्टर मिसाइलों की संभावित कमी से निपटने के लिए अमेरिका और अन्य सहयोगी देशों से अतिरिक्त रक्षा उपकरणों की आपूर्ति महत्वपूर्ण हो सकती है।
हालांकि, किसी हथियार सौदे की मंजूरी और उसकी वास्तविक आपूर्ति दो अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी से यह पुष्टि नहीं होती कि सऊदी अरब को अतिरिक्त मिसाइलों की कितनी खेप और किस समय तक मिल पाएगी।
सऊदी अरब के सामने तत्काल चुनौती केवल मिसाइलों का भंडार बढ़ाने की नहीं, बल्कि उपलब्ध रक्षा संसाधनों का प्रभावी इस्तेमाल करने और नागरिक ठिकानों की सुरक्षा मजबूत करने की भी है।
पश्चिम एशिया की सुरक्षा पर पड़ सकता है असर
सऊदी अरब के हवाई अड्डों और ऊर्जा प्रतिष्ठानों पर लगातार हमलों का असर क्षेत्रीय सुरक्षा के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय विमानन और तेल बाजारों पर भी पड़ सकता है। सऊदी अरब वैश्विक तेल आपूर्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसलिए उसके प्रमुख प्रतिष्ठानों पर हमले निवेशकों और ऊर्जा बाजारों की चिंता बढ़ा सकते हैं।
फिलहाल, स्थिति का अगला चरण इस बात पर निर्भर करेगा कि सऊदी अरब अपनी वायु रक्षा प्रणाली को कितनी तेजी से मजबूत करता है और हूती विद्रोहियों के हमलों को रोकने के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं। यदि हमले जारी रहते हैं, तो क्षेत्र में सैन्य तनाव और बढ़ने की आशंका बनी रह सकती है।
