14 अक्टूबर 2026 (भारत बानी ब्यूरो): मधुमेह यानी डायबिटीज को अक्सर ब्लड शुगर नियंत्रित रखने और दवाओं या इंसुलिन के नियमित इस्तेमाल से जुड़ी बीमारी के रूप में देखा जाता है। लेकिन इसका प्रभाव केवल शरीर तक सीमित नहीं रहता। ब्लड शुगर में बार-बार होने वाले उतार-चढ़ाव, भविष्य में गंभीर जटिलताओं का डर और रोजाना बीमारी को संभालने की जिम्मेदारी व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर डाल सकती है।
डायबिटीज से पीड़ित कई लोगों को कभी ऊर्जा और उत्साह महसूस होता है, तो कभी थकान, चिड़चिड़ापन, चिंता या उदासी का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि, हर भावनात्मक बदलाव का कारण ब्लड शुगर ही हो, यह जरूरी नहीं है। नींद, तनाव, दूसरी स्वास्थ्य समस्याएं और दवाओं का प्रभाव भी इसमें भूमिका निभा सकते हैं।
ब्लड शुगर में बदलाव का मूड से संबंध
जब ब्लड शुगर सामान्य से काफी नीचे चला जाता है, तो इसे हाइपोग्लाइसीमिया कहा जाता है। ऐसी स्थिति में पसीना आना, कंपकंपी, भूख, दिल की धड़कन तेज होना, बेचैनी और चिड़चिड़ापन जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। गंभीर स्थिति में भ्रम, बेहोशी या दौरे भी पड़ सकते हैं।
दूसरी ओर, ब्लड शुगर का बहुत अधिक बढ़ना भी परेशानी पैदा कर सकता है। इससे थकान, प्यास, बार-बार पेशाब आना, सिरदर्द और ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई हो सकती है। इन शारीरिक लक्षणों के कारण व्यक्ति का मूड और रोजमर्रा के काम प्रभावित हो सकते हैं।
हालांकि, केवल मूड में बदलाव देखकर ब्लड शुगर के स्तर का अनुमान लगाना सही नहीं है। लक्षण महसूस होने पर ग्लूकोज की जांच करना अधिक उपयोगी है।
जटिलताओं का डर बढ़ा सकता है तनाव
डायबिटीज के साथ जीने वाले लोगों के मन में भविष्य को लेकर कई सवाल हो सकते हैं। क्या बीमारी के कारण आंखों की रोशनी प्रभावित होगी? क्या किडनी या हृदय से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं? क्या भविष्य में इंसुलिन की जरूरत बढ़ जाएगी? ऐसे सवाल लंबे समय तक चिंता का कारण बन सकते हैं।
विशेष रूप से तब, जब व्यक्ति को ब्लड शुगर नियंत्रित रखने में कठिनाई हो रही हो या पहले से कोई जटिलता मौजूद हो, तो भविष्य की अनिश्चितता मानसिक दबाव बढ़ा सकती है। कुछ लोग हर भोजन, शारीरिक गतिविधि और ग्लूकोज रीडिंग को लेकर अत्यधिक चिंतित रहने लगते हैं।
यह स्थिति कभी-कभी डायबिटीज डिस्ट्रेस कहलाती है। इसमें बीमारी को लगातार संभालने की जिम्मेदारी से व्यक्ति भावनात्मक रूप से थका हुआ महसूस कर सकता है। डायबिटीज डिस्ट्रेस और डिप्रेशन एक जैसी स्थितियां नहीं हैं, हालांकि दोनों एक साथ भी हो सकती हैं।
लगातार निगरानी से भी हो सकती है मानसिक थकान
डायबिटीज का प्रबंधन केवल दवा लेने तक सीमित नहीं है। व्यक्ति को भोजन, व्यायाम, नींद, ग्लूकोज की जांच और डॉक्टर की सलाह पर लगातार ध्यान देना पड़ सकता है। बार-बार रीडिंग देखना, अचानक शुगर गिरने का डर और रोजमर्रा की योजनाओं में बदलाव मानसिक थकान पैदा कर सकते हैं।
कुछ लोगों को सामाजिक कार्यक्रमों, यात्रा या बाहर भोजन करने के दौरान भी चिंता रहती है कि कहीं ब्लड शुगर बढ़ या घट न जाए। यदि परिवार या आसपास के लोग बीमारी को लेकर आलोचनात्मक रवैया अपनाते हैं, तो तनाव और बढ़ सकता है।
इसलिए डायबिटीज के उपचार में शारीरिक स्वास्थ्य के साथ भावनात्मक जरूरतों पर ध्यान देना भी जरूरी है।
मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर रखने के लिए क्या करें?
डायबिटीज के साथ मानसिक संतुलन बनाए रखने के लिए कुछ व्यावहारिक कदम मददगार हो सकते हैं:
- ब्लड शुगर का रिकॉर्ड रखें: ग्लूकोज रीडिंग, भोजन, गतिविधि और लक्षणों को नोट करने से उतार-चढ़ाव के संभावित कारण समझने में मदद मिल सकती है।
- नियमित दिनचर्या अपनाएं: डॉक्टर की सलाह के अनुसार भोजन, दवा, व्यायाम और नींद का समय निर्धारित रखें।
- अवास्तविक अपेक्षाओं से बचें: हर रीडिंग का बिल्कुल लक्ष्य के भीतर होना हमेशा संभव नहीं होता। किसी एक रीडिंग के आधार पर खुद को दोष देने के बजाय लंबे समय के रुझानों पर ध्यान दें।
- परिवार से सहयोग लें: अपनी चिंताओं को भरोसेमंद लोगों के साथ साझा करें और जरूरत पड़ने पर उनसे व्यावहारिक मदद मांगें।
- आराम और शारीरिक गतिविधि को महत्व दें: नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद और तनाव कम करने वाली गतिविधियां मानसिक स्वास्थ्य में सहायक हो सकती हैं। व्यायाम की योजना अपनी स्वास्थ्य स्थिति और डॉक्टर की सलाह के अनुसार बनाएं।
दवा या इंसुलिन की खुराक में बदलाव स्वयं न करें। यदि बार-बार ब्लड शुगर कम या अधिक हो रही है, तो डॉक्टर से उपचार की समीक्षा करवाएं।
कब लें विशेषज्ञ की मदद?
यदि चिंता, उदासी, चिड़चिड़ापन या निराशा लगातार बनी रहती है और नींद, काम, रिश्तों या रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करने लगती है, तो डॉक्टर, मनोवैज्ञानिक या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से बात करना उचित है। डायबिटीज देखभाल टीम भी भावनात्मक तनाव से निपटने के लिए मार्गदर्शन दे सकती है।
यदि ब्लड शुगर बहुत कम होने के कारण व्यक्ति बेहोश हो जाए, दौरा पड़े या निगलने में असमर्थ हो, तो उसे मुंह से खाना या पेय न दें और तत्काल आपातकालीन चिकित्सा सहायता लें।

