16 सितंबर 2026 (भारत बानी ब्यूरो)। मणिपुर की बिचु देवी खरिबाम की कहानी भारतीय महिला हॉकी में संयोग, संघर्ष और बदलाव की ऐसी मिसाल है, जिसने एक अधूरे फुटबॉल सपने को अंतरराष्ट्रीय हॉकी के शानदार करियर में बदल दिया। बचपन में फुटबॉलर बनने का सपना देखने वाली बिचु आज भारतीय महिला हॉकी टीम की अहम गोलकीपर हैं और हाल में महिला हॉकी विश्व कप में इंग्लैंड के खिलाफ उनके एक निर्णायक बचाव ने उन्हें सुर्खियों में ला दिया।
25 वर्षीय बिचु ने जिस खेल को कभी अपनी पहली पसंद नहीं माना था, उसी में अब भारत के गोलपोस्ट की जिम्मेदारी संभाल रही हैं। उनकी यात्रा यह भी दिखाती है कि खेल करियर हमेशा योजनाबद्ध तरीके से नहीं बनता—कई बार एक असफल चयन ही खिलाड़ी को ऐसी राह पर ले जाता है, जहां वह अपनी अलग पहचान बना लेता है।
फुटबॉल में जगह नहीं मिली तो हॉकी चुनी
बिचु का पहला प्यार फुटबॉल था। वह बचपन में अपने भाइयों के साथ फुटबॉल खेलती थीं और मणिपुर जैसे फुटबॉल-प्रेमी राज्य में उनके लिए इसी खेल को करियर बनाना स्वाभाविक था।
जब वह Sports Authority of India के इम्फाल केंद्र में फुटबॉल ट्रायल देने पहुंचीं तो चयन प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी और फुटबॉल में जगह नहीं बची थी। परिवार से बातचीत के बाद उन्हें हॉकी में शामिल होने की सलाह दी गई। शुरुआत में बिचु इसके लिए तैयार नहीं थीं। उन्होंने अपने पिता से कहा कि वह फुटबॉल ही खेलना चाहती हैं। पिता ने उन्हें कुछ समय हॉकी को आजमाने के लिए मनाया।
धीरे-धीरे हॉकी में उनकी रुचि बढ़ने लगी। शुरुआत में वह स्ट्राइकर के रूप में खेलती थीं और कभी-कभी डिफेंस में भी उतरती थीं। लेकिन उनकी कहानी में अगला बड़ा मोड़ तब आया जब एक अनुभवी कोच ने उनकी लंबाई और शारीरिक क्षमता को देखते हुए उन्हें गोलकीपर बनने की सलाह दी।
स्ट्राइकर से गोलकीपर बनने का फैसला
मणिपुर के शुरुआती ओलंपियनों में शामिल पी. नीलकमल सिंह ने बिचु की क्षमता को पहचाना और उन्हें गोलकीपिंग की ओर जाने का सुझाव दिया। बिचु को यह विचार भी पसंद नहीं आया। उन्होंने एक इंटरव्यू में बताया कि उन्हें गोलकीपर बनना बिल्कुल पसंद नहीं था और वह फिर से रोई थीं।
लेकिन कोचों ने उन्हें गोलकीपर किट पहनाकर इस भूमिका में प्रशिक्षण देना शुरू किया। कुछ समय बाद यही भूमिका उनकी पहचान बन गई। 2015 में वह मध्य प्रदेश हॉकी अकादमी से जुड़ीं और ग्वालियर में गोलकीपिंग पर गंभीरता से काम शुरू किया। यहीं से उनके खेल करियर को नई दिशा मिली।
बिचु के लिए केवल तकनीकी प्रशिक्षण ही चुनौती नहीं था। मध्य प्रदेश जाने के बाद उन्हें हिंदी भी सीखनी पड़ी ताकि वह कोचों और टीम साथियों के साथ बेहतर संवाद कर सकें। उन्होंने बताया कि उन्होंने टीवी समाचार चैनल देखकर हिंदी सीखने की कोशिश की।
जूनियर स्तर से सीनियर टीम तक
कड़ी मेहनत का परिणाम जल्द दिखने लगा। बिचु ने 2018 Youth Olympics में भारत के लिए रजत पदक जीता। इसके बाद वह जूनियर स्तर पर आगे बढ़ीं और 2022 में भारतीय सीनियर टीम के लिए पदार्पण किया। Hockey India के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, उनके प्रमुख उपलब्धियों में 2018 Youth Olympics का रजत, 2022 Nations Cup का स्वर्ण और 2022 एशियाई खेलों का कांस्य शामिल है।
सीनियर टीम में शुरुआत में उन्हें अनुभवी गोलकीपर सविता पुनिया के पीछे मौके मिलते थे। लेकिन बिचु ने इस दौर को केवल इंतजार के रूप में नहीं देखा। उन्होंने सविता से सीखने पर ध्यान दिया और लगातार अपने खेल को विकसित किया।
