4 नवंबर 2026 (भारत बानी ब्यूरो)। भारतीय सरकारी बॉन्ड बाजार में हालिया उतार-चढ़ाव के बीच 10 साल की बेंचमार्क सरकारी बॉन्ड यील्ड नवंबर महीने में 7.25 से 7.35 प्रतिशत के दायरे में रह सकती है। बैंक ऑफ बड़ौदा की अर्थशास्त्री दीपान्विता मजूमदार के मुताबिक, यील्ड की दिशा काफी हद तक अमेरिका के मध्यावधि चुनावों के नतीजों और पश्चिम एशिया संकट से जुड़े घटनाक्रम पर निर्भर करेगी। हालांकि, उन्होंने संकेत दिया है कि यील्ड में बढ़ोतरी का जोखिम अभी भी बना हुआ है।
बॉन्ड बाजार में पिछले कुछ दिनों में राहत देखने को मिली है। कच्चे तेल की कीमतों में नरमी के कारण महंगाई और सरकारी वित्तीय स्थिति को लेकर चिंताएं कुछ कम हुई हैं। इसी के चलते सरकारी बॉन्ड की खरीद बढ़ी और 10 साल की बॉन्ड यील्ड में गिरावट दर्ज की गई। मंगलवार को बेंचमार्क 10 साल की यील्ड करीब 7.30 प्रतिशत पर बंद हुई, जबकि पिछले सप्ताह यह लगभग 7.50 प्रतिशत तक पहुंच गई थी।
कच्चे तेल की कीमतों से मिलेगी बाजार को दिशा
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी या गिरावट का सीधा असर देश की महंगाई, चालू खाते और सरकारी वित्तीय स्थिति पर पड़ सकता है।
हाल के दिनों में तेल की कीमतों में आई नरमी ने बॉन्ड बाजार को कुछ राहत दी है। इससे आयातित महंगाई का दबाव कम होने की उम्मीद बढ़ी है और निवेशकों ने सरकारी प्रतिभूतियों में खरीदारी की है। हालांकि, यदि पश्चिम एशिया में तनाव फिर बढ़ता है और तेल की कीमतों में उछाल आता है, तो बॉन्ड यील्ड पर दोबारा दबाव बन सकता है।
रॉकफोर्ट फिनकैप के संस्थापक और प्रबंध निदेशक वेंकटकृष्णन श्रीनिवासन के अनुसार, 7.30 प्रतिशत से नीचे की यील्ड को बनाए रखना मुश्किल हो सकता है, जब तक कच्चे तेल की कीमतों में और नरमी न आए और वैश्विक बॉन्ड यील्ड में उल्लेखनीय गिरावट न हो।
अमेरिका के चुनाव और पश्चिम एशिया संकट पर नजर
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिकी मध्यावधि चुनावों के नतीजे और उसके बाद अमेरिकी आर्थिक तथा विदेश नीति में संभावित बदलाव वैश्विक वित्तीय बाजारों को प्रभावित कर सकते हैं। इसका असर अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड की यील्ड, डॉलर और उभरते बाजारों में विदेशी निवेश के प्रवाह पर भी पड़ सकता है।
इसके अलावा पश्चिम एशिया में जारी तनाव भी भारतीय बॉन्ड बाजार के लिए महत्वपूर्ण कारक बना हुआ है। क्षेत्र में किसी नए सैन्य या राजनीतिक घटनाक्रम से कच्चे तेल की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। इससे महंगाई बढ़ने और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की मौद्रिक नीति पर दबाव पड़ने की आशंका है।
