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4 नवंबर 2026 (भारत बानी ब्यूरो)। इजरायल और अमेरिका के रिश्तों में एक नए तनाव के बीच इजरायल के विपक्षी नेता याइर लैपिड ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस फैसले की कड़ी आलोचना की है, जिसके तहत अमेरिका इजरायल को मिलने वाली सालाना सैन्य सहायता बंद करने की तैयारी कर रहा है। लैपिड ने इसे इजरायल के इतिहास की सबसे गंभीर राजनीतिक और सुरक्षा विफलताओं में से एक करार देते हुए प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू पर निशाना साधा है।

लैपिड ने कहा कि ट्रंप का फैसला इजरायल की सुरक्षा के लिए बड़ा झटका है। उन्होंने सवाल उठाया कि नेतन्याहू ने इस फैसले के सामने झुकने की स्थिति क्यों आने दी और देश की सुरक्षा व्यवस्था को इसके लिए पहले से तैयार क्यों नहीं किया। उनके मुताबिक, इतने महत्वपूर्ण रणनीतिक बदलाव के लिए इजरायल के नेतृत्व को पहले से तैयारी करनी चाहिए थी।

ट्रंप ने क्यों लिया सहायता बंद करने का फैसला?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने घोषणा की है कि अमेरिका इस साल के अंत तक इजरायल को दी जाने वाली करीब 4 अरब डॉलर की सालाना सहायता समाप्त कर देगा। ट्रंप का तर्क है कि इजरायल आर्थिक रूप से मजबूत देश है और अब उसे अपने हथियार खरीदने के लिए अमेरिकी वित्तीय सहायता की जरूरत नहीं है।

फॉक्स न्यूज को दिए एक इंटरव्यू में ट्रंप ने कहा कि इजरायल समृद्ध हो रहा है और अपनी सैन्य जरूरतों का खर्च खुद उठा सकता है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि नेतन्याहू के साथ इस विषय पर पिछले कुछ वर्षों से बातचीत चल रही थी और इजरायली प्रधानमंत्री ने सहायता समाप्त करने की संभावना पर चर्चा की थी।

हालांकि, इस घोषणा के बाद इजरायल में राजनीतिक बहस तेज हो गई है। विपक्षी नेताओं का कहना है कि क्षेत्र में जारी सुरक्षा चुनौतियों और सैन्य अभियानों के बीच अमेरिकी सहायता बंद होने से इजरायल की रक्षा तैयारियों पर दबाव बढ़ सकता है।

रक्षा व्यवस्था और सैन्य भंडार को लेकर चिंता

अमेरिकी सहायता इजरायल की सैन्य व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। इस राशि का इस्तेमाल अमेरिकी हथियारों, सैन्य उपकरणों और मिसाइल रक्षा प्रणालियों की खरीद में किया जाता है। लंबे समय से दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग इजरायल की सुरक्षा रणनीति का अहम आधार रहा है।

इजरायल की डेमोक्रेटिक पार्टी के अध्यक्ष याइर गोलान ने भी अमेरिकी सहायता समाप्त करने के फैसले की आलोचना की है। उन्होंने कहा कि ऐसे समय में सहायता बंद करना इजरायल की सुरक्षा और आम नागरिकों के जीवन स्तर पर गंभीर असर डाल सकता है, जब देश को अपने रक्षा खर्च और सैन्य जरूरतों को पूरा करने के लिए अतिरिक्त संसाधनों की आवश्यकता है।

गोलान ने यह भी चिंता जताई कि लंबे सैन्य अभियानों के बाद इजरायल को अपने हथियारों के भंडार और हवाई रक्षा क्षमताओं को फिर से मजबूत करना होगा। यदि अमेरिकी सहायता बंद होती है, तो इन जरूरतों का वित्तीय बोझ इजरायली जनता पर बढ़ सकता है।

3.8 अरब डॉलर सालाना सहायता का समझौता

अमेरिका और इजरायल के बीच सैन्य सहयोग का मौजूदा आधार 2016 में हुआ 10 वर्षीय समझौता है। इसके तहत अमेरिका ने 2019 से 2028 तक इजरायल को कुल 38 अरब डॉलर की सैन्य सहायता देने की प्रतिबद्धता जताई थी। इस हिसाब से इजरायल को हर साल करीब 3.8 अरब डॉलर की सहायता मिलती है।

इस समझौते के तहत मिलने वाली राशि का बड़ा हिस्सा अमेरिकी रक्षा उद्योग से हथियार और सैन्य उपकरण खरीदने में खर्च किया जाता है। ट्रंप की ताजा घोषणा इस व्यवस्था को तय समय से पहले समाप्त करने की दिशा में एक बड़ा बदलाव हो सकती है।

हालांकि, सहायता बंद करने की घोषणा के बावजूद इसके व्यावहारिक और कानूनी पहलुओं पर सवाल बने हुए हैं। अमेरिकी कांग्रेस की भूमिका और मौजूदा समझौते की शर्तें इस फैसले के क्रियान्वयन को प्रभावित कर सकती हैं। इसलिए यह स्पष्ट होना बाकी है कि सहायता किस प्रक्रिया और समयसीमा के तहत समाप्त होगी।

नेतन्याहू सरकार पर बढ़ा राजनीतिक दबाव

ट्रंप की घोषणा ने इजरायल में नेतन्याहू सरकार के सामने नई राजनीतिक चुनौती खड़ी कर दी है। विपक्षी नेताओं का आरोप है कि सरकार अमेरिका के साथ अपने सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक रिश्ते में आए बदलाव को संभालने में नाकाम रही है।

विपक्ष का सवाल है कि यदि अमेरिकी सहायता समाप्त करने पर पहले से बातचीत चल रही थी, तो इजरायल की रक्षा व्यवस्था को इसके लिए तैयार क्यों नहीं किया गया। आलोचकों के मुताबिक, सैन्य जरूरतों को पूरा करने के लिए वैकल्पिक वित्तीय और औद्योगिक व्यवस्था तैयार करना सरकार की जिम्मेदारी थी।

फिलहाल इस मुद्दे पर नेतन्याहू सरकार की ओर से विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आने का इंतजार है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट हो सकता है कि इजरायल अमेरिकी सहायता के बिना अपनी रक्षा जरूरतों को किस तरह पूरा करने की योजना बना रहा है।

अमेरिका-इजरायल संबंधों के लिए अहम मोड़

अमेरिका लंबे समय से इजरायल का प्रमुख सैन्य और रणनीतिक सहयोगी रहा है। ऐसे में सालाना सैन्य सहायता समाप्त करने की घोषणा दोनों देशों के रिश्तों में महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत देती है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि अमेरिका इजरायल को हथियार बेचना बंद कर देगा। ट्रंप ने संकेत दिया है कि इजरायल अपनी जरूरतों के अनुसार अमेरिकी हथियार खरीद सकता है।

इस फैसले का असर केवल रक्षा बजट तक सीमित नहीं रहेगा। इससे इजरायल की घरेलू राजनीति, रक्षा उद्योग और क्षेत्रीय सुरक्षा रणनीति पर भी प्रभाव पड़ सकता है। फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या नेतन्याहू सरकार अमेरिकी सहायता में संभावित कटौती के लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था तैयार कर पाएगी और क्या दोनों देश अपने रक्षा संबंधों को नए ढांचे में आगे बढ़ा सकेंगे।

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