2025 में उनके प्रदर्शन को Hockey India ने Baljit Singh Award for Goalkeeper of the Year से सम्मानित किया। 2026 में भी वह भारतीय टीम के गोलकीपिंग समूह का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी हुई हैं।
सविता से मुकाबला नहीं, सीखने की साझेदारी
भारतीय महिला हॉकी में सविता पुनिया लंबे समय से गोलकीपर की प्रमुख भूमिका निभाती रही हैं। बिचु ने उनके साथ अपने संबंध को प्रतिस्पर्धा से अधिक सीखने और एक-दूसरे को बेहतर बनाने वाली साझेदारी के रूप में बताया है।
बिचु के मुताबिक, सविता उन्हें छोटी बहन की तरह मानती हैं। दोनों एक-दूसरे के खेल से सीखती हैं और अपनी कमजोरियों को सुधारने के लिए एक-दूसरे को चुनौती देती हैं। हाल ही में विश्व कप के दौरान भी दोनों के बीच मैदान के बाहर का भरोसा मैदान पर दिखाई दिया।
इंग्लैंड के खिलाफ विश्व कप मुकाबले में बिचु ने अंतिम क्षणों में एक महत्वपूर्ण बचाव किया। उस सेव ने भारत को प्रतियोगिता में आगे बढ़ने में मदद की और उसका वीडियो सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से साझा हुआ। सविता भी डगआउट से इस बचाव पर बेहद उत्साहित नजर आईं।
आक्रामक खिलाड़ी से धैर्यवान गोलकीपर तक
बिचु का खेल केवल शारीरिक क्षमता पर आधारित नहीं है। गोलकीपर के रूप में उन्होंने धैर्य और मानसिक नियंत्रण को भी अपने खेल का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया है।
अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए उन्होंने बताया कि वह काफी आक्रामक खिलाड़ी थीं। लेकिन गोलकीपर के लिए हर समय गेंद का इंतजार करना पड़ता है। कई बार पूरे मैच में गेंद उनके सर्कल तक नहीं आती, फिर भी उन्हें अगले ही पल के लिए तैयार रहना पड़ता है।
सविता और पूर्व कोच जेनेके शोपमैन ने उनके इस बदलाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। शोपमैन ने उन्हें मानसिक रूप से शांत रहने के लिए self-help किताबें पढ़ने और अलग-अलग अभ्यास करने की सलाह दी। बिचु का कहना है कि समय के साथ उन्होंने समझा कि गोलकीपर के लिए धैर्य उतना ही जरूरी है जितनी प्रतिक्रिया की गति।
विश्व कप के बाद एशियाई खेलों की चुनौती
महिला हॉकी विश्व कप में भारत के पांचवें स्थान पर रहने के बाद अब टीम की नजर एशियाई खेलों पर है। भारतीय टीम के लिए यह चरण महत्वपूर्ण है और गोलपोस्ट पर बिचु की भूमिका भी अहम होगी।
Hockey India के अनुसार, 2026 में बिचु भारतीय महिला टीम के वरिष्ठ गोलकीपिंग समूह का हिस्सा हैं। मई-जून में ऑस्ट्रेलिया दौरे के दौरान भी वह सविता के साथ टीम में शामिल थीं।
भारत के गोलपोस्ट के सामने बिचु की कहानी अब उस लड़की से काफी अलग है जो कभी फुटबॉल ट्रायल में जगह नहीं मिलने के बाद निराश होकर घर लौटना चाहती थी। फुटबॉल में एक बंद दरवाजे ने उन्हें हॉकी की ओर धकेला और हॉकी ने उन्हें ऐसा मंच दिया जहां वह अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की उम्मीदों की रक्षा कर रही हैं।
उनकी यात्रा में संयोग की भूमिका जरूर रही, लेकिन वहां तक पहुंचने के लिए वर्षों की मेहनत, सीखने की इच्छा और लगातार खुद को बदलने की क्षमता भी उतनी ही महत्वपूर्ण रही है। यही वजह है कि बिचु देवी अब केवल भारत की गोलकीपर नहीं, बल्कि भारतीय महिला हॉकी के अगले दौर की महत्वपूर्ण खिलाड़ियों में गिनी जा रही हैं।