बैंक ऑफ बड़ौदा की अर्थशास्त्री दीपान्विता मजूमदार ने कहा है कि नवंबर में बेंचमार्क यील्ड 7.25-7.35 प्रतिशत के दायरे में रह सकती है, लेकिन जोखिम ऊपर की ओर झुका हुआ है। इसका अर्थ है कि परिस्थितियां प्रतिकूल होने पर यील्ड इस अनुमानित दायरे से ऊपर भी जा सकती है।
आरबीआई की नीतिगत सख्ती का असर
भारतीय बॉन्ड बाजार पर आरबीआई की मौद्रिक नीति का भी प्रभाव पड़ रहा है। अक्टूबर में केंद्रीय बैंक ने रेपो रेट में 25 आधार अंकों की बढ़ोतरी कर इसे 5.50 प्रतिशत कर दिया था। इसके साथ ही नीतिगत रुख को कैलिब्रेटेड टाइटनिंग किया गया, जिससे बाजार में यह संकेत गया कि निकट भविष्य में ब्याज दरों में कटौती की संभावना कम है।
ब्याज दरों में बढ़ोतरी की आशंका सरकारी बॉन्ड की यील्ड को ऊपर रख सकती है। निवेशक भविष्य में महंगाई और ब्याज दरों के रुझान को ध्यान में रखकर लंबी अवधि के बॉन्ड में निवेश का फैसला करते हैं। यदि उन्हें लगता है कि ब्याज दरें आगे बढ़ सकती हैं, तो वे मौजूदा बॉन्ड के लिए अधिक यील्ड की मांग करते हैं।
अक्टूबर में आरबीआई के फैसले के बाद 10 साल की बेंचमार्क यील्ड में तेजी आई थी और यह तीन साल से अधिक के ऊंचे स्तर के करीब पहुंच गई थी।
कंपनियां बॉन्ड बाजार से जुटा रहीं पूंजी
हालिया गिरावट के बाद सरकारी बॉन्ड यील्ड में आई नरमी का लाभ उठाने के लिए कंपनियां भी बाजार से पूंजी जुटाने में तेजी दिखा रही हैं। इस सप्ताह विभिन्न कंपनियों और वित्तीय संस्थानों की ओर से कुल 17,000 करोड़ रुपये से अधिक के कॉरपोरेट बॉन्ड जारी करने की योजना सामने आई है।
इसमें नाबार्ड, आरईसी और सिडबी जैसे सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थानों के साथ बजाज हाउसिंग फाइनेंस, लॉयड्स मेटल्स एंड एनर्जी, हिंदुजा लेलैंड फाइनेंस, जेएसडब्ल्यू पेंट्स और टाटा कैपिटल हाउसिंग फाइनेंस जैसी निजी कंपनियां शामिल हैं।
कंपनियां मौजूदा अपेक्षाकृत अनुकूल बाजार परिस्थितियों में कम लागत पर कर्ज जुटाना चाहती हैं। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यील्ड में हालिया गिरावट का फायदा उठाने के लिए कई जारीकर्ता जल्दबाजी कर रहे हैं, क्योंकि आगे चलकर उधारी की लागत फिर बढ़ सकती है।
निवेशकों के लिए क्या हैं संकेत?
बॉन्ड यील्ड में बदलाव का असर मौजूदा बॉन्ड की कीमतों पर भी पड़ता है। सामान्य तौर पर यील्ड बढ़ने पर पहले से जारी निश्चित ब्याज दर वाले बॉन्ड की बाजार कीमत घटती है, जबकि यील्ड गिरने पर उनकी कीमत बढ़ती है। इसलिए बैंक, बीमा कंपनियां, म्यूचुअल फंड और अन्य संस्थागत निवेशक बॉन्ड बाजार के उतार-चढ़ाव पर करीबी नजर रखते हैं।
फिलहाल नवंबर के लिए 7.25-7.35 प्रतिशत का अनुमान बाजार को एक संभावित दायरा देता है, लेकिन यह निश्चित भविष्यवाणी नहीं है। कच्चे तेल की कीमतें, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड, रुपये की चाल, विदेशी निवेश और आरबीआई के अगले कदम आने वाले दिनों में भारतीय सरकारी बॉन्ड बाजार की दिशा तय करेंगे।